उत्तर प्रदेश

2 साल के भीतर दूसरी बार मातृत्व अवकाश लेने पर कोई रोक नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

देश की कामकाजी महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी कानूनी खबर सामने आई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) की लखनऊ बेंच ने सरकारी सेवा में कार्यरत महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया है कि पहले मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) के दो साल के भीतर दूसरी बार मातृत्व अवकाश लेने पर किसी भी तरह की कानूनी रोक नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ अधिनियम (Maternity Benefit Act) जैसे वैधानिक कानून वित्तीय हस्तपुस्तिका के नियमों से ऊपर और प्रभावी होते हैं।

क्या था पूरा मामला और क्यों पहुंचा था मामला हाईकोर्ट

यह पूरा मामला सुलतानपुर रोड स्थित कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में कार्यरत याची सीमा से जुड़ा हुआ है। याची ने 17 जून 2026 से 13 दिसंबर 2026 तक यानी कुल 180 दिनों के मातृत्व अवकाश के लिए विभाग के पास आवेदन किया था। हालांकि, संबंधित विभाग ने वित्तीय हस्तपुस्तिका के नियम 153(1) का हवाला देते हुए उनके आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया था कि दो बच्चों या दो मातृत्व अवकाशों के बीच न्यूनतम दो साल का अंतराल होना अनिवार्य है, जो इस मामले में पूरा नहीं हो रहा था।

विभाग के इस फैसले के खिलाफ याची सीमा ने अधिवक्ता प्रशांत देव सिंह के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान याची पक्ष की ओर से अनुपम यादव, अंशु रानी और सताक्षी मिश्रा के मामलों में दिए गए पूर्व के न्यायिक दृष्टांतों का हवाला दिया गया। कोर्ट में यह जोरदार दलील दी गई कि उत्तर प्रदेश सरकार ने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 को अपने कर्मचारियों के लिए अंगीकृत किया है, इसलिए संसद द्वारा बनाए गए इस वैधानिक कानून के प्रावधानों के विपरीत वित्तीय हस्तपुस्तिका का कोई भी नियम प्रभावी नहीं माना जा सकता है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा और क्या दिए निर्देश

मामلے की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुपम यादव मामले में पहले भी यह तय किया जा चुका है कि वित्तीय हस्तपुस्तिका के नियम महज कार्यकारी निर्देश (Executive Instructions) भर हैं, जबकि मातृत्व लाभ अधिनियम एक पूर्ण वैधानिक कानून (Statutory Law) है। दोनों में किसी भी प्रकार की असंगति होने की स्थिति में हमेशा वैधानिक कानून ही सर्वोपरि रहेगा।

अदालत ने अपने फैसले में माना कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत ऐसा कोई प्रावधान या शर्त नहीं है जो यह कहती हो कि पहले और दूसरे मातृत्व अवकाश के बीच दो साल का अंतर होना जरूरी है। लिहाजा, केवल विभागीय वित्तीय हस्तपुस्तिका के आधार पर किसी महिला को मातृत्व अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने 20 जुलाई 2026 के उस खारिज करने वाले आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया और संबंधित संस्थान को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता को 17 जून से 13 दिसंबर तक का 180 दिन का मातृत्व अवकाश तत्काल प्रभाव से स्वीकृत करे और इसके साथ ही सभी परिणामी सेवा लाभ भी प्रदान करे।

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