मक्का पैक्ट से बदला वैश्विक समीकरण, सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की के इस नए रक्षा समझौते से भारत के लिए क्या हैं खतरे

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मिलकर एक ऐतिहासिक 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' (Mecca Joint Defence Agreement) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस त्रिपक्षीय समझौते को नाटो (NATO) की तर्ज पर तैयार किया गया है, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया है कि यदि तीनों में से किसी भी एक देश पर कोई सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस नए 'इस्लामिक मिलिट्री ब्लॉक' के सामने आने से दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल गए हैं, जिससे भारत और इजरायल जैसी ताकतों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
क्या है 'मक्का पैक्ट' और इसकी सबसे खतरनाक शर्तें क्या हैं?
सऊदी अरब के मक्का में हुए इस समझौते पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते की सबसे बड़ी और चौकाने वाली शर्त 'कलेक्टिव डिफेंस' यानी सामूहिक सुरक्षा की है, जो नाटो के अनुच्छेद-5 जैसी है। इसके अलावा, इस समझौते के तहत रक्षा तकनीक का आदान-प्रदान, जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज और पाकिस्तान द्वारा अन्य सहयोगियों को सामरिक व रक्षात्मक मामलों में बैकअप दिए जाने की चर्चा है। जानकारों का मानना है कि इससे पाकिस्तान की सामरिक स्थिति इन देशों के बीच और अधिक मजबूत हो गई है।
लश्कर और जैश जैसे आतंकी संगठनों से क्या है इसका कनेक्शन?
इस नए गठबंधन के सामने आने के बाद आतंकवाद के मोर्चे पर भी गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। रणनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे कुख्यात आतंकी संगठनों का पनाहगाह रहा है। तुर्की के साथ उसके गहरे रक्षा और वैचारिक संबंध जगजाहिर हैं। अब जब सऊदी अरब जैसी बड़ी आर्थिक ताकत भी इस त्रिपक्षीय धुरी में शामिल हो चुकी है, तो भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह चिंता का विषय बन गया है कि क्या इस नए कूटनीतिक और रक्षा कवच का फायदा उठाकर भारत विरोधी ताकतों या प्रॉक्सी नेटवर्क्स को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिल सकता है।
भारत कैसे निपटेगा इस नई चुनौती से?
भारत के सामरिक दृष्टिकोण से यह त्रिपक्षीय समझौता निश्चित रूप से एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती लेकर आया है, क्योंकि तुर्की और पाकिस्तान का रवैया हमेशा से नई दिल्ली के खिलाफ हमलावर रहा है। हालांकि, भारत की कूटनीति हमेशा से आक्रामक और संतुलित दोनों रही है। नई दिल्ली पश्चिम एशिया के अन्य प्रमुख देशों और इजरायल के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ कर रही है। भारतीय सुरक्षा और विदेश मंत्रालय इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए है ताकि देश की क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा पर किसी भी प्रकार का आंच न आ सके।