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अमेरिका का बड़ा भू-राजनीतिक यू-टर्न: ‘इंडो-पैसिफिक’ से हटाया ‘इंडो’ शब्द, क्या पाकिस्तान-चीन के दबाव में झुका बाइडेन प्रशासन

वैश्विक महाशक्ति अमेरिका के राजनयिक गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पूरी दुनिया के रक्षा और कूटनीतिक विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। वाशिंगटन ने अपनी रणनीतिक शब्दावली में एक बड़ा बदलाव करते हुए 'इंडो-पैसिफिक' (Indo-Pacific) शब्द से 'इंडो' को अलग करना शुरू कर दिया है। इस कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह बहस छिड़ गई है कि क्या अमेरिका अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत की केंद्रीय भूमिका को कम आंक रहा है या फिर इसके पीछे पाकिस्तान और चीन की तरफ से बढ़ रहा अदृश्य राजनयिक दबाव है। इस अप्रत्याशित बदलाव ने दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरणों में नई हलचल पैदा कर दी है।

अमेरिका की इस नई कूटनीतिक चाल के पीछे क्या है असली वजह

भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के इस कदम के कई गहरे आर्थिक और सामरिक मायने हो सकते हैं। पिछले कुछ समय से पाकिस्तान और अमेरिका के बीच सैन्य और खुफिया स्तर पर सहयोग दोबारा बढ़ता हुआ देखा गया है, जिसे चीन को संतुलित करने की अमेरिकी कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। पाकिस्तान लगातार इस बात पर आपत्ति जताता रहा है कि 'इंडो-पैसिफिक' शब्दावली से ऐसा लगता है जैसे इस पूरे समुद्री क्षेत्र पर केवल भारत का अधिकार या प्रभाव है। अमेरिका द्वारा इस शब्द को बदलने या इसमें ढील देने को पाकिस्तान और चीन के साथ अपने संबंधों को एक नया आयाम देने की कूटनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

भारत के सामरिक हितों और क्वाड गठबंधन पर क्या पड़ेगा इसका असर

'इंडो-पैसिफिक' से भारत (इंडो) का संदर्भ कम करने की कोशिशों के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का 'क्वाड' (QUAD) संगठन कमजोर पड़ेगा? हालांकि, नई दिल्ली के रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत हिंद महासागर में अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी रहेगा। अमेरिका के इस बदले हुए रुख से भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय रक्षा समझौतों पर कोई तात्कालिक असर नहीं पड़ेगा, लेकिन यह साफ संकेत देता है कि वाशिंगटन अपनी विदेश नीति को किसी एक देश के भरोसे छोड़ने के बजाय बेहद लचीला रखना चाहता है।

भारतीय थिंक-टैंक और स्थानीय सुरक्षा गलियारों में बढ़ी चिंता

वाशिंगटन से आई इस खबर के बाद नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक, रक्षा मंत्रालय और देश के प्रमुख थिंक-टैंक्स के बीच इस पर गहन मंथन शुरू हो गया है। मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे रणनीतिक महत्व के भारतीय शहरों में स्थित अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत को अब अमेरिका पर अपनी निर्भरता को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। भारत सरकार पहले से ही 'आत्मनिर्भर भारत' नीति के तहत अपनी नौसैनिक और सैन्य ताकतों को मजबूत कर रही है, ताकि किसी भी वैश्विक महाशक्ति के नीतिगत बदलाव का देश की संप्रभुता और समुद्री सुरक्षा पर कोई आंच न आए।

 

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