विदेश

रोनाल्ड रीगन की वो 39 साल पुरानी लाइन: पीएम मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप को क्यों दिलाई याद

वैश्विक राजनीति और कूटनीति के मंच से एक बेहद दिलचस्प और रणनीतिक खबर सामने आ रही है, जिसने पूरी दुनिया के विदेश नीति विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपनी हालिया उच्च स्तरीय मुलाकात के दौरान अमेरिका के ही पूर्व महान राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की 39 साल पुरानी एक बेहद प्रसिद्ध लाइन का जिक्र किया। पीएम मोदी द्वारा अमेरिकी धरती पर, एक अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने इतिहास के इस पन्ने को पलटने के पीछे बहुत गहरे भू-राजनीतिक मायने छिपे हैं। जानकारों का मानना है कि मोदी के इस बयान के बाद मॉस्को में बैठे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी यकीनन मुस्कुरा रहे होंगे।

क्या है रोनाल्ड रीगन की वह ऐतिहासिक लाइन और इसका आज का संदर्भ

दरअसल, साल 1987 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत संघ (अब रूस) के नेता मिखाइल गोर्बाचेव के बीच शीतयुद्ध को खत्म करने और ऐतिहासिक परमाणु संधि (INF Treaty) पर हस्ताक्षर के दौरान एक मुहावरा बेहद मशहूर हुआ था— 'भरोसा करो, लेकिन जांचो' (Trust, but verify)। पीएम मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के साथ बातचीत में इसी ऐतिहासिक संदर्भ का इस्तेमाल करते हुए मौजूदा वैश्विक संकटों और द्विपक्षीय समझौतों की ओर इशारा किया। मोदी ने इसके जरिए संदेश दिया कि आज के दौर में भी महाशक्तियों के बीच शांति और सहयोग के लिए इसी संतुलित कूटनीति की जरूरत है, जहां बातचीत के साथ-साथ व्यावहारिक धरातल को भी परखा जाए।

डोनाल्ड ट्रंप के सामने इस बयान के क्या हैं कूटनीतिक मायने

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ट्रंप के सामने रीगन की बात को दोहराना एक सोची-समझी रणनीतिक चाल माना जा रहा है। ट्रंप अपने 'अमेरिका फर्स्ट' और लीक से हटकर फैसले लेने वाले अंदाज के लिए जाने जाते हैं। पीएम मोदी ने उन्हें यह याद दिलाया कि वैश्विक शांति, विशेषकर रूस-यूक्रेन विवाद या एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा में भारत की भूमिका कितनी संतुलित है। भारत हमेशा से 'संवाद और कूटनीति' का पक्षधर रहा है। इस बयान के जरिए मोदी ने ट्रंप को यह भी संकेत दिया कि भारत अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी चाहता है, लेकिन वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और पुराने सहयोगियों के साथ रिश्तों की मर्यादा को भी पूरी तरह कायम रखेगा।

नई दिल्ली से मॉस्को तक इस बयान की गूंज और पुतिन की मुस्कुराहट

इस पूरे घटनाक्रम पर रूस की नजरें भी लगातार टिकी हुई हैं। रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि जब पीएम मोदी ने अमेरिका और सोवियत संघ के पुराने दौर के समझौते की याद दिलाई, तो वह परोक्ष रूप से रूस-भारत के अटूट संबंधों की गूंज वाशिंगटन में छोड़ रहे थे। पुतिन की मुस्कुराहट की वजह यही है कि पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद भारत ने कभी भी रूस के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को कमजोर नहीं होने दिया। नई दिल्ली, मुंबई और दिल्ली के रणनीतिक थिंक-टैंक्स का मानना है कि पीएम मोदी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारत दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों— अमेरिका और रूस— के बीच एक कुशल मध्यस्थ और संतुलन बनाने वाले वैश्विक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में पूरी तरह सक्षम है।

Back to top button