युद्ध के धुएं में दम तोड़ता पर्यावरण: आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना और बारूद के ढेर पर खड़ी हमारी पृथ्वी

आज जब हम जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन और जैव विविधता जैसे भारी-भरकम शब्दों के ‘बौद्धिक जंगल’ में जी रहे हैं, तब एक कड़वी सच्चाई हमारे सामने खड़ी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पृथ्वी को बचाने के लंबे-चौड़े संकल्प लिए जाते हैं, लेकिन जैसे ही युद्ध का नगाड़ा बजता है, पर्यावरण की सारी नैतिकता मिसाइलों के धुएं में विलीन हो जाती है। यह आधुनिक सभ्यता का वह चेहरा है जहाँ शक्ति और भू-राजनीति के सामने प्रकृति का मौन रुदन किसी को सुनाई नहीं देता।बारूद से भरता वातावरण: रूस-यूक्रेन से लेकर मध्य-पूर्व तक की त्रासदीदुनियाभर में प्रदूषण एक लाइलाज बीमारी बनती जा रही है। एक तरफ हम ‘ग्रीन एनर्जी’ की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे युद्धों में धरती के फेफड़ों को बारूद से भर रहे हैं। जब कोई मिसाइल तेल भंडार या रासायनिक कारखाने पर गिरती है, तो केवल इमारतें नहीं ढहतीं, बल्कि हवा में वह जहर घुलता है जो पीढ़ियों तक पीछा नहीं छोड़ता। विडंबना देखिए, जो विकसित देश पर्यावरण संरक्षण के सबसे बड़े प्रवक्ता बनते हैं, वही युद्ध के मैदान में हथियारों की सबसे बड़ी मंडी सजाए बैठे हैं।इतिहास के जख्म और वर्तमान का जहर: वियतनाम से गाजा तकयुद्ध का पर्यावरणीय विनाश नया नहीं है, लेकिन इसकी भयावहता बढ़ती जा रही है:1991 का खाड़ी युद्ध: महीनों तक कुवैत के तेल कुओं से निकलता काला धुआं पर्यावरण पर सबसे बड़ा हमला था।वियतनाम युद्ध: ‘एजेंट ऑरेंज’ जैसे रसायनों ने लाखों हेक्टेयर जंगलों को रेगिस्तान बना दिया।वर्तमान मध्य-पूर्व संकट: इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल मानवीय त्रासदी नहीं है। गाजा की धरती पर हजारों टन बमों की बरसात ने मिट्टी को विषैला बना दिया है और समुद्री तटों को प्रदूषित कर दिया है।युद्ध का ‘हिडन’ कार्बन फुटप्रिंट: टैंक और लड़ाकू विमानों की भूखक्या आपने कभी सोचा है कि एक लड़ाकू विमान या विशाल टैंक कितना ईंधन डकारता है? युद्ध के दौरान होने वाला कार्बन उत्सर्जन कई छोटे देशों के कुल वार्षिक उत्सर्जन से भी अधिक होता है। फिर भी, COP जैसे जलवायु सम्मेलनों में सैन्य उत्सर्जन पर चर्चा क्यों नहीं होती? क्योंकि युद्ध के समय राष्ट्रवाद की चादर के नीचे पर्यावरण की बलि चढ़ा दी जाती है। युद्ध और पर्यावरण संकट एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—दोनों ही विनाश की पटकथा लिखते हैं।नैतिकता का दोहरा मापदंड: विकासशील बनाम विकसित देशसबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जो देश सबसे बड़ी सैन्य शक्ति रखते हैं, वही विकासशील देशों को कार्बन कम करने का पाठ पढ़ाते हैं। क्या पर्यावरण की चिंता केवल एक राजनीतिक औजार है? जब किसी गरीब देश की फैक्ट्री धुआं निकालती है तो सवाल उठते हैं, लेकिन जब किसी विकसित देश का मिसाइल उद्योग पूरी हवा को जहरीला करता है, तो चुप्पी साध ली जाती है। पृथ्वी किसी एक देश की जागीर नहीं है; तेल के कुएं कहीं भी जलें, उसका धुआं पूरी मानवता की साझा विरासत यानी ‘हवा’ को दूषित करता है।