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लोकतंत्र की कसौटी या नया धंधा? आरटीआई कार्यकर्ताओं पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों ने छेड़ी ‘नागरिक सक्रियता’ पर देशव्यापी बहस

एक जीवंत और संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर संस्था से यह उम्मीद की जाती है कि वह पूरी निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करे। लेकिन जब सरकारी तंत्र अपनी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तब "नागरिक सक्रियता" (Citizen Activism) ही व्यवस्था को आईना दिखाने का काम करती है। हाल ही में भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) द्वारा दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई के दौरान आरटीआई कार्यकर्ताओं (RTI Activists) पर की गई तल्ख और तंजभरी टिप्पणियों ने न्यायपालिका बनाम नागरिक अधिकारों के बीच एक नई वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है।

क्या है 'एक्टिविज्म' पर न्यायपालिका के सख्त तेवर का पूरा मामला?

कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था, "कुछ बेरोजगार युवा कॉकरोच (तिलचट्टा) की तरह होते हैं, जो नौकरी न मिलने के कारण अपने प्रोफेशन में जगह नहीं बना पाते और आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं।" इस टिप्पणी पर सोशल मीडिया और नागरिक समाज में इतना बड़ा विवाद खड़ा हुआ कि करीब ढाई करोड़ समर्थकों ने ऑनलाइन एक प्रतीकात्मक "कॉकरोच राजनीतिक पार्टी" तक का गठन कर दिया।

इसी तरह का एक और मौखिक रुख तब देखने को मिला जब शीर्ष अदालत ने एक अन्य आरटीआई कार्यकर्ता राजीव कुमार उर्फ मिंटू और राकेश कुमार बहल की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि "एक्टिविज्म अब एक नया धंधा बन गया है।"

पंजाब के गुरदासपुर की घटना: जहां से शुरू हुआ विवाद

इस पूरे मामले की जड़ें पंजाब के गुरदासपुर जिले से जुड़ी हैं। वहां एक सड़क निर्माण कार्य में कथित भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता राजीव कुमार बहल ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी। इसके बाद, निर्माण कार्य में बाधा डालने, मजदूरों को धमकाने, अभद्र भाषा का प्रयोग करने और हमले के आरोप में उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BJS) की धारा 351(2), 351(3), 304(2), 221, 132, 121 और अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1) के तहत एक आपराधिक मुकदमा दर्ज कर लिया गया।

जब यह मामला अग्रिम जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो सुनवाई के दौरान अदालत की मौखिक टिप्पणियों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अदालत ने पूछा, "निगरानी करने वाले आप होते कौन हैं?", "आपको यह अधिकार किसने दिया है?" और "केंद्र सरकार ने फंड जारी किया है, वही सड़क निर्माण का ध्यान रखेगी।" इन टिप्पणियों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या जिस तंत्र पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों, जांच और निगरानी का जिम्मा भी पूरी तरह उसी पर छोड़ देना न्याय के बुनियादी सिद्धांत— "कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में स्वयं न्यायाधीश नहीं हो सकता"—के खिलाफ नहीं है?

एक व्यक्ति के कदाचरण से पूरे वर्ग को कटघरे में खड़ा करना कितना सही?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि आरटीआई कार्यकर्ता मिंटू या किसी अन्य ने कानून को अपने हाथ में लिया है, ब्लैकमेलिंग की है या सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाई है, तो उस पर सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी एक विचाराधीन मामले के आधार पर देश के तमाम आरटीआई कार्यकर्ताओं और नागरिक सक्रियता को 'धंधा' कहना उचित है?

कानून के 'उपयोग' और 'दुरुपयोग' में एक बड़ा महीन अंतर होता है। जिस तरह न्यायपालिका में किसी एक न्यायाधीश के भ्रष्ट आचरण या कदाचरण के सामने आने पर पूरी न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता, ठीक उसी तरह किसी एक एक्टिविस्ट की गलती के कारण देश में लोकतंत्र को मजबूत कर रहे सूचना के अधिकार कानून (RTI Act, 2005) और उसके निष्पक्ष कार्यकर्ताओं को संदेह की दृष्टि से देखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

दो फैसलों में अलग मानक: न्यायपालिका की विरोधाभासी स्थिति

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और विरोधाभास तब सामने आया जब एनसीईआरटी (NCERT) द्वारा कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" विषय को शामिल किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। तब अदालत ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश बताते हुए पूरी किताब पर 'पूर्ण प्रतिबंध' लगा दिया था।

कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि एक तरफ अपनी संस्था पर सवाल उठाने वाली किताब को प्रतिबंधित कर देना और दूसरी तरफ लोकतंत्र को जिंदा रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूरे आरटीआई समुदाय पर व्यापक आक्षेप लगा देना, न्यायपालिका के दो विपरीत मानकों (Double Standards) को दर्शाता है। सूचना का अधिकार कानून इसी मूल सोच के साथ बनाया गया था कि देश का आम नागरिक शासन से सवाल पूछ सके और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को रोक सके।

क्या जागरूक नागरिक की सक्रियता तंत्र के लिए खतरा है?

न्यायालय की इस फटकार से समाज में यह संदेश जाने का खतरा रहता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना ही गुनाह है। यदि समाज का हर नागरिक अपने आस-पास हो रहे सरकारी निर्माण कार्यों की जांच, देखरेख और गुणवत्ता पर नजर रखने लग जाए, तो इससे न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, बल्कि देश का बुनियादी ढांचा भी मजबूत होगा।

एक स्थानीय उदाहरण के तौर पर, अक्सर देखा जाता है कि जागरूक जनप्रतिनिधि या स्थानीय नागरिक अपने वार्ड में बन रही सड़कों की स्वयं निगरानी करते हैं और सुबह-सुबह पानी से तराई भी करते हैं। यह व्यवहार हमारे संविधान में दिए गए मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) के बिल्कुल अनुकूल है। यदि प्रशासन और स्थानीय तंत्र समय रहते सजग रहें, तो नागरिकों को बार-बार हस्तक्षेप करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। यह सच है कि नागरिक निगरानी को किसी समानांतर प्रशासनिक दादागिरी में नहीं बदलना चाहिए, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सोया हुआ सरकारी तंत्र अक्सर जागे हुए नागरिकों की वजह से ही काम करता है।

अर्द्ध-न्यायिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप का बढ़ता दायरा

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट से यह भी अपेक्षा थी कि वह जहां एक ओर आरोपी कार्यकर्ता के खिलाफ आपराधिक कृत्य की जांच के निर्देश देती, वहीं दूसरी ओर उस सड़क निर्माण कार्य की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच के आदेश भी सरकार को देती। किसी विवाद के केवल एक पहलू का उपचार करना न्याय की संपूर्ण अवधारणा को पूरा नहीं करता।

इसी प्रकार, उत्तर प्रदेश में पुलिस विभाग की लगभग 120 एकड़ जमीन पर एक कुख्यात माफिया के कब्जे को लेकर हाल ही में मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से यह कहना कि 'माफिया का सफाया करना मेरा प्रिय विषय है', और इसके बाद राजस्व मंडल (Board of Revenue) के अध्यक्ष को सीधे स्थगन आदेश (Stay Order) जारी करने का निर्देश देना भी एक अलग बहस को जन्म देता है। राजस्व मंडल जैसी अर्द्ध-न्यायिक संस्थाओं (Quasi-Judicial Bodies) की स्वायत्त कार्यप्रणाली में इस तरह का प्रशासनिक निर्देश या हस्तक्षेप, न्यायिक स्वतंत्रता के मूल सिद्धांत पर आघात माना जा सकता है।

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