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मुश्किलों भरा रहा ये साल विश्वास की कमी और बयानों की कड़वाहट ने कैसे बदला भारत-बांग्लादेश का रिश्ता

News India Live, Digital Desk : कहते हैं कि आप अपने दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं। भारत और बांग्लादेश के लिए साल 2025 इसी कहावत की कसौटी पर खड़ा रहा। जिस पड़ोसी के साथ हमारा खून का नाता था और 1971 की यादें जुड़ी थीं, उस रिश्ते में साल 2025 ने वो कड़वाहट घोल दी, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। अगर हम इस पूरे साल का लेखा-जोखा देखें, तो समझ आता है कि चीजें अचानक नहीं बिगड़ीं, बल्कि विश्वास की कमी ने आग में घी डालने का काम किया।वो बदलाव, जिसने सब कुछ उलट दियाइस कड़वाहट की जड़ें साल 2024 के आखिरी महीनों में ही पड़ गई थीं, लेकिन उसका पूरा असर 2025 में महसूस हुआ। शेख हसीना की सरकार के जाने के बाद जो नई अंतरिम सरकार बनी, उसका झुकाव और विचारधारा भारत के लिए हमेशा से एक सवाल बनी रही। जो दिल्ली कभी ढाका के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना थी, उसी दिल्ली से अब दूरियां बनाई जाने लगीं। रिश्तों में सहजता खत्म हो गई और इसकी जगह औपचारिक ठंडेपन ने ले ली।जनता के बीच का गुस्सा और ‘इंडिया आउट’2025 में सबसे ज्यादा दुखद पहलू रहा—आम जनता के बीच बढ़ता ‘एंटी-इंडिया’ सेंटीमेंट। सोशल मीडिया पर जिस तरह ‘इंडिया आउट’ कैंपेन चलाया गया, उसने न सिर्फ व्यापार को चोट पहुंचाई बल्कि दशकों पुराने सांस्कृतिक जुड़ाव पर भी हमला किया। आम भारतीयों के लिए ये देखना दर्दनाक था कि जिस देश की आजादी के लिए उनके बुजुर्गों ने कुर्बानी दी, वहां की गलियों में आज उनके खिलाफ नारे लग रहे हैं।अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: सबसे बड़ा सिरदर्दपूरे साल भारतीय मीडिया और सरकार की चिंता का केंद्र बांग्लादेश में रह रहे हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय रहे। वहां से आने वाली हिंसा और डर की खबरों ने भारत के भीतर जनमानस को काफी बेचैन किया। हालांकि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार बार-बार आश्वासन देती रही, लेकिन ज़मीनी हकीकत और ढाका की सड़कों पर बढ़ती कट्टरता ने इन दावों की पोल खोल दी। चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी जैसे मामलों ने आग को हवा देने का ही काम किया।व्यापार और वीजा: जहाँ आम आदमी पिसासिर्फ राजनीति ही नहीं, व्यापार के मामले में भी 2025 एक बुरा साल साबित हुआ। भारत की ओर से वीजा नियमों में सख्ती और बांग्लादेश की ओर से बढ़ते आयात प्रतिबंधों ने सीमा पर ट्रकों की लाइनें लगा दीं। भारत से इलाज कराने आने वाले लाखों बांग्लादेशी मरीज इस सियासी खिंचतान में फंस गए। व्यापारिक रिश्तों में आए इस दरार ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को वो घाव दिए हैं जिन्हें भरने में वक्त लगेगा।सीमा पर बढ़ती सख्ती और विश्वास का संकटबीएसएफ (BSF) और बांग्लादेश के सुरक्षा बलों के बीच भी पहले जैसी नरमी नहीं रही। छोटी-मोटी झड़पों की खबरें 2025 में पहले के मुकाबले ज्यादा सुनाई दीं। सीमा पार से घुसपैठ का डर और जासूसी के आरोपों ने सुरक्षा एजेंसियों के बीच भी संदेह की दीवार खड़ी कर दी।आगे क्या? क्या 2026 में हालात बदलेंगे?जैसे ही हम 2025 की विदाई कर रहे हैं, सवाल यही खड़ा है कि क्या ये सब सिर्फ एक बुरा दौर था या फिर एक स्थाई दूरी? विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश के साथ रिश्ते सुधारना अब केवल ‘डिप्लोमेसी’ का काम नहीं है, बल्कि वहां के लोगों का विश्वास जीतना बड़ी चुनौती है।रिश्तों में पड़ी ये दरार बताती है कि जब सियासत और भावनाएं आपस में टकराती हैं, तो नुकसान हमेशा उन आम लोगों का होता है जो सरहद के दोनों ओर रहते हैं। साल 2026 भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए एक मौका है कि वे अतीत के बोझ को उतारें और मिलकर आगे बढ़ें, क्योंकि पड़ोसी चाहे कैसा भी हो, उसकी शांति में ही अपनी भलाई होती है।

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