सिगरेट छुए बिना भी घर में काम करने वाली महिलाओं में बढ़ रहा लंग कैंसर का खतरा? डॉक्टर से जानिए इसके चौंकाने वाले 5 मुख्य कारण

फेफड़ों के कैंसर यानी लंग कैंसर को लेकर दशकों से यह आम धारणा रही है कि यह बीमारी केवल बीड़ी, सिगरेट या तंबाकू का अत्यधिक सेवन करने वाले लोगों को ही अपनी चपेट में लेती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सामने आए चिकित्सकीय आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। अस्पतालों में लंग कैंसर के इलाज के लिए पहुंचने वाली महिलाओं में एक बड़ा अनुपात उन गृहिणियों का है जिन्होंने जीवन में कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया। मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट और पल्मोनोलॉजिस्ट चेतावनी दे रहे हैं कि घर की चारदीवारी के भीतर मौजूद 'साइलेंट किलर' यानी इनडोर पॉल्यूशन महिलाओं के फेफड़ों को उसी तरह नुकसान पहुंचा रहा है जैसे दिन में 15 से 20 सिगरेट पीने वाले व्यक्ति के फेफड़ों को पहुंचता है।
रसोई का खतरनाक धुआं और भारतीय कुकिंग ऑयल्स का तड़का
भारतीय घरों में खाना बनाने की शैली में छौंक, डीप फ्राइंग और तेज आंच पर तेल गर्म करने का चलन आम है। सरसों का तेल, रिफाइंड या घी जब अपने स्मोकिंग पॉइंट (Smoking Point) से ज्यादा गर्म होते हैं, तो वे टूटकर पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAH), एक्रिलिन और वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (VOCs) जैसे खतरनाक रासायनिक तत्व हवा में छोड़ते हैं।
जब महिलाएं बिना पर्याप्त एग्जॉस्ट या चिमनी वाले छोटे किचन में रोजाना घंटों खड़े होकर खाना पकाती हैं, तो यह जहरीला धुआं सीधे सांस के जरिए उनके फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाता है। सालों तक इस जहरीले तेल के धुएं और महीन कणों (PM 2.5) के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कोशिकाओं (Cells) के डीएनए में म्यूटेशन होने लगता है, जो धीरे-धीरे एडेनोकार्सिनोमा (Adenocarcinoma) यानी फेफड़ों के कैंसर का रूप ले लेता है।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में बायोमास फ्यूल और चूल्हे का जहर
भारत के टियर-2, टियर-3 शहरों और ग्रामीण परिवेश में आज भी कई घरों में लकड़ी, कोयला, उपले (कंडे) और मिट्टी के तेल का इस्तेमाल भोजन पकाने के लिए किया जाता है। बायोमास ईंधन से निकलने वाला काला गाढ़ा धुआं कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और कार्सिनोजेनिक (कैंसर पैदा करने वाले) सूक्ष्म कणों से भरा होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, बायोमास ईंधन के धुएं के बीच रोजाना तीन से चार घंटे गुजारना रोजाना 40 सिगरेट पीने के बराबर फेफड़ों को क्षति पहुंचाता है। रसोई घरों में उचित वेंटिलेशन (हवा की निकासी) न होने के कारण यह धुआं घर के भीतर ही जम जाता है, जिससे गृहणियों के फेफड़े समय से पहले कमजोर होकर कैंसरकारी बदलावों के प्रति अतिसंवेदनशील हो जाते हैं।
पैसिव स्मोकिंग: दूसरों की सिगरेट का धुआं बना रहा शिकार
घर में काम करने वाली महिलाओं के लिए दूसरा सबसे बड़ा जानलेवा खतरा 'सेकेंड हैंड स्मोक' या पैसिव स्मोकिंग है। परिवार के किसी सदस्य (पति, ससुर या बेटे) द्वारा घर के अंदर बैठकर बीड़ी या सिगरेट पीने पर उस धुएं का 80 फीसदी हिस्सा कमरे की हवा में तैरता रहता है।
सिगरेट के जलते हुए सिरे से निकलने वाले साइड-स्ट्रीम धुएं में सीधे खींचे जाने वाले धुएं की तुलना में अमोनिया, कार्बन मोनोऑक्साइड और बेंजीन जैसे टॉक्सिन्स की सांद्रता अधिक होती है। घर में दिनभर मौजूद रहने वाली महिलाएं लगातार इस अनचाहे धुएं को सांस में लेती हैं, जिससे उनके फेफड़ों की परतें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसके अलावा, सोफे, परदों और दीवारों पर जमा होने वाला निकोटिन (थर्ड हैंड स्मोक) भी लंबे समय तक घर की हवा को दूषित बनाए रखता है।
घर का खराब वेंटिलेशन और इनडोर एयर पॉल्यूशन
आधुनिक फ्लैट कल्चर और तंग रिहायशी कॉलोनियों में बने घरों में प्राकृतिक धूप और ताजी हवा के आने-जाने की समुचित व्यवस्था नहीं होती। सीलबंद कमरों में मॉस्किटो कॉइल (मच्छर मारने वाली अगरबत्ती), खुशबूदार अगरबत्तियां, रूम फ्रेशनर स्प्रे और केमिकल युक्त फ्लोर क्लीनर्स का नियमित इस्तेमाल घर के भीतर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) खतरनाक स्तर पर पहुंचा देता है।
एक मॉस्किटो कॉइल को रातभर कमरे में जलाकर सोना लगभग 100 सिगरेट के धुएं जितना पार्टिकुलेट मैटर हवा में छोड़ता है। कई पुरानी इमारतों में बेसमेंट या दीवारों से निकलने वाली अदृश्य 'रेडॉन गैस' (Radon Gas) भी बिना धूप-हवा वाले घरों में जमा हो जाती है, जिसे गैर-धूम्रपान करने वालों में फेफड़ों के कैंसर का दूसरा सबसे प्रमुख कारण माना जाता है।
शुरुआती लक्षण और महिलाओं के लिए बचाव के जरूरी कदम
महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर का पता अक्सर तीसरी या चौथी स्टेज में चलता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षणों—जैसे लगातार तीन हफ्ते से ज्यादा खांसी रहना, सांस फूलना, सीने में भारीपन, बार-बार ब्रोंकाइटिस या निमोनिया होना और बेवजह वजन घटना—को वे सामान्य थकावट या मौसमी एलर्जी समझकर नजरअंदाज कर देती हैं।
इस गंभीर खतरे से बचने के लिए कुछ सावधानियां बेहद जरूरी हैं:
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किचन में उच्च सक्शन क्षमता वाली चिमनी या शक्तिशाली एग्जॉस्ट फैन जरूर लगवाएं और खाना बनाते समय खिड़कियां खुली रखें।
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कुकिंग ऑयल्स को बार-बार बहुत तेज आंच पर धुआं उठने तक न जलाएं और तलने वाले तेल का दोबारा इस्तेमाल करने से बचें।
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घर के अंदर किसी भी सदस्य को धूम्रपान करने की सख्त मनाही रखें।
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बंद कमरों में अगरबत्ती या मच्छर भगाने वाली कॉइल जलाने के बजाय मच्छरदानी या प्राकृतिक उपायों का उपयोग करें।
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अगर लगातार खांसी ठीक न हो रही हो या सांस लेने में परेशानी महसूस हो, तो तुरंत चेस्ट फिजिशियन से परामर्श लें और लो-डोज सीटी स्कैन (LDCT) की जांच करवाएं।