गैस और एसिडिटी का चाय से क्या है सीधा कनेक्शन? एक्सपर्ट से जानिए खाली पेट चाय पीने के नुकसान और बचाव के आसान उपाय

भारत में सुबह की शुरुआत बिना चाय के अधूरी मानी जाती है। चाहे दफ्तर की थकान मिटानी हो या दोस्तों के साथ गप्पें मारनी हों, चाय का एक कप हर मर्ज की दवा लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही चहेती चाय आपके पेट के लिए एक बड़ी मुसीबत बन रही है?
चिकित्सा अनुसंधान वेबसाइट पबमेड (PubMed) की एक रिसर्च के अनुसार, भारत की करीब 15 से 30 फीसदी आबादी हर समय गैस और एसिडिटी की समस्या से जूझ रही है। वहीं कुछ नई रिपोर्ट्स तो यह भी बताती हैं कि लगभग 60 से 70 फीसदी भारतीयों को हफ्ते में कम से कम एक बार पेट फूलने (Bloating), सीने में जलन या खट्टी डकार आने जैसी पाचन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह समस्या न केवल आपका पूरा दिन खराब करती है, बल्कि लंबे समय में गट हेल्थ (पेट के स्वास्थ्य) को भी कमजोर कर देती है।
आखिर पेट में क्यों बनती है इतनी एसिडिटी?
इससे पहले कि हम चाय के असर को समझें, यह जानना जरूरी है कि हमारे पेट में एसिडिटी होती क्यों है।
जब हम कुछ खाते हैं, तो हमारे पेट में मौजूद गैस्ट्रिक ग्रंथियां (Gastric Glands) भोजन को पचाने के लिए एक बेहद शक्तिशाली एसिड बनाती हैं, जिसे हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCl) कहा जाता है। लेकिन जब हमारा खानपान बिगड़ता है, तो ये ग्रंथियां जरूरत से ज्यादा मात्रा में एसिड बनाने लगती हैं। यह अतिरिक्त एसिड पेट की अंदरूनी और ऊपरी परत को परेशान (Disturb) करने लगता है, जिससे सीने में तेज जलन होने लगती है और खाना ऊपर की तरफ आने जैसा महसूस होता है, जिसे हम एसिड रिफ्लक्स कहते हैं।
दूध वाली चाय और गैस का क्या है कनेक्शन?
? एक्सपर्ट ओपिनियन: क्या कहते हैं गैस्ट्रोलॉजिस्ट?
नोएडा स्थित फोर्टिस अस्पताल के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉक्टर महेश गुप्ता बताते हैं कि बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि दूध वाली चाय पीते ही उनका पेट फूलने लगता है या गैस बनने लगती है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण काम करते हैं:
1. लैक्टोज इनटोलरेंस (Lactose Intolerance)
हमारे शरीर में 'लैक्टेज' (Lactase) नाम का एक खास एंजाइम होता है, जिसका काम दूध में मौजूद शुगर यानी लैक्टोज को पचाना होता है। बहुत से भारतीयों के शरीर में इस एंजाइम की कमी होती है, जिसे मेडिकल भाषा में लैक्टोज इनटोलरेंस कहते हैं। ऐसे लोग जब दूध या दूध से बनी चाय पीते हैं, तो उनका पेट उसे पचा नहीं पाता और नतीजा गैस, मरोड़ या डायरिया (दस्त) के रूप में सामने आता है।
2. कैफीन की भारी मात्रा
चाय में कैफीन और टैरिन की मात्रा होती है। जब आप सुबह-सुबह खाली पेट चाय पीते हैं, तो यह कैफीन सीधे पेट की खाली दीवारों पर असर करता है और एसिड के स्राव को अचानक बढ़ा देता है। अगर आपकी आदत दिन भर में कई बार चाय पीने की है, तो आपके पेट में हर समय एसिडिटी का माहौल बना रहेगा।
पाचन संबंधी समस्याओं के मुख्य आंकड़े (Quick Overview)
भारतीयों में पाचन की समस्या कितनी आम हो चुकी है, इसे आप नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:
चाय पीते समय ध्यान रखें ये 3 गोल्डन रूल्स
अगर आप चाय के शौकीन हैं और इसे पूरी तरह छोड़ नहीं सकते, तो डॉक्टर के अनुसार आपको अपनी आदत में तीन मुख्य बदलाव तुरंत कर लेने चाहिए:
1.खाली पेट चाय को कहें 'ना':नियम 1.
सुबह सोकर उठने के बाद कभी भी सीधे बेड-टी न लें। चाय पीने से पहले एक गिलास गुनगुना पानी पिएं या चाय के साथ कम से कम दो बिस्किट, टोस्ट या भीगे हुए बादाम जरूर खाएं ताकि पेट खाली न रहे।
2.चाय की मात्रा तय करें:नियम 2.
दिन भर में 2 कप से ज्यादा चाय पीने से बचें। ज्यादा मात्रा में चाय पीने से शरीर में कैफीन बढ़ता है, जो नींद को डिस्टर्ब करने के साथ-साथ पाचन तंत्र को सुस्त कर देता है।
3.सही समय का चुनाव करें:नियम 3.
चाय पीने की टाइमिंग बहुत मायने रखती है। मुख्य भोजन (जैसे लंच या डिनर) के ठीक पहले या तुरंत बाद चाय न पिएं। सुबह के नाश्ते के आधे घंटे बाद या शाम के नाश्ते के समय चाय पीना सबसे सही माना जाता है।
आपकी ये आदतें भी पेट को बना रही हैं बीमार
सिर्फ चाय ही नहीं, हमारी रोजमर्रा की कुछ और गलत आदतें भी पाचन तंत्र को पूरी तरह कमजोर कर रही हैं:
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शारीरिक निष्क्रियता (Sedentary Lifestyle): आजकल अधिकांश लोगों का रूटीन ऐसा है जिसमें शारीरिक मेहनत न के बराबर है। दिन भर कुर्सी पर बैठे रहने से हमारा मेटाबॉलिज्म (Metabolism) धीमा हो जाता है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि पाचन को दुरुस्त रखने के लिए दिन भर में कम से कम 30 मिनट वॉक या योग जरूर करें।
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मैदा और रिफाइंड ऑयल का अधिक इस्तेमाल: समोसे, कचोरी, भटूरे या रिफाइंड तेल में बनी चीजें हमारे पेट के अच्छे बैक्टीरिया (Gut Health) को नष्ट कर देती हैं। तली-भुनी चीजों को पचाने के लिए पेट को बहुत ज्यादा मेहनत और एसिड बनाना पड़ता है, जो अंततः क्रॉनिक एसिडिटी का रूप ले लेता है।