धर्म

प्यास से सूखने लगे गला तो क्या टूट जाएगा व्रत? जानें निर्जला एकादशी पर पानी पीने का यह गुप्त नियम

हिंदू धर्म में ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी को सभी २४ एकादशियों में सबसे खास और कठिन माना गया है। जैसा कि इसके नाम से ही साफ है, इस व्रत में अन्न के साथ-साथ जल का त्याग करना होता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सालभर की बाकी एकादशियां नहीं रख पाता, वह अगर सिर्फ इस एक व्रत को पूरी श्रद्धा से कर ले, तो उसे साल की सभी एकादशियों का पुण्य मिल जाता है। लेकिन जून की इस तपती गर्मी में बिना पानी के रहना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या इस व्रत में पानी पीने की कोई छूट है? आइए एक ऑन-ग्राउंड रिपोर्टर के नजरिए से जानते हैं कि शास्त्रों में बीमार लोगों के लिए क्या रियायतें दी गई हैं और आपातकाल में जल ग्रहण करने की सही विधि क्या है।

क्यों माना जाता है इसे सबसे कठिन तपस्या और क्या है इसका महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी के दिन सुबह पूजा का संकल्प लेने के बाद से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक पानी की एक बूंद भी गले से नीचे नहीं उतरनी चाहिए। सुबह के समय केवल आचमन करने की अनुमति होती है। इस कठिन नियम के कारण ही इसे सबसे बड़ा पुण्यदायी व्रत कहा गया है, जो मोक्ष की राह आसान बनाता है। लेकिन बदलते समय और सेहत को देखते हुए शास्त्रों में कुछ बेहद व्यावहारिक नियम भी बताए गए हैं ताकि किसी के स्वास्थ्य को नुकसान न पहुंचे।

इन लोगों को मिलती है पानी पीने की पूरी छूट, सेहत से न करें समझौता

सनातन धर्म कभी भी व्यक्ति को संकट में डालने की वकालत नहीं करता। यही वजह है कि निर्जला एकादशी के व्रत में बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को पानी पीने की पूरी छूट दी गई है। अगर आप शारीरिक रूप से कमजोर हैं या किसी डॉक्टर की दवा ले रहे हैं, तो आपको जबरन भूखे-प्यासे रहने की जरूरत नहीं है। ऐसे लोग फलाहार, दूध या पानी पीकर भी यह व्रत रख सकते हैं और भगवान विष्णु की पूजा कर सकते हैं।

अगर प्राणों पर संकट आ जाए तो इस अनोखी विधि से पी सकते हैं पानी

भीषण गर्मी के कारण अगर व्रत के दौरान अचानक गला सूख जाए या तबीयत इतनी बिगड़ जाए कि जान पर बन आए, तो शास्त्रों में इसके लिए दो बेहद खास रास्ते बताए गए हैं। ज्योतिष और धर्म विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसी आपातकालीन स्थिति में आप सूर्यास्त होने के ठीक दो घंटे बाद जल ग्रहण कर सकते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से व्रत पूरी तरह खंडित नहीं होता और भक्त को कम से कम १२ एकादशियों का फल जरूर मिलता है।

इसके अलावा कुछ ग्रंथों में एक बेहद अनोखी परंपरा का भी जिक्र मिलता है। अगर दोपहर या दिन के समय ही स्थिति बहुत खराब हो जाए, तो तांबे, पीतल या चांदी के बर्तन में साफ पानी या गंगाजल भर लें। इसके बाद जमीन पर अपने दोनों हाथ और घुटने टिकाकर (पशु की मुद्रा में) सीधे बर्तन से जल पीना चाहिए। ध्यान रहे कि पानी पीने से पहले २१ बार 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का जाप जरूर कर लें। शास्त्रों में इस विशेष परिस्थिति को दोषमुक्त माना गया है। इसके साथ ही कई जगहों पर लोग देर रात १२ बजे के बाद भी थोड़ा सा जल ले लेते हैं।

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