रथ यात्रा का वो अनसुना रहस्य! जब माता लक्ष्मी ने गुस्से में तोड़ दिया भगवान जगन्नाथ का रथ, फिर गुप्त रास्ते से हो गईं ओझल

पुरी की विश्व प्रसिद्ध 'रथ यात्रा' के पीछे न केवल भक्ति और श्रद्धा की भावना है, बल्कि इसके साथ जुड़ी हैं कई ऐसी पौराणिक कथाएं, जो भक्तों को आज भी अचंभित कर देती हैं। क्या आप जानते हैं कि रथ यात्रा के दौरान एक ऐसा भी प्रसंग आता है जब माता लक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ के बीच मान-मनौव्वल होती है? लोककथाओं के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान जगन्नाथ के रथ को ही खंडित (तोड़) कर दिया था। आखिर देवी के इस क्रोध के पीछे क्या कारण था और क्यों उन्हें चुपके से गुप्त रास्ते से वापस लौटना पड़ा? आइए जानते हैं इस रहस्यमयी घटना के पीछे की पूरी सच्चाई।
रथ यात्रा के दौरान लक्ष्मी-नारायण का अनोखा मान-मनौव्वल
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ नौ दिनों के लिए गुंडिचा मंदिर (अपनी मौसी का घर) जाते हैं, तो श्रीमंदिर में अकेली रह गईं माता लक्ष्मी को यह अच्छा नहीं लगता। भक्तों का मानना है कि चौथे दिन 'हेरा पंचमी' के अवसर पर माता लक्ष्मी, भगवान जगन्नाथ को लेने के लिए गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। रथ यात्रा के इस विशेष दिन पर देवी का यह रौद्र रूप देखने को मिलता है। कहा जाता है कि माता लक्ष्मी की सवारी—स्वर्ण पालकी—जब गुंडिचा मंदिर पहुंचती है, तो वे जगन्नाथ स्वामी से नाराज होती हैं कि उन्हें बिना बताए वे यात्रा पर क्यों निकल आए।
क्यों तोड़ा माता लक्ष्मी ने भगवान का रथ?
'हेरा पंचमी' की लोककथा के अनुसार, जब माता लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि भगवान जगन्नाथ वहां आनंद के साथ विराजमान हैं। अपने आराध्य देव की यह उपेक्षा और अकेले छोड़ दिए जाने की पीड़ा से क्रोधित होकर, माता लक्ष्मी ने भगवान के रथ के एक हिस्से को क्षति पहुंचा दी थी। यह सांकेतिक रूप से एक पत्नी का अपने पति के प्रति रूठने का अधिकार और प्रेम ही था। इस घटना के माध्यम से भक्त यह समझते हैं कि भगवान के साथ उनका रिश्ता कितना मानवीय और आत्मीय है। रथ का यह टुकड़ा तोड़ना वास्तव में एक दिव्य लीला का हिस्सा माना जाता है।
गुप्त रास्ते से वापसी का रहस्य
रथ का एक हिस्सा तोड़ने के बाद, जब भगवान जगन्नाथ को अपनी गलती का अहसास हुआ, तो उन्होंने माता लक्ष्मी को मनाने के लिए कई वचन दिए। लोक मान्यताओं के अनुसार, रथ तोड़ने के बाद माता लक्ष्मी सीधे मुख्य रास्ते से नहीं, बल्कि एक गुप्त मार्ग (जिसे हेरा गोहरी साही मार्ग कहा जाता है) से होकर श्रीमंदिर की ओर लौट गईं। आज भी पुरी में इसी परंपरा का निर्वहन किया जाता है। हेरा पंचमी के दिन भक्त माता लक्ष्मी की इस गुप्त यात्रा के साक्षी बनते हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि प्रेम में मान-अभिमान भी होता है और अंत में समर्पण ही जीतता है। यह अद्भुत गाथा आज भी जगन्नाथ धाम की महिमा का एक प्रमुख हिस्सा है।