9 या 10 अक्टूबर, सर्वपितृ अमावस्या कब है? सही तारीख के साथ डायरी में नोट करें श्राद्ध और तर्पण का शुभ मुहूर्त

भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलने वाला 16 दिनों का पितृपक्ष अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम दिन 'सर्वपितृ अमावस्या' (Sarva Pitru Amavasya) अथवा पितृ विसर्जन अमावस्या कहलाता है। इस दिन ज्ञात और अज्ञात सभी पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज कराने का विधान शास्त्रों में सर्वोपरि माना गया है। इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या की सही तारीख को लेकर श्रद्धालुओं के बीच काफी असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि पितृ विसर्जन का श्राद्ध 9 अक्टूबर को किया जाए या 10 अक्टूबर को। हिंदू वैदिक पंचांग की सूक्ष्म गणनाओं के अनुसार, आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर 2026 को दोपहर बाद से प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर 2026 की दोपहर तक प्रभावी रहेगी। सनातन धर्म और धर्मसिंधु ग्रंथ के अनुसार, पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म सदैव 'अपराह्न व्यापिनी' यानी दोपहर के समय लगने वाली तिथि में ही सर्वोत्तम फलदायी होता है। इस शास्त्रीय नियम के आधार पर सर्वपितृ अमावस्या का मुख्य श्राद्ध, तर्पण और विसर्जन 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को मनाना ही शास्त्रसम्मत और प्रामाणिक है।
सर्वपितृ अमावस्या का धार्मिक महत्व और क्यों कहते हैं इसे मोक्षदायिनी तिथि?
गरुड़ पुराण, मत्स्य पुराण और मार्कंडेय पुराण में सर्वपितृ अमावस्या को समस्त तिथियों का मुकुटमणि कहा गया है। सामान्यतः जिन पितरों की मृत्यु तिथि (प्रतिपदा, द्वितीया, नवमी, एकादशी आदि) परिजनों को ज्ञात होती है, उनका श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाता है। परंतु यदि किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, अकाल मृत्यु हुई हो, या किसी अपरिहार्य कारणवश पितृपक्ष के 15 दिनों में किसी विशिष्ट तिथि पर श्राद्ध करने से चूक गए हों, तो उन सभी के निमित्त सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने से पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है। मान्यता है कि इस पावन दिन पितृ लोक से धरती पर आए सभी पितृगण अपने वंशजों द्वारा दिए गए जलांजलि और अन्न-जल को ग्रहण करके तृप्त होते हैं तथा जाते समय अपने परिवार को दीर्घायु, आरोग्य, वंश वृद्धि और धन-धान्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसके बाद पितृगण पुनः पितृ लोक को प्रस्थान करते हैं, इसलिए इसे 'पितृ विसर्जनी अमावस्या' या 'महालया' भी कहा जाता है।
तिथि का समय और तर्पण के 3 सबसे शुभ मुहूर्त
श्राद्ध और तर्पण का कार्य कभी भी प्रातःकाल, संध्याकाल या रात्रि में नहीं किया जाता। इसके लिए शास्त्रों में दोपहर के तीन विशिष्ट मुहूर्त—कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल—निर्धारित किए गए हैं। 10 अक्टूबर 2026 को श्राद्ध अनुष्ठान संपन्न करने के लिए निम्नलिखित समय-सारणी अपनी डायरी में अवश्य नोट कर लें:
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अमावस्या तिथि प्रारंभ: 9 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12:20 बजे से
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अमावस्या तिथि समाप्त: 10 अक्टूबर 2026 को दोपहर 01:45 बजे तक
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कुतुप मुहूर्त (Kutup Muhurat): 10 अक्टूबर को सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक। इस काल में पितरों के लिए संकल्प, जल तर्पण और पिंडदान शुरू करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
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रौहिण मुहूर्त (Rauhin Muhurat): दोपहर 12:31 बजे से दोपहर 01:17 बजे तक। यह समय अन्नदान, हवन और देव-पितृ पूजा के लिए अत्यंत फलदायी है।
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अपराह्न काल (Aparahna Kaal): दोपहर 01:17 बजे से दोपहर 03:35 बजे तक। ब्राह्मण भोज, पंचबलि भोग और श्राद्ध की अंतिम पूर्णाहुति इस समय में संपन्न की जानी चाहिए।
सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण की सरल व प्रामाणिक विधि
पितृ विसर्जन के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हों और श्वेत (सफेद) स्वच्छ वस्त्र धारण करें। किसी पवित्र नदी के तट पर अथवा घर के शांत ईशान या पूर्व-उत्तर कोने में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक तांबे या पीतल के पात्र में शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा गाय का दूध, काले तिल, जौ, सफेद पुष्प और तुलसी दल मिलाएं। अपने दाहिने हाथ की अनामिका (रिंग फिंगर) में कुशा (घास) की बनी पवित्री धारण करें। इसके बाद दोनों हाथों की अंजलि में जल भरकर अपने पितरों का स्मरण करते हुए 'ॐ पितृभ्यः नमः' मंत्र के साथ अंगूठे के माध्यम से जल अर्पित करें। अंगूठे के माध्यम से जल देने को 'पितृ तीर्थ' कहा जाता है, जिससे अर्पित जल सीधे पितरों तक पहुंचता है। तर्पण के उपरांत कंडे (उपले) पर खीर, पूरी और घी की आहुति देकर धूप-दीप करें।
पंचबलि भोग: इन 5 जीवों को भोजन कराए बिना अधूरा रहता है श्राद्ध
सर्वपितृ अमावस्या के श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन कराने से पहले 'पंचबलि' निकालना अनिवार्य वैदिक विधान है। इसका आशय पांच विशिष्ट जीवों और देवताओं को भोजन अर्पित करना है, जो पितरों के दूत माने जाते हैं:
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गौ बलि (गाय): सबसे पहले गाय के लिए एक पत्तल पर भोजन का भाग निकालें। गाय में तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का वास होता है।
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श्वान बलि (कुत्ता): दूसरा भाग यमराज के दूत माने जाने वाले कुत्ते के लिए अलग रखें।
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काक बलि (कौवा): तीसरा भाग कौवे को अर्पित करें। मान्यता है कि कौवा सीधे पितृ लोक से जुड़ा होता है और उसका भोजन ग्रहण करना पितरों की तृप्ति का संकेत है।
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देवादि बलि (चींटी): चौथा भाग वृक्षों की जड़ों या जमीन पर चींटियों व सूक्ष्म कीटों के लिए रखें।
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अतिथि/पिपीलिका बलि: पांचवां भाग किसी भिक्षुक, संन्यासी या पक्षियों के लिए निकालें। पंचबलि निकालने के बाद सात्विक और बिना प्याज-लहसुन का भोजन बनाकर योग्य, सदाचारी ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक भोजन कराएं और अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा, वस्त्र व फल देकर उनका चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।
शाम को पीपल के नीचे दीपदान और पितृ विदाई
सर्वपितृ अमावस्या की शाम को सूर्यास्त के समय एक विशेष दीपदान अवश्य करना चाहिए। सूर्यास्त के बाद किसी नजदीकी पीपल के वृक्ष के नीचे, तुलसी के पौधे के पास या अपने घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सरसों के तेल या तिल के तेल का चौमुखा दीपक जलाएं। दीपक के नीचे थोड़े से काले तिल अवश्य रखें। यह दीपक पितरों के प्रस्थान मार्ग को आलोकित करने के लिए प्रज्वलित किया जाता है ताकि पितृगण प्रसन्न होकर बिना किसी विघ्न के अपने लोक लौट सकें। इस दिन गरीब, असहाय और जरूरतमंद लोगों को अन्न, जूते, छाता और काले कंबल का दान करना महापुण्यकारी माना गया है।