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शॉर्ट वीडियो का डोपामाइन ट्रैप: रील्स देखने की लत केवल मानसिक-शारीरिक सेहत ही नहीं, बल्कि देश की इकोनॉमी और वर्कप्लेस प्रॉडक्टिविटी को भी दे रही है तगड़ा झटका

आज के समय में सोशल मीडिया ऐप्स पर 15 से 60 सेकंड के शॉर्ट वीडियो यानी रील्स देखना हर उम्र के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। 'बस 5 मिनट रील्स देखूंगा' से शुरू हुआ यह सिलसिला अक्सर घंटों में बदल जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि रील्स से निकलने वाला 'इंस्टेंट डोपामाइन' आपके दिमाग की एकाग्रता (अटेंशन स्पैन), नींद और मानसिक स्थिति को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। लेकिन इस समस्या का एक और चिंताजनक पहलू है जो अब अर्थशास्त्रियों के रडार पर आ चुका है—वह है देश की 'इकोनॉमी' और 'कार्यक्षमता' (Productivity) पर इसका पड़ता भयावह असर। आइए समझते हैं कि कैसे स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उंगलियों से लगातार स्क्रॉल होती रील्स व्यक्तिगत बजट से लेकर देश की जीडीपी (GDP) तक को चपत लगा रही हैं।

वर्किंग आवर्स में गिरावट और भारी प्रॉडक्टिविटी लॉस

किसी भी देश की आर्थिक वृद्धि उसकी कार्यशील आबादी (वर्किंग पॉपुलेशन) की उत्पादकता पर निर्भर करती है। जब कर्मचारी अपने दफ्तर, कारखाने या वर्कप्लेस पर काम के दौरान बार-बार फोन उठाकर रील्स और शॉट्स देखने लगते हैं, तो उनके काम की गति और गुणवत्ता दोनों बुरी तरह प्रभावित होती हैं।

  • अटेंशन स्पैन में कमी: लगातार शॉर्ट फॉर्मेट कंटेंट देखने से इंसानी दिमाग लंबे समय तक एक काम पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Deep Work) खोने लगता है।

  • टास्क-स्विचिंग कॉस्ट: रिसर्च के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति काम के बीच में केवल 2 मिनट के लिए भी रील्स देखता है, तो दोबारा पूरी एकाग्रता से काम में जुटने में दिमाग को 20 मिनट से ज्यादा का वक्त लगता है।

  • आर्थिक नुकसान: कॉर्पोरेट रिपोर्ट्स के अनुसार, कर्मचारियों के इस बिखरे हुए ध्यान (Distracted Working) के कारण वैश्विक कंपनियों और अर्थव्यवस्था को हर साल अरबों डॉलर की प्रॉडक्टिविटी का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

इम्पल्सिव बाइंग और फाइनेंशियल ड्रेन: अनावश्यक खर्चों का मायाजाल

रील्स केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि यह एल्गोरिदम से संचालित एक बड़ा विज्ञापन प्लेटफॉर्म (E-Commerce Ecosystem) बन चुका है। रील्स देखते समय यूज़र्स के सामने उनके मूड और रुचि के अनुसार स्पॉन्सर्ड प्रोडक्ट्स और ट्रेंडिंग रील्स दिखाई जाती हैं।

रील्स देखने के दौरान दिमाग में डोपामाइन का स्तर बढ़ा होता है, जिससे व्यक्ति की तर्कसंगत सोचने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप यूज़र्स ऐसे प्रोडक्ट्स, कपड़े, गैजेट्स या ट्रेंडिंग चीजें बिना सोचे-समझे खरीद लेते हैं (Impulsive Buying), जिनकी उन्हें वास्तव में कोई जरूरत नहीं होती। इसके अलावा, क्रेडिट कार्ड और 'बाय नाउ, पे लेटर' (BNPL) जैसी सुविधाओं के साथ मिलकर यह प्रवृत्ति युवा आबादी को कर्ज के जाल और वित्तीय तंगी में धकेल रही है, जिससे उनकी लंबे समय की बचत (Savings) और निवेश क्षमता खत्म हो रही है।

बढ़ता हेल्थकेयर बर्डन और जनसांख्यिकीय संकट (Demographic Crisis)

रील्स की लत के कारण इंसानी शरीर निष्क्रिय (Sedentary) होता जा रहा है। घंटों बैठकर फोन पर स्क्रॉल करने से युवाओं में मोटापा (Obesity), सर्वाइकल-गर्दन दर्द, आंखों में सूखापन, अनिद्रा (Insomnia), अवसाद और एंग्जायटी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

इसका सीधा असर यह हो रहा है कि लोगों की जेब का एक बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज और दवाइयों (Out-of-Pocket Healthcare Expense) पर खर्च हो रहा है। स्वास्थ्य पर बढ़ता यह अतिरिक्त बोझ न केवल व्यक्तिगत बजट को बिगाड़ रहा है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी खजाने पर भी दबाव बढ़ा रहा है। जो युवा देश के आर्थिक विकास की रीढ़ (Demographic Dividend) बन सकते थे, वे खराब शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के कारण अपनी पूरी क्षमता से योगदान नहीं दे पा रहे हैं।

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