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मेरी कंट्रोवर्सी की सजा मेरे पूरे परिवार को मिली, सरनेम सुनते ही लोगों के चेहरे बदल जाते थे’: 6 साल बाद छलका रिया चक्रवर्ती का दर्द

साल 2020 में अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के असामयिक और दुखद निधन के बाद भारतीय टेलीविजन और सोशल मीडिया के इतिहास का सबसे आक्रामक मीडिया ट्रायल देखने को मिला था। इस पूरे विवाद के केंद्र में रहीं बॉलीवुड अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती ने घटना के छह साल बाद अपनी जिंदगी के सबसे काले और दर्दनाक दौर को लेकर खुलकर बात की है। एक हालिया साक्षात्कार और अपने पॉडकास्ट के दौरान रिया ने बयां किया कि कैसे उस एक विवाद ने केवल उनका करियर ही नहीं छीना, बल्कि उनके पूरे परिवार के आत्मसम्मान, आजीविका और मानसिक शांति को तहस-नहस कर दिया। रिया ने बेहद भावुक होते हुए खुलासा किया कि उनके खिलाफ चले सुनियोजित नफरत के अभियान की कीमत उनके बेकसूर माता-पिता और छोटे भाई को चुकानी पड़ी। उनके पिता, जो भारतीय सेना में डॉक्टर के पद से सेवानिवृत्त होकर एक कॉर्पोरेट अस्पताल में काम कर रहे थे, को केवल विवाद से बचने के लिए रातों-रात नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।

'चक्रवर्ती' सरनेम बना अछूत: पिता की नौकरी गई और बैंक खातों पर लगा ग्रहण

रिया चक्रवर्ती ने बातचीत के दौरान बताया कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से किसी बड़े विवाद का शिकार बनता है, तो समाज अक्सर उसके पीछे खड़े पूरे परिवार को बिना किसी सबूत के दोषी मान लेता है। रिया के पिता लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) डॉ. इंद्रजीत चक्रवर्ती देश की सेवा करने के बाद एक प्रतिष्ठित निजी स्वास्थ्य संस्थान में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे। जैसे ही नेशनल मीडिया पर 24 घंटे चलने वाली बहसों में रिया का नाम उछाला जाने लगा, उनके पिता के कार्यस्थल पर भी भारी दबाव बनने लगा।

कंपनी प्रबंधन ने उनसे सीधे तौर पर कह दिया कि उनके नाम से संस्थान की ब्रांड इमेज खराब हो रही है और उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया गया। रिया ने कहा कि उस दौर में स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि किसी भी फॉर्म, बैंक दस्तावेज या आधिकारिक काम के लिए जब वे अपना उपनाम 'चक्रवर्ती' बोलते थे, तो सामने बैठे अधिकारी और कर्मचारी अजीब नज़रों से देखने लगते थे। लोगों ने उनसे हाथ मिलाना, फोन उठाना और सामान्य बातचीत करना बंद कर दिया था। परिवार के बैंक खाते फ्रीज हो चुके थे और आर्थिक रूप से उन्हें पूरी तरह पंगु बना दिया गया था।

जेल की सलाखें, मीडिया की गाड़ियां और बेबुनियाद नफरत का तूफान

उस दौर को याद करते हुए रिया ने बताया कि उनके घर के बाहर 50 से अधिक मीडिया ओबी वैन और सैकड़ों कैमरामैन चौबीसों घंटे डेरा डाले रहते थे। जब भी उनके बुजुर्ग माता-पिता आवश्यक दवाइयां या राशन लेने के लिए बाहर निकलते, तो माइक उनके मुंह पर ठूंस दिए जाते थे और उन पर अपराधी की तरह चिल्लाया जाता था। रिया को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की जांच के दौरान भायखला जेल में 28 दिन बिताने पड़े थे।

रिया के अनुसार, जेल में बिताया गया वह समय उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। वहां उन्होंने देखा कि कैसे समाज के सबसे वंचित लोग भी एक-दूसरे का दर्द बांटते हैं, जबकि बाहर की तथाकथित सभ्य दुनिया उनके पूरे परिवार को जिंदा जलाने पर तुली थी। रिया ने कहा कि जेल की चारदीवारी के भीतर उन्होंने अपनी आत्मा को मजबूत किया और तय किया कि वह इस अन्याय के आगे कभी घुटने नहीं टेकेंगी। जब वह जमानत पर बाहर आईं, तो उन्होंने पाया कि उनका घर एक युद्ध क्षेत्र बन चुका था और उनके आसपास के अधिकांश दोस्त व रिश्तेदार डर के मारे गायब हो चुके थे।

भाई शौविक का टूटा भविष्य और नया घर ढूंढने में आई जिल्लत

इस पूरे घटनाक्रम में रिया के छोटे भाई शौविक चक्रवर्ती को भी गंभीर मानसिक और कानूनी आघात का सामना करना पड़ा। शौविक जो उस समय अपनी उच्च शिक्षा और करियर की शुरुआत की तैयारी कर रहे थे, उन्हें भी कई महीनों तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा। रिया ने बताया कि जब उनका परिवार उस पुराने फ्लैट को छोड़कर किसी नई और शांत जगह किराए का मकान ढूंढने निकला, तो दर्जनों हाउसिंग सोसायटियों ने उनका सरनेम देखते ही फ्लैट देने से साफ मना कर दिया।

सोसायटी के सेक्रेटरी और मकान मालिक सीधे मुंह कहते थे कि वे अपने परिसर में 'विवादित लोगों' को नहीं रख सकते क्योंकि इससे पुलिस और मीडिया का जमावड़ा लगेगा। रिया की मां कई रातों तक रोती रहीं और उनका ब्लड प्रेशर लगातार अनियंत्रित रहने लगा। रिया ने कहा कि एक बेटी के रूप में अपने माता-पिता को अपनी वजह से अपमानित होते देखना उनके लिए किसी भी कानूनी सजा या जेल की सजा से हजार गुना ज्यादा दर्दनाक था।

'चैप्टर 2' और थेरेपी: अंधेरी खाई से बाहर निकलकर जिंदगी का पुनर्जन्म

तमाम मुश्किलों, बहिष्कार और आर्थिक तंगी के बावजूद रिया चक्रवर्ती ने हार नहीं मानी। उन्होंने लगातार पेशेवर मनोवैज्ञानिक थेरेपी (Trauma Therapy), ध्यान और योग का सहारा लिया। छह साल के लंबे और कठिन संघर्ष के बाद उन्होंने अपने जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत की। उन्होंने 'चैप्टर 2' (Chapter 2) नाम से एक पॉडकास्ट टॉक-शो लॉन्च किया, जहां वे जीवन के कठिन दौर से गुजरने वाले लोगों, कलाकारों और विचारकों से सकारात्मक संवाद करती हैं।

रिया ने बताया कि इस पॉडकास्ट का नाम 'चैप्टर 2' रखने के पीछे का उद्देश्य यही है कि हर इंसान की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आता है जब सब कुछ खत्म लगता है, लेकिन वहीं से दूसरा अध्याय शुरू होता है। उन्होंने कई ब्रांड्स और छोटे प्रोजेक्ट्स के साथ दोबारा काम करना शुरू किया है। रिया मानती हैं कि आज वे जिस मानसिक शांति और मजबूती के मुकाम पर हैं, उसने उन्हें सिखाया है कि बाहरी दुनिया का शोर आपके आंतरिक सच को कभी नहीं मिटा सकता।

डिजिटल ट्रोलिंग और न्याय प्रणाली पर रिया का कड़ा संदेश

रिया चक्रवर्ती का यह दर्द केवल उनकी व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि यह आज के दौर में सोशल मीडिया पर चलने वाले 'मॉब लिंचिंग कल्चर' और बिना अदालती फैसले के किसी को मुजरिम ठहरा देने वाली खतरनाक मानसिकता पर एक कड़ा तमाचा है। रिया ने कहा कि इंटरनेट पर चंद लाइक्स और टीआरपी के लिए किसी के पूरे परिवार का जीवन तबाह कर देना बहुत आसान है, लेकिन उस बिखरे हुए परिवार को दोबारा खड़ा होने में सालों का खून-पसीना लग जाता है।

रिया ने समाज और मीडिया से अपील करते हुए कहा कि कानून और न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखा जाना चाहिए। किसी भी महिला या उसके परिवार को मीडिया की अदालत में कठघरे में खड़ा करके उसका सामाजिक कत्ल करने की अनुमति किसी को नहीं होनी चाहिए। आज छह साल बाद जब वे पीछे मुड़कर देखती हैं, तो उन्हें अपने माता-पिता के धैर्य और साहस पर गर्व होता है जिन्होंने दुनिया के सबसे भयानक तूफान में भी अपनी बेटी का हाथ थामे रखा।

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