महाभियोग से पहले इस्तीफे का दांव जस्टिस यशवंत वर्मा ने रचा इतिहास, भारत के न्यायिक जगत में तीसरी बार हुआ ऐसा

News India Live, Digital Desk: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है जिसने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। खास बात यह है कि उनका यह इस्तीफा उस वक्त आया जब उनके खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया शुरू होने के संकेत मिल रहे थे। भारतीय न्यायिक इतिहास में यह केवल तीसरा अवसर है जब किसी न्यायाधीश ने महाभियोग की कार्यवाही पूरी होने या शुरू होने के ठीक पहले इस्तीफा देकर पद छोड़ दिया हो।क्या है पूरा मामला और क्यों चर्चा में हैं जस्टिस वर्मा?जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों और कुछ गंभीर शिकायतों के बाद संसद में चर्चाओं का बाजार गर्म था। सूत्रों के अनुसार, उनके विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लाने की तैयारी चल रही थी। लेकिन इससे पहले कि संसद में यह प्रक्रिया अपनी गति पकड़ती, जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया। उनके इस कदम को रणनीतिक माना जा रहा है, क्योंकि महाभियोग द्वारा हटाए जाने पर एक न्यायाधीश अपनी पेंशन और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभ खो देता है, जबकि इस्तीफे की स्थिति में तकनीकी रूप से चीजें अलग होती हैं।न्यायिक इतिहास के वो दो मामले जब पहले भी हुआ ऐसाजस्टिस यशवंत वर्मा से पहले भारत में दो और ऐसे हाई प्रोफाइल मामले रहे हैं जहां न्यायाधीशों ने ‘सम्मानजनक विदाई’ के बजाय महाभियोग के डर से इस्तीफा चुना।जस्टिस सौमित्र सेन (कलकत्ता हाई कोर्ट): साल 2011 में जस्टिस सौमित्र सेन भारत के पहले ऐसे न्यायाधीश बने थे जिनके खिलाफ राज्यसभा ने महाभियोग पारित कर दिया था। लेकिन लोकसभा में वोटिंग होने से ठीक पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया।जस्टिस पी.डी. दिनाकरण (सिक्किम हाई कोर्ट): भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे जस्टिस दिनाकरण ने भी साल 2011 में ही महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने से पहले अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था।कैसे चलती है महाभियोग की जटिल प्रक्रिया?भारत में किसी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाना बेहद कठिन प्रक्रिया है। इसे ‘सिद्ध कदाचार’ (Proven Misbehaviour) या अक्षमता के आधार पर ही लाया जा सकता है। इसके लिए लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव जरूरी होता है। इसके बाद एक जांच समिति गठित होती है और अंत में संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होने पर राष्ट्रपति न्यायाधीश को पदमुक्त करते हैं। जस्टिस वर्मा के मामले में इस लंबी प्रक्रिया के शुरू होने से पहले ही कहानी का अंत हो गया।दिल्ली हाई कोर्ट में अब क्या बदल जाएगा?जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के काफी प्रभावशाली न्यायाधीशों में गिने जाते थे। उनके इस्तीफे के बाद अब हाई कोर्ट में जजों की वरिष्ठता सूची (Seniority List) में बदलाव आएगा। साथ ही, उनके पास लंबित पड़े महत्वपूर्ण मामलों को अब दूसरी बेंचों को स्थानांतरित किया जाएगा। कानून के जानकारों का कहना है कि यह घटनाक्रम न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर एक बार फिर नई बहस छेड़ सकता है।