65 की उम्र में भी मां बनती हैं यहां की महिलाएं, 120 साल तक जीवन और बेमिसाल खूबसूरती! जानें हुंजा घाटी के लोगों की लंबी उम्र और सेहत का रहस्य

दुनिया भर में जहां 40 से 50 साल की उम्र के बाद इंसान बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगता है और कई तरह की शारीरिक बीमारियों से घिर जाता है, वहीं इस धरती पर एक ऐसी जगह भी मौजूद है जहां के लोग 100 से 120 साल तक बहुत ही आसानी से स्वस्थ जीवन जीते हैं। हम बात कर रहे हैं भारत के उत्तरी क्षेत्र के करीब स्थित हुंजा घाटी (Hunza Valley) की, जो गिलगित-बाल्टिस्तान के पहाड़ों के बीच बसी हुई है। इस घाटी में रहने वाली हुंजा या बुरुशो जनजाति के लोग अपनी असाधारण उम्र, बेमिसाल खूबसूरती और मजबूत स्टेमिना के लिए पूरी दुनिया में चर्चित हैं। सबसे ज्यादा हैरान कर देने वाली बात यह है कि इस समुदाय की महिलाएं 60 से 65 वर्ष की उम्र में भी स्वाभाविक रूप से गर्भधारण कर बच्चों को जन्म दे सकती हैं और 80 साल की बुजुर्ग महिला भी देखने में महज 30 या 35 साल की युवा नजर आती है।
आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा जगत के लिए हुंजा घाटी के लोगों की जीवनशैली हमेशा से शोध का विषय रही है। जहां आज के आधुनिक समाज में खान-पान की खराब आदतों और प्रदूषण के कारण लोग कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं, वहीं हुंजा जनजाति में कैंसर, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का नामोनिशान तक देखने को नहीं मिलता।
हुंजा घाटी की खूबसूरत महिलाएं और 65 की उम्र में मां बनने का अनोखा रहस्य
हुंजा घाटी की महिलाओं की सुंदरता और उनकी प्रजनन क्षमता (Fertility) दुनिया भर के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को आश्चर्यचकित करती है। सामान्य तौर पर महिलाओं में 45 से 50 वर्ष की उम्र के आसपास मेनोपॉज (Menopause) की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, जिसके बाद प्राकृतिक रूप से मां बनना संभव नहीं होता। लेकिन हुंजा समुदाय की महिलाओं में जैविक घड़ी (Biological Clock) अलग तरीके से काम करती प्रतीत होती है। शुद्ध वातावरण, पोषक तत्वों से भरपूर प्राकृतिक खान-पान और शून्य मानसिक तनाव के कारण उनका हार्मोनल संतुलन बुढ़ापे में भी बना रहता है।
यहां की महिलाएं 60 से 65 साल की आयु में भी आसानी से गर्भधारण कर सकती हैं और स्वस्थ बच्चों को जन्म देती हैं। इसके अलावा, उनकी त्वचा पर उम्र का असर बहुत देर से दिखता है। 70-80 साल की महिलाएं भी बिना किसी केमिकल या कॉस्मेटिक प्रॉडक्ट के बेहद जवां, चमकदार और झुर्रियों से मुक्त त्वचा की मालिक होती हैं।
120 से 145 साल तक की लंबी उम्र और बिना कैंसर-बीमारी का जीवन
दुनिया भर के स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, हुंजा समुदाय के लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) लगभग 120 वर्ष मानी गई है, जबकि कई बुजुर्ग 145 साल तक की आयु भी जीवित रहते हैं। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि अपनी जीवनयात्रा के अंतिम दिनों तक ये लोग शारीरिक रूप से पूरी तरह सक्रिय और स्वावलंबी रहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि हुंजा लोगों में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि उनका शरीर प्राकृतिक रूप से एंटी-ऑक्सीडेंट्स और आवश्यक मिनरल्स से इतना समृद्ध रहता है कि फ्री रेडिकल्स और कैंसर सेल्स शरीर में पनप ही नहीं पाते।
क्या खाते हैं हुंजा जनजाति के लोग? जानिए उनकी अनोखी डाइट
हुंजा घाटी के लोगों की लंबी उम्र और प्राकृतिक सुंदरता का सबसे बड़ा राज उनका शुद्ध और सादा खान-पान है। यह जनजाति मुख्य रूप से शाकाहारी भोजन पर निर्भर रहती है। उनके दैनिक आहार में प्रोसेस्ड फूड, रिफाइंड ऑयल, कृत्रिम चीनी या प्रिजर्वेटिव्स की कोई जगह नहीं होती।
वे अपने खेतों में उगाई गई प्राकृतिक और बिना रासायनिक खाद वाली चीजें खाते हैं। उनके भोजन में मुख्य रूप से जौ, बाजरा, कुट्टू, गेहूं, ताजी हरी सब्जियां, अंकुरित अनाज और मेवे (जैसे बादाम और अखरोट) शामिल होते हैं। वे मांस का सेवन बहुत ही कम करते हैं और केवल विशेष त्योहारों या सर्दियों के मौसम में ही सीमित मात्रा में मांस खाते हैं।
ग्लेशियर का मिनरल वाटर और खुबानी (Apricot): सेहत की असली चाबी
हुंजा समुदाय के स्वास्थ्य का सबसे बड़ा रहस्य खुबानी (Apricot) और ग्लेशियर से बहकर आने वाला पानी है। इस क्षेत्र में खुबानी की पैदावार बहुत अधिक होती है। हुंजा लोग ताजी और सूखी खुबानी का प्रचुर मात्रा में सेवन करते हैं। वे न केवल खुबानी का फल खाते हैं, बल्कि उसके बीज के अंदर मौजूद गिरी का तेल भी निकालते हैं।
खुबानी के बीजों में विटामिन बी-17 (Amygdalin) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जिसे कई वैज्ञानिक शोधों में एंटी-कैंसर एजेंट के रूप में जाना गया है। इसके अलावा, साल में 2 से 3 महीने जब खुबानी की नई फसल आने वाली होती है, तब हुंजा लोग ठोस भोजन छोड़कर केवल खुबानी के रस (Apricot Juice) का सेवन करते हैं। इस उपवास प्रक्रिया से उनके शरीर का पूर्ण डिटॉक्सिफिकेशन (Detoxification) हो जाता है।
पानी की बात करें तो वे पहाड़ों और ग्लेशियर्स से पिघलकर आने वाला बर्फीला पानी पीते हैं। इस पानी में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम और आयरन जैसे आवश्यक मिनरल्स भारी मात्रा में मौजूद होते हैं, जो उनके शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा और मजबूती देते हैं।
कठिन पहाड़ी जीवन, शारीरिक मेहनत और तनावमुक्त माहौल
हुंजा घाटी में जीवन कोई ऐशो-आराम वाला नहीं है, बल्कि यहां के लोगों को जीवित रहने के लिए कड़ी शारीरिक मेहनत करनी पड़ती है। 80 और 90 साल के बुजुर्ग भी ऊंचे और ढलानदार पहाड़ी रास्तों पर रोज कई किलोमीटर पैदल चलते हैं और खेतों में मेहनत करते हैं। सुबह तड़के उठना और रात को सूरज ढलते ही सो जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य के मामले में हुंजा समाज दुनिया के सबसे शांतिप्रिय समुदायों में से एक है। यहां अपराध दर लगभग शून्य है। आपस में मिलकर रहना, हंसी-खुशी समय बिताना, ध्यान लगाना और आधुनिक जीवन की प्रतिस्पर्धी दौड़ व तनाव से दूर रहना उनकी जीवनशैली का सबसे सुंदर पहलू है। मानसिक तनाव न होने के कारण उनके शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) का स्तर नियंत्रित रहता है, जो उन्हें लंबे समय तक जवां बनाए रखता है।
क्या कहते हैं दुनिया भर के डॉक्टर और वैज्ञानिक? जानिए असली सच्चाई
ब्रिटिश चिकित्सक डॉ. रॉबर्ट मैककैरिसन (Dr. Robert McCarrison) ने हुंजा जनजाति पर कई वर्षों तक अध्ययन किया था। उन्होंने पाया कि हुंजा लोगों की असाधारण सेहत के पीछे उनकी प्राकृतिक जीवनशैली, संतुलित आहार, स्वच्छ हवा और ग्लेशियर का मिनरल वाटर ही मुख्य कारण है।
हालांकि, आधुनिक समय में कुछ शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि लिखित जन्म प्रमाण पत्र न होने के कारण उम्र के दावों में कुछ अंतर हो सकता है, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि हुंजा लोगों का शारीरिक स्वास्थ्य, फिटनेस, स्किन क्वालिटी और लंबी उम्र आधुनिक दुनिया के लिए एक मिसाल है। यदि आधुनिक समाज भी प्रोसेस्ड फूड छोड़कर प्राकृतिक आहार, शारीरिक गतिविधि और तनावमुक्त जीवनशैली को अपनाए, तो कई गंभीर बीमारियों से आसानी से बचा जा सकता है।