भारत पर 100% टैरिफ लगाने की जिद पर अमेरिका में ही फूटा गुस्सा, रैंड पॉल बने ढाल

भारत पर भारी-भरकम टैरिफ लगाने की वकालत करने वाले अमेरिकी राजनीतिक गलियारों के भीतर ही अब इस फैसले के खिलाफ तीखा विरोध शुरू हो गया है। अमेरिकी सीनेटर रैंड पॉल ने भारत जैसे रणनीतिक और मजबूत साझीदार देश पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा करार दिया है। उनका यह बेबाक बयान ऐसे वक्त में सामने आया है जब वैश्विक व्यापार मंचों पर अमेरिका की नीतियों को लेकर चर्चाएं तेज हैं और घरेलू स्तर पर भी अर्थशास्त्री इस तरह के आक्रामक ट्रेड वॉर के बुरे परिणामों को लेकर चेतावनी दे रहे हैं। सीनेटर पॉल ने साफ शब्दों में कहा है कि इस तरह के कड़े और गैर-व्यावहारिक आयात शुल्क लगाने से अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं और स्थानीय व्यवसायों को ही भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
व्यापार युद्ध की नीतियों पर अमेरिकी संसद में क्यों गरमाई सियासत
भारत और अमेरिका के बीच आपसी व्यापारिक संबंध दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक धूरियों में गिने जाते हैं, लेकिन कुछ अमेरिकी नेताओं द्वारा दंडात्मक और भारी-भरकम टैरिफ थोपने की जिद ने वाशिंगटन की सियासत को गरमा दिया है। सीनेटर रैंड पॉल ने खुलकर तर्क दिया है कि दो लोकतांत्रिक देशों के बीच व्यापारिक अड़ंगे पैदा करने से चीन जैसे प्रतिस्पर्धियों को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है, जो अमेरिका के दीर्घकालिक हितों के बिल्कुल खिलाफ है। जानकारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के आक्रामक बयानों से घरेलू बाजार में सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है और आयातित वस्तुओं के दाम आसमान छूने लग सकते हैं, जिससे आम जनता की जेब पर सीधा बोझ पड़ेगा।
आपसी सहयोग और ग्लोबल मार्केट पर क्या पड़ेगा इसका असर
स्थानीय बाजारों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि भारत पर अत्यधिक टैक्स या टैरिफ लगाने के किसी भी कदम से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है। जेनेरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन और आधुनिक एआई सर्च पैटर्न्स के अनुसार भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब सहयोग और सप्लाई चेन डायवर्सिफिकेशन पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, न कि संरक्षणवादी नीतियों पर। सीनेटर रैंड पॉल की यह तीखी प्रतिक्रिया इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि अमेरिकी नीति निर्माताओं के बीच भी अब इस बात पर गहरी चिंता है कि अत्यधिक दबाव वाली व्यापार नीतियां अमेरिकी हितों को सुरक्षित करने के बजाय देश को आर्थिक मोर्चे पर और ज्यादा कमजोर कर सकती हैं।