उत्तर प्रदेश

सिर्फ गिरफ्तारी ही समाधान नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट का वो फैसला, जो पुलिस और कानून के बीच की धुंध को साफ कर देगा

News India Live, Digital Desk: कानून के बारे में एक आम धारणा यह रही है कि अगर कोई आरोपी पुलिस के बुलाने पर नहीं आता या कोर्ट उसे ‘भगोड़ा’ (घोषित अपराधी) करार दे देता है, तो उसके पास से ‘अग्रिम जमानत’ (Anticipatory Bail) मांगने का हक खत्म हो जाता है। अक्सर वकील भी अपने क्लाइंट्स से यही कहते थे कि भाई, अब तो तुम घोषित अपराधी हो गए हो, अब बेल नहीं मिलेगी। लेकिन हाल ही मेंइलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस पर एक ऐसी टिप्पणी की है, जो कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ चुकी है।अदालत ने क्या कहा? (सरल भाषा में)इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ़ किया है कि महज़ ‘घोषित अपराधी’ होने के आधार पर किसी भी आरोपी को अग्रिम जमानत मांगने से नहीं रोका जा सकता। अदालत का मानना है कि ‘स्वतंत्रता’ यानी आज़ादी हर इंसान का एक मौलिक अधिकार है, और कोई कानूनी ‘टैग’ इसे पूरी तरह से नहीं छीन सकता। जज साहब ने साफ कहा कि आरोपी की अर्जी (Application) सुनी जानी चाहिए, भले ही उसे पहले भगोड़ा घोषित क्यों न कर दिया गया हो।ये फैसला इतना ज़रूरी क्यों है?देखा जाए तो पुराने फैसलों में हमेशा यही कहा गया कि जो शख्स कानून से भाग रहा है, उसे कानून का फायदा नहीं मिलना चाहिए। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यहाँ ‘मानवीय दृष्टिकोण’ को ऊपर रखा है। कई बार ऐसा भी होता है कि पुलिस की गलत कार्रवाई या सूचना के अभाव में किसी व्यक्ति को भगोड़ा घोषित कर दिया जाता है। ऐसे में उस व्यक्ति के पास खुद को सही साबित करने और गिरफ्तारी से बचने का एक रास्ता खुला रहना चाहिए।क्या इसका मतलब ये है कि अब सबको जमानत मिल जाएगी?यहाँ थोड़ा सा ‘कैच’ (Catch) है। अदालत ने सिर्फ ये कहा है कि उनकी अर्जी’सुनवाई के योग्य’ (Maintainable) है। इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हर फरार अपराधी को अब सीधे जमानत दे दी जाएगी। कोर्ट ने साफ़ किया है कि अर्जी तो स्वीकार की जा सकती है, लेकिन जब फैसला सुनाने की बारी आएगी, तब उस आरोपी के पिछले व्यवहार, उसके भागने की वजह और जांच में सहयोग न करने जैसी बातों पर गौर किया जाएगा। यानी, अर्जी देने का ‘हक’ तो है, पर ‘गारंटी’ नहीं।कानून और व्यक्तिगत आज़ादी का तालमेलयह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी उम्मीद है जो किसी न किसी कानूनी दांव-पेच में फँसकर अपनी बात कोर्ट के सामने नहीं रख पा रहे थे। हाई कोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि न्याय की कुर्सी पर बैठकर आज़ादी को छीनना आखिरी रास्ता होना चाहिए, न कि पहला।आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या फरार हो चुके अपराधियों को बेल मांगने का मौका देना सही है या इससे पुलिस की जांच में और मुश्किलें आएंगी? कमेंट में अपनी राय हमें जरूर बताएं।

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