सऊदी और तुर्की के बाद अब इस खाड़ी देश पर डोरे डाल रहा कंगाल पाकिस्तान, क्या फिर जागेगा ‘इस्लामिक नाटो’ का ख्वाब

आर्थिक बदहाली और वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ने के संकट से जूझ रहा पाकिस्तान अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए नए-नए पैंतरे आजमा रहा है। सऊदी अरब और तुर्की जैसे पुराने सहयोगियों से उम्मीद के मुताबिक वित्तीय मदद और कूटनीतिक समर्थन न मिलने के बाद अब इस्लामाबाद ने अपना रुख एक और अमीर खाड़ी देश कुवैत (Kuwait) की तरफ किया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व में देश का शीर्ष नेतृत्व इन दिनों कुवैत के साथ रणनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि इस नई नजदीकी के पीछे सिर्फ कर्ज की गुहार नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे मुस्लिम देशों का एक तथाकथित 'इस्लामिक नाटो' खड़ा करने का पुराना पाकिस्तानी एजेंडा भी छिपा हो सकता है।
आखिर कुवैत के सामने क्यों हाथ फैला रहा है इस्लामाबाद?
पाकिस्तान इस समय विदेशी मुद्रा भंडार की भारी किल्लत और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की कड़ी शर्तों के जाल में फंसा हुआ है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अब पाकिस्तान को मुफ्त में बेलआउट पैकेज देने के बजाय सीधे तौर पर देश की सरकारी संपत्तियों में निवेश करने की शर्त रख दी है। ऐसे में पाकिस्तान को कुवैत एक सुरक्षित और बड़े निवेशक के रूप में दिखाई दे रहा है। पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल कुवैत को तेल रिफाइनरी, कृषि, माइनिंग और आईटी सेक्टर में भारी निवेश के प्रस्ताव दे रहा है। इसके साथ ही पाकिस्तान अपने लाखों कुशल और अकुशल श्रमिकों को कुवैत भेजने के लिए वीजा नियमों में ढील देने की गुहार लगा रहा है ताकि देश में रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) का प्रवाह बढ़ाया जा सके।
मुस्लिम ब्लॉक के जरिए भारत को घेरने की नाकाम कोशिश
भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का कुवैत और तुर्की जैसे देशों के करीब जाना उसकी पुरानी और घिसी-पिटी कूटनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान हमेशा से सऊदी अरब की अगुवाई वाले इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और तुर्की-मलेशिया के साथ मिलकर एक मजबूत मिलिट्री और पॉलिटिकल ब्लॉक यानी 'इस्लामिक नाटो' बनाने का सपना देखता रहा है, ताकि कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। लेकिन पाकिस्तान का यह ख्वाब हमेशा से खोखला साबित हुआ है क्योंकि कुवैत, यूएई और सऊदी अरब जैसे प्रभावशाली खाड़ी देशों के भारत के साथ बेहद मजबूत और गहरे व्यापारिक संबंध हैं, जिन्हें वे पाकिस्तान के कारण दांव पर लगाने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।
शहबाज-मुनीर की इस महत्वाकांक्षी चाल में छिपे हैं बड़े खतरे
इस समय जब मध्य-पूर्व (Middle East) में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है, पाकिस्तान की यह कूटनीतिक पैंतरेबाजी उस पर खुद भारी पड़ सकती है। कुवैत और अन्य खाड़ी देश इस समय क्षेत्रीय स्थिरता पर ध्यान दे रहे हैं न कि किसी नए सैन्य या वैचारिक गुटबाजी पर। जानकारों का कहना है कि अगर पाकिस्तान ने खाड़ी देशों को अपने रक्षा एजेंडे या इस्लामिक ब्लॉक की राजनीति में घसीटने की कोशिश की, तो उसे लेने के देने पड़ सकते हैं। लखनऊ और दिल्ली के विदेश नीति विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि पाकिस्तान अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को छोड़कर कूटनीतिक चालबाजियों में उलझा रहा, तो वह कुवैत से मिलने वाले संभावित आर्थिक सहयोग और निवेश से भी हाथ धो बैठेगा।