धर्म

Ramayana Facts : कौन थी त्रिजटा जिसे माता सीता मानती थीं अपनी मां? रावण की दासी होकर भी निभाई धर्म की राह

News India Live, Digital Desk: रामायण की कथा में जब भी अशोक वाटिका का प्रसंग आता है, तो एक नाम प्रमुखता से उभरता है त्रिजटा। अक्सर लोग त्रिजटा को केवल रावण की एक दासी या लंका की राक्षसी के रूप में जानते हैं, लेकिन पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, त्रिजटा का व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक ऊंचा था। माता सीता ने लंका के उस कठिन दौर में त्रिजटा को ‘मां’ का दर्जा दिया था। आइए जानते हैं इस अद्भुत रिश्ते के पीछे की पौराणिक कथा और त्रिजटा की असल पहचान।कौन थी त्रिजटा? (विभीषण की पुत्री या रावण की दासी)विभिन्न रामायणों और पौराणिक ग्रंथों में त्रिजटा को लेकर अलग-अलग मत हैं:विभीषण की पुत्री: सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार, त्रिजटा रावण के अनुज और प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त विभीषण की पुत्री थी। राक्षसी कुल में जन्म लेने के बावजूद, वह अपने पिता की तरह ही धार्मिक और सात्विक स्वभाव की थी।अशोक वाटिका की रक्षक: रावण ने सीता माता को डराने और मानसिक रूप से तोड़ने के लिए कई क्रूर राक्षसियों को तैनात किया था, जिनमें त्रिजटा भी शामिल थी। हालांकि, अन्य राक्षसियों के विपरीत, त्रिजटा सीता जी के प्रति करुणा और ममता रखती थी।सीता जी ने क्यों कहा ‘मां’?वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के अनुसार, जब रावण सीता जी को डराकर जाता था, तो अन्य राक्षसियां उन्हें प्रताड़ित करती थीं। ऐसे समय में त्रिजटा ही वह एकमात्र सहारा थी जिसने माता सीता का मनोबल बढ़ाया।सांत्वना और सुरक्षा: त्रिजटा ने अन्य राक्षसियों को डांटा और सीता जी को ढांढस बंधाया कि उनके प्रभु श्री राम अवश्य आएंगे।सत्य का मार्ग: त्रिजटा ने सीता जी को अपने उस दिव्य स्वप्न के बारे में बताया था जिसमें उसने लंका का विनाश और श्री राम की विजय देखी थी। इस भरोसे ने सीता जी के मन में जीने की नई उम्मीद जगाई। इसी निस्वार्थ स्नेह और ममता के कारण सीता जी ने उन्हें ‘मां’ कहकर संबोधित किया।त्रिजटा का वह स्वप्न, जिससे थर्रा उठी थी लंकारामचरितमानस के सुंदरकांड में त्रिजटा के स्वप्न का विस्तृत वर्णन मिलता है। उसने अन्य राक्षसियों को अपना स्वप्न सुनाकर डरा दिया था, ताकि वे सीता जी को तंग न करें:”सपनें बानर लंका जारी, जातुधान सेना सब मारी।”अर्थात्, उसने सपने में देखा कि एक बंदर (हनुमान जी) ने पूरी लंका जला दी है और राक्षसी सेना का विनाश हो गया है। उसने सपने में रावण को नग्न अवस्था में गधे पर सवार होकर दक्षिण दिशा (मृत्यु की दिशा) की ओर जाते देखा था, जबकि विभीषण को श्री राम के चरणों में राज्याभिषेक कराते पाया था। इस स्वप्न ने माता सीता के संशय को दूर कर दिया और उन्हें विश्वास हो गया कि उनके दुखों का अंत निकट है।त्रिजटा का सम्मान और वरदानपौराणिक कथाओं के अनुसार, युद्ध के बाद जब श्री राम की विजय हुई और सीता जी की अग्नि परीक्षा हुई, तब माता सीता ने त्रिजटा को उनकी अतुलनीय सेवा और प्रेम के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया। कई क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार, त्रिजटा को यह वरदान प्राप्त है कि कलयुग में भी जहाँ-जहाँ रामायण का गान होगा, वहाँ उनकी भक्ति और ममता की कथाएं बड़े ही सम्मान के साथ सुनी जाएंगी।

Back to top button