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परिसीमन बिल पर DMK का रुख साफ: उदयनिधि स्टालिन बोले- हम केंद्र के प्रस्ताव का विरोध जारी रखेंगे

लोकसभा सीटों के परिसीमन और महिला आरक्षण बिल को लेकर चल रही सियासी रस्साकशी के बीच तमिलनाडु की राजनीति से एक बड़ा अपडेट सामने आया है। कुछ समय से कयास लगाए जा रहे थे कि विपक्षी गठबंधन से दूरी बनाने के बाद डीएमके (DMK) परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का साथ दे सकती है, लेकिन अब पार्टी नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने इन सभी अटकलों पर पूरी तरह से विराम लगा दिया है। उदयनिधि ने स्पष्ट कर दिया है कि डीएमके इस संवेदनशील मुद्दे पर अपने पुराने रुख पर कायम है और वह शुरुआत से ही इसका विरोध करती आई है तथा आगे भी करती रहेगी। इस बयान से विपक्षी दलों ने खासी राहत की सांस ली है, क्योंकि डीएमके के रुख में बदलाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही थीं।

उदयनिधि स्टालिन का स्पष्ट बयान और राजनीतिक समीकरण

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु में बदल रहे राजनीतिक समीकरणों और अभिनेता-राजनेता थलपति विजय के उभार के बीच उदयनिधि स्टालिन ने मीडिया के सामने पार्टी की स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि परिसीमन का मुद्दा कोई नया विषय नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार इसे ऐसे पेश कर रही है जैसे यह पहली बार लाया जा रहा हो। डीएमके ने हमेशा से दक्षिणी राज्यों के हितों को प्रभावित करने वाले परिसीमन का पुरजोर विरोध किया है और पार्टी भविष्य में भी इस पर कोई समझौता नहीं करेगी। संसद में डीएमके की ताकत की बात करें तो लोकसभा में उनके 22 और राज्यसभा में 8 सांसद हैं, जिससे केंद्र सरकार के लिए इस दल का रुख बेहदहमूवान साबित होता है।

राहुल गांधी की चेतावनी और 'एट्टाप्पन' वाला बयान

इससे पहले, जब यह चर्चा जोर पकड़ी थी कि डीएमके परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र सरकार का समर्थन कर सकती है, तो विपक्षी खेमे में भारी बेचैनी बढ़ गई थी। स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि तमिलनाडु के दौरे पर गए कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सार्वजनिक रूप से यह चेतावनी तक देनी पड़ी थी कि राज्य की सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों को इस बिल का डटकर विरोध करना चाहिए। राहुल गांधी ने यहां तक कहा था कि यदि कोई दल इस प्रस्ताव का समर्थन करता है, तो वह तमिलनाडु की जनता के साथ सीधा धोखा करेगा और इतिहास उसे 21वीं सदी का 'एट्टाप्पन' यानी गद्दार के रूप में याद रखेगा।

क्या थीं DMK की शर्तें और क्यों नरम हुआ था रुख

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के साथ दशकों पुराना नाता टूटने और थलपति विजय के राजनीतिक प्रवेश के बाद डीएमके खुद को कुछ असहज महसूस कर रही है, जिसके चलते पिछले दिनों पार्टी की ओर से नरम रुख के संकेत मिले थे। रिपोर्टों के अनुसार, डीएमके ने केंद्र के सामने तीन प्रमुख शर्तें रखी थीं, जिनमें 2011 की जनगणना के बजाय अगले 25 वर्षों तक 1971 की जनगणना को ही परिसीमन का आधार बनाने, सभी राज्यों में एक समान रूप से 50 फीसदी सीटें बढ़ाने और बिल में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख करने की मांग शामिल थी कि किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी। हालांकि, अब उदयनिधि स्टालिन के ताजा बयानों से यह साफ हो गया है कि पार्टी अपने मूल वैचारिक स्टैंड पर अडिग है और संसद में इस बिल को लेकर कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।

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