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हरियाणा में नई लैंड पूलिंग पॉलिसी 2026 मंजूर: जमीन देने पर 50% विकसित एरिया और ₹1 लाख सालाना मदद

हरियाणा सरकार ने राज्य में शहरीकरण, आधुनिक टाउनशिप और औद्योगिक गलियारों के निर्माण के लिए जमीन देने वाले किसानों और भू-मालिकों के हितों की रक्षा हेतु एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में बहुप्रतीक्षित 'लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026' (Land Pooling Policy-2026) को औपचारिक मंजूरी प्रदान कर दी गई है। यह नीति पुरानी 2022 की पॉलिसी का स्थान लेगी, जिसमें बाजार मूल्य और मुआवजे की जटिल गणना के कारण किसानों के बीच असंतोष बना रहता था। नई नीति का मुख्य उद्देश्य जबरन भूमि अधिग्रहण के दौर को पूरी तरह समाप्त कर किसानों को विकास की प्रक्रिया में सीधा शेयरधारक और बराबर का साझीदार बनाना है।

सरकार की इस नीति से गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला, सोनीपत और रोहतक समेत पूरे प्रदेश में बुनियादी ढांचे का विस्तार बिना किसी गतिरोध के तेजी से हो सकेगा। कृषि प्रधान राज्य होने के नाते हरियाणा में किसानों की जमीन को उनकी सबसे बड़ी पूंजी और विरासत माना जाता है। सरकार के अनुसार, यह नया कानूनी ढांचा सुनिश्चित करता है कि किसान केवल अपनी पैतृक जमीन गंवाने वाले लाचार पक्षकार न रहें, बल्कि आधुनिक शहरों के निर्माण से सृजित होने वाली रियल एस्टेट संपत्ति के सीधे हकदार बनें।

50 फीसदी विकसित जमीन की गारंटी: जानिए प्लॉट आवंटन का नया गणित

नई लैंड पूलिंग नीति का सबसे आकर्षक पहलू विकसित भूमि के बंटवारे का स्पष्ट और पारदर्शी फॉर्मूला है। स्वीकृत लेआउट प्लान के अनुसार परियोजना के कुल बिक्री योग्य (Saleable) क्षेत्र का सीधा 50 प्रतिशत हिस्सा भू-मालिकों को वापस दिया जाएगा। बाकी बचा 50 प्रतिशत क्षेत्र विकास एजेंसी—जैसे हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) या HSIIDC—के पास रहेगा, जिसका उपयोग चौड़ी सड़कें, सीवरेज, हरित पार्क, जल निकासी जैसी नागरिक सुविधाएं तैयार करने और प्रशासनिक लागत निकालने के लिए किया जाएगा।

किसानों को उनके दिए गए रकबे के अनुपात में आवासीय, वाणिज्यिक, संस्थागत या औद्योगिक भूखंड दिए जाएंगे। नीति में यह भी तय किया गया है कि बड़े रकबे वाले भू-मालिकों को अनिवार्य रूप से कॉमर्शियल कियोस्क या बूथ आवंटित किए जाएंगे, जिससे उन्हें भविष्य में नियमित किराए की आय प्राप्त हो सके। इसके अलावा भूखंडों के विखंडन को रोकने के लिए न्यूनतम साइज भी तय किए गए हैं, जिसके तहत आवासीय भूखंड न्यूनतम 100 वर्ग मीटर, औद्योगिक 250 वर्ग मीटर और संस्थागत 500 वर्ग मीटर के आकार के होंगे। जिन छोटे भू-मालिकों का योगदान 999 वर्ग मीटर से कम का होगा, उन्हें नए भूमि अधिग्रहण कानून (LARR Act 2013) के तय मुआवजे या आरक्षित दर, जो भी अधिक हो, के अनुसार नकद भुगतान किया जाएगा।

चार साल तक ₹1 लाख प्रति एकड़ अंतरिम सहायता और 9% ब्याज का कड़ा नियम

अक्सर देखा जाता है कि जब किसान अपनी खेती योग्य जमीन विकास परियोजना को सौंपते हैं, तो इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने में लंबा वक्त लग जाता है और उस दौरान उनकी नियमित फसल की आमदनी बंद हो जाती है। इस आर्थिक संकट को दूर करने के लिए हरियाणा सरकार ने प्रति एकड़ ₹1 लाख की वार्षिक अंतरिम वित्तीय सहायता का प्रावधान किया है। यह राशि सेल डीड पंजीकरण की तिथि से लगातार चार वर्षों तक किसानों के खातों में सीधे भेजी जाएगी।

नीति में नौकरशाही की हीला-हवाली पर रोक लगाने के लिए जवाबदेही भी तय की गई है। यदि विकास एजेंसी सेल डीड होने के 15 दिनों के भीतर इस वित्तीय सहायता का भुगतान करने में विफल रहती है, तो संबंधित भू-मालिक को देरी की अवधि के लिए 9 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज सहित भुगतान करना अनिवार्य होगा। यह प्रावधान किसानों को एक तरह से सामाजिक और वित्तीय सुरक्षा कवच प्रदान करता है, ताकि विकास की अवधि के दौरान उनके परिवार की आजीविका पर कोई आंच न आए।

4 साल में प्रोजेक्ट पूरा करने की डेडलाइन, काम न होने पर जमीन होगी वापस

पुरानी लैंड पूलिंग व्यवस्था में परियोजनाओं के पूरा होने की कोई ठोस समय-सीमा न होने के कारण योजनाएं वर्षों तक लटकी रहती थीं। नई लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 में प्रोजेक्ट पूर्णता की समय-सीमा को 5 वर्ष से घटाकर कड़ाई से 4 वर्ष कर दिया गया है। यदि विकास एजेंसी अंतिम योजना मंजूरी के बाद 4 वर्ष की तय अवधि के भीतर बुनियादी ढांचे का निर्माण पूरा नहीं कर पाती है, तो जमीन स्वतः भू-मालिकों को वापस लौटा दी जाएगी।

इसके साथ ही भू-मालिकों की सुविधा के लिए लैंड एंटाइटेलमेंट सर्टिफिकेट्स (LEC) को आपस में क्लब करने की छूट दी गई है, जिससे एक ही परिवार या गांव के लोग मिलकर बड़ा संयुक्त भूखंड हासिल कर सकें। वहीं, विकास एजेंसी द्वारा भूखंडों की बायबैक अवधि को 1 वर्ष से बढ़ाकर 3 वर्ष कर दिया गया है, ताकि जो किसान विकसित जमीन अपने पास न रखकर तुरंत नकदी चाहते हैं, वे सरकार को तय दरों पर अपनी जमीन वापस बेच सकें।

बिचौलियों पर लगाम और अवैध कॉलोनियों के मकड़जाल पर प्रहार

राज्य में जमीन अधिग्रहण के नाम पर सक्रिय अवैध दलालों और बेतरतीब कटने वाली अवैध कॉलोनियों पर रोक लगाने के लिए नीति में 'लैंड एग्रीगेटर' की भूमिका को कानूनी रूप दिया गया है। पंजीकृत संपत्ति एजेंटों को एग्रीगेटर बनने की अनुमति दी गई है, जिन्हें संबंधित राजस्व संपदा के कलेक्टर रेट का अधिकतम 0.5 प्रतिशत पारिश्रमिक दिया जाएगा। यह भुगतान किसान की जेब से नहीं कटेगा, बल्कि विकास एजेंसी द्वारा सीधे किया जाएगा।

सरकार का मानना है कि यह नीति किसानों को जबरन विस्थापन के डर से मुक्त करेगी और उन्हें आधुनिक औद्योगिक व आवासीय विकास का बराबर का साझेदार बनाएगी। हरियाणा का यह 50-50 विकास मॉडल न केवल किसानों को समृद्ध करेगा बल्कि राज्य के नियोजित और आधुनिक विकास को भी नई रफ्तार देगा।

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