बच्चों की नींद से समझौता कहीं पड़ न जाए भारी! जानिए उम्र के हिसाब से आपके बच्चे के लिए कितनी नींद है जरूरी

आजकल के बच्चों की लाइफस्टाइल हम बड़ों से भी ज्यादा बिजी और तनावभरी हो गई है। स्कूल का होमवर्क, ट्यूशन का दबाव और फिर जो थोड़ा बहुत समय बचता है, उसे मोबाइल या टीवी की स्क्रीन ले लेती है। नतीजा यह हो रहा है कि बच्चों की नींद पूरी तरह से डिस्टर्ब हो चुकी है। अक्सर माता-पिता इसे यह सोचकर नजरअंदाज कर देते हैं कि "कोई बात नहीं, वीकेंड पर ज्यादा सो लेगा।" लेकिन लगातार नींद की कमी आपके बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर बहुत गहरा असर डाल रही है।
बच्चों के लिए अच्छी और गहरी नींद उतनी ही जरूरी है, जितना कि उन्हें दिया जाने वाला पौष्टिक खाना और खेलकूद। आइए बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं कि अधूरी नींद बच्चों को कैसे नुकसान पहुंचा रही है, उन्हें कितनी नींद चाहिए और एक माता-पिता के तौर पर आप उनका स्लीप रूटीन कैसे सुधार सकते हैं।
नींद की कमी का बच्चों पर क्या असर होता है?
जब बच्चे पूरी नींद लेते हैं, तो उनका शरीर रिलैक्स होता है और दिमाग दिनभर की सीखी हुई बातों को प्रोसेस करता है। वहीं, अगर बच्चा अपनी जरूरत के हिसाब से कम सो रहा है, तो वह अक्सर थका हुआ, सुस्त और बात-बात पर चिड़चिड़ा नजर आ सकता है। इसका सीधा असर उसकी पढ़ाई में एकाग्रता (Concentration), याददाश्त और खेलकूद पर पड़ता है। नींद पूरी न होने से बच्चों की इम्युनिटी भी कमजोर होती है, जिससे उनके बार-बार बीमार पड़ने का खतरा बना रहता है।
उम्र के हिसाब से बच्चों के लिए कितनी नींद है जरूरी?
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) ने बच्चों की उम्र के हिसाब से उनकी नींद का एक चार्ट तैयार किया है। बच्चों के बेहतर विकास के लिए यह जानना बहुत जरूरी है:
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0 से 3 महीने (नवजात): 14 से 17 घंटे की नींद
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4 से 12 महीने: 12 से 16 घंटे की नींद
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1 से 2 साल: 11 से 14 घंटे की नींद
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3 से 5 साल: 10 से 13 घंटे की नींद
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6 से 12 साल: 9 से 12 घंटे की नींद
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13 से 18 साल (टीनेजर): 8 से 10 घंटे की नींद
बच्चों का स्लीप रूटीन कैसे सुधारें?
अगर आपके बच्चे को भी रात में जल्दी नींद नहीं आती है, तो आप इन छोटे-छोटे बदलावों से उनका रूटीन सुधार सकते हैं:
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समय फिक्स करें: बच्चों के रोज सोने और सुबह उठने का एक ही समय तय करें। इससे उनके शरीर की 'बायोलॉजिकल क्लॉक' सेट हो जाएगी।
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स्क्रीन से बनाएं दूरी: सोने से कम से कम एक घंटे पहले टीवी, मोबाइल या टैबलेट पूरी तरह बंद कर दें। स्क्रीन की नीली रोशनी दिमाग को सोने का सिग्नल नहीं मिलने देती।
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शारीरिक एक्टिविटी: दिन के समय बच्चों को आउटडोर गेम्स (बाहर खेलने) का मौका जरूर दें, ताकि वे शारीरिक रूप से थकें और रात को उन्हें गहरी नींद आए।
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हल्का डिनर: रात में बच्चों को ज्यादा भारी, तला-भुना या बहुत मीठा खाना न दें।
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बेडटाइम रूटीन: सोने से पहले कमरे का माहौल शांत रखें। आप उन्हें कोई अच्छी कहानी सुना सकते हैं या हल्का संगीत चला सकते हैं।
डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?
कुछ मामलों में नींद न आना किसी मेडिकल समस्या का संकेत भी हो सकता है। अगर आप देखते हैं कि आपका बच्चा रात में बार-बार उठ रहा है, सोते समय तेज खर्राटे लेता है, उसे सांस लेने में तकलीफ होती है या वह नींद में घबराकर उठ जाता है, तो इसे बिल्कुल हल्के में न लें। इसके अलावा अगर बच्चा रात में सोने के बावजूद दिनभर जरूरत से ज्यादा थका रहता है, तो आपको तुरंत किसी अच्छे पीडियाट्रिशियन (बच्चों के डॉक्टर) से सलाह लेनी चाहिए। सही समय पर मिला इलाज आपके बच्चे की सेहत को बड़े नुकसान से बचा सकता है।