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विधानसभा का विशेषाधिकार बनाम नागरिकों का मौलिक अधिकार: क्या जनप्रतिनिधियों की शक्तियां छीन सकती हैं आपकी आजादी?

संविधान के तहत राज्यों की विधानसभाओं और देश की संसद को मिले विशेष अधिकारों (Legislative Privileges) तथा आम नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) के बीच की संवैधानिक रेखा एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत के मंच पर खिंचने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की वृहद संविधान पीठ (Constitution Bench) इस बेहद संवेदनशील और दूरगामी प्रश्न पर विचार करने जा रही है कि क्या विधानमंडलों के विशेषाधिकार किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों—विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19(1)(a)) और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (Article 21)—पर हावी हो सकते हैं या नहीं।

यह संवैधानिक लड़ाई केवल वकीलों और जजों के बीच की बहस नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश के मीडिया, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की आजादी से जुड़ी हुई है। इतिहास में कई बार ऐसा देखा गया है कि जब किसी पत्रकार या नागरिक ने विधानसभा की कार्यप्रणाली या विधायकों के आचरण पर सवाल उठाए, तो विधानमंडलों ने 'अवमानना' या 'विशेषाधिकार हनन' का नोटिस जारी कर उन्हें जेल भेजने या दंडित करने का फरमान सुना दिया। अब देश की शीर्ष अदालत यह तय करेगी कि क्या लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों के विशेषाधिकारों की कोई अंतिम सीमा है या वे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से ऊपर हैं।

विशेषाधिकार और मौलिक अधिकारों के बीच की संवैधानिक जंग: क्या कहता है अनुच्छेद 105 और 194?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 (संसद के लिए) और अनुच्छेद 194 (राज्य विधानसभाओं के लिए) सांसदों और विधायकों को कुछ खास अधिकार और उन्मुक्तियां (Immunities) प्रदान करता है। इन प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जनप्रतिनिधि बिना किसी बाहरी दबाव, भय या मुकदमों के डर के सदन के भीतर अपनी बात रख सकें और विधायी कार्य संपन्न कर सकें। इसके तहत सदन में कही गई किसी बात या दिए गए वोट के लिए किसी भी सदस्य पर अदालत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

हालांकि, समस्या तब उत्पन्न होती है जब विधानमंडल अपने इन विशेषाधिकारों का प्रयोग सदन की चारदीवारी से बाहर किसी नागरिक, पत्रकार या आलोचक के खिलाफ 'सदन की अवमानना' (Contempt of House) के नाम पर करते हैं। जब कोई विधानसभा किसी नागरिक को समन भेजती है या उसे दंडित करती है, तो नागरिक संविधान के अनुच्छेद 19 (बोलने की आजादी) और अनुच्छेद 21 (बिना कानूनी प्रक्रिया के गिरफ्तारी से सुरक्षा) की ढाल लेकर न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाता है। यहीं से कार्यपालिका/विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति के संतुलन (Separation of Powers) का बड़ा टकराव शुरू होता है।

1959 का सर्चलाइट केस और 1964 का ऐतिहासिक केशव सिंह मामला: क्यों पड़ी 7 जजों की पीठ की जरूरत?

इस संवैधानिक गुत्थी का इतिहास छह दशक पुराना है। साल 1959 के प्रसिद्ध 'एम.एस.एम. शर्मा बनाम श्री कृष्ण सिन्हा' केस (जिसे सर्चलाइट केस के नाम से जाना जाता है) में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि विधानसभा के विशेषाधिकार नागरिकों के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर भारी पड़ेंगे। इस फैसले ने विधायिका को व्यापक शक्तियां दे दी थीं।

हालांकि, 1964 में उत्तर प्रदेश का चर्चित 'केशव सिंह केस' सामने आया, जिसने देश के संवैधानिक ढांचे को हिलाकर रख दिया। उत्तर प्रदेश विधानसभा ने केशव सिंह नामक व्यक्ति को विधानसभा परिसर में पर्चे बांटने के आरोप में अवमानना का दोषी मानकर जेल भेज दिया। जब केशव सिंह के वकील ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, तो हाईकोर्ट के दो जजों ने उन्हें अंतरिम जमानत दे दी। इससे नाराज होकर यूपी विधानसभा ने न केवल केशव सिंह, बल्कि उनके वकील और जमानत देने वाले हाईकोर्ट के दोनों जजों के खिलाफ भी गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया।

इस अभूतपूर्व संकट के बाद राष्ट्रपति ने मामले को सुप्रीम कोर्ट भेजा, जहाँ 7 जजों की विशेष पीठ ने ऐतिहासिक व्यवस्था दी। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका के पास किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी (Article 21) की रक्षा करने का पूरा अधिकार है और विधानसभाएं अदालतों के न्यायिक क्षेत्राधिकार को छीन नहीं सकतीं। चूंकि पुराने फैसलों में विरोधाभास और असमानताएं बनी रहीं, इसलिए आज भी इस मुद्दे पर कानून पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, जिसे दूर करने के लिए अब 7 जजों की नई पीठ गठित की गई है।

मीडिया, अभिव्यक्ति की आजादी और न्यायपालिका का हस्तक्षेप

हाल के वर्षों में कई राज्यों की विधानसभाओं द्वारा पत्रकारों और संपादकों को विशेषाधिकार हनन के नोटिस जारी किए गए हैं। जब भी कोई मीडिया संस्थान किसी विधायक या मंत्री के भ्रष्टाचार या सदन में उनके आचरण को उजागर करता है, तो विशेषाधिकार समिति (Privileges Committee) के माध्यम से उन्हें तलब कर लिया जाता है।

प्रेस की स्वतंत्रता के समर्थकों का तर्क है कि यदि विधायिका को असीमित शक्तियां दे दी गईं, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ निष्पक्षता से काम नहीं कर पाएगा। वहीं दूसरी ओर, विधानमंडलों का तर्क होता है कि सदन की गरिमा और संप्रभुता बनाए रखने के लिए उनके पास अवमानना के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार होना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का एक मुख्य पहलू यह होगा कि क्या मीडिया द्वारा विधानसभा की बहसों या सदस्यों के आचरण पर की गई आलोचना को 'विशेषाधिकार का उल्लंघन' माना जा सकता है या इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना जाएगा।

क्या विशेषाधिकारों का कोडिफिकेशन (संहिताकरण) है अंतिम समाधान?

संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे विवाद की मूल जड़ विशेषाधिकारों का लिखित रूप में न होना यानी 'नॉन-कोडिफिकेशन' (Non-codification) है। जब 1950 में संविधान लागू हुआ था, तब अनुच्छेद 105(3) और 194(3) में लिखा गया था कि जब तक संसद या राज्य विधानसभाएं अपने विशेषाधिकारों को कानून बनाकर परिभाषित (Codify) नहीं करतीं, तब तक ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स (British House of Commons) के विशेषाधिकार भारत में भी लागू रहेंगे।

76 साल बीत जाने के बाद भी भारतीय संसद या किसी भी राज्य विधानसभा ने अपने विशेषाधिकारों को कोडिफाई नहीं किया है। इसका मुख्य कारण यह है कि जैसे ही संसद या विधानसभाएं विशेषाधिकारों का कानून बनाएंगी, वह कानून संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत आ जाएगा और उस पर मौलिक अधिकारों की शर्तें लागू हो जाएंगी। इसका अर्थ यह होगा कि न्यायपालिका उस कानून की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कर सकेगी। राजनेता अपनी इस असीमित शक्ति को खोना नहीं चाहते, इसलिए वे कोडिफिकेशन से बचते रहे हैं।

7 जजों की पीठ के सामने मुख्य संवैधानिक प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ इस सुनवाई के दौरान निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर ऐतिहासिक व्यवस्था दे सकती है:

  1. क्या विधानसभा के विशेषाधिकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों (विशेष रूप से अनुच्छेद 19 और 21) के अधीन हैं?

  2. क्या सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट अनुच्छेद 32 और 226 के तहत विधानसभा द्वारा जारी किए गए अवमानना नोटिस या दंडात्मक आदेशों की समीक्षा कर सकते हैं?

  3. क्या किसी नागरिक को विशेषाधिकार समिति के समक्ष पेश होने से पहले अदालत से न्यायिक राहत पाने का अधिकार है?

  4. क्या ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के 1950 से चले आ रहे पुराने नियमों को बिना किसी लिखित भारतीय कानून के आज भी नागरिकों की स्वतंत्रता छीनने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है?

सर्वोच्च अदालत का यह फैसला भारतीय लोकतंत्र, विधायिका की संप्रभुता और नागरिकों के अधिकारों की सीमा तय करने में एक नया मील का पत्थर साबित होगा। पूरे देश की नजरें इस ऐतिहासिक सुनवाई पर टिकी हैं।

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