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सुप्रीम कोर्ट में वकील की अजीबोगरीब मांग पर भड़के जस्टिस सूर्यकांत, उदाहरण देकर कोर्टरूम में ही सिखाया कानून का पाठ

देश की सर्वोच्च अदालत में आए दिन कई तरह के दिलचस्प और गंभीर मामले सामने आते हैं, लेकिन कई बार वकीलों की ऐसी अजीबोगरीब मांगें सामने आ जाती हैं जिन्हें देखकर जजों का भी माथा ठनक जाता है। कुछ ऐसा ही नजारा तब देखने को मिला जब सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान एक वकील ने ऐसी मांग रख दी, जिसे सुनकर बेंच की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस सूर्यकांत (Justice Surya Kant) बेहद नाराज हो गए। अदालत की गरिमा और कानूनी प्रावधानों से परे की गई इस मांग पर जज ने न सिर्फ उस वकील को आड़े हाथों लिया, बल्कि सटीक उदाहरण देते हुए कोर्टरूम में ही उन्हें कानून का ककहरा भी पढ़ा दिया।

क्या थी वकील की वो अजीब मांग जिस पर भड़के जज?

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक मामले में बहस करते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के सामने कुछ ऐसी राहत या आदेश देने की गुहार लगाई, जो कानूनी दायरे और प्रक्रिया के बिल्कुल खिलाफ थी। वकीलों से उम्मीद की जाती है कि वे पुख्ता तथ्यों और कानूनी धाराओं के तहत अपनी बात रखें, लेकिन जब बिना किसी ठोस आधार के ऐसी मांगें रखी जाती हैं तो न्यायालय का कीमती समय भी बर्बाद होता है। जैसे ही वकील ने अपनी यह दलील कोर्ट के सामने रखी, बेंच ने तुरंत उस पर आपत्ति जताई और कार्यवाही के दौरान अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी।

जस्टिस सूर्यकांत ने उदाहरण देकर लगाई क्लास

मामले की गंभीरता को समझते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने तुरंत हस्तक्षेप किया और वकील को कड़े शब्दों में नसीहत दी। उन्होंने न सिर्फ उस मांग को सिरे से खारिज किया, बल्कि व्यावहारिक और कानूनी उदाहरण देते हुए समझाया कि न्यायिक प्रक्रिया किस तरह से काम करती है। जज की इस दो टूक और स्पष्ट टिप्पणी ने कोर्ट रूम में मौजूद सभी लोगों का ध्यान खींच लिया। जस्टिस सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि अदालतें नियमों और संविधान के दायरे में रहकर काम करती हैं, और इस तरह की बचकानी या गैर-कानूनी मांगें स्वीकार नहीं की जा सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली और वकीलों की जिम्मेदारी

यह पूरी घटना एक बार फिर इस बात पर जोर देती है कि देश की अदालतों में केस दाखिल करने और बहस करने से पहले वकीलों को कानूनी बारीकियों का पूरा ज्ञान होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट जैसे उच्चतर मंच पर इस प्रकार की बिना सिर-पैर की दलीलें देने से न केवल न्यायिक समय का नुकसान होता है, बल्कि मुवक्किल के केस पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। जस्टिस सूर्यकांत की इस सख्त प्रतिक्रिया को कानूनी गलियारों में एक कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि अदालत में केवल ठोस और कानूनी रूप से टिकने वाली दलीलें ही स्वीकार की जाएंगी।

 

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