नए संसद भवन में अपनेपन की कमी: शशि थरूर ने क्यों कहा ऐसा? जानिए उनके इस बयान के पीछे की बड़ी वजह

भारतीय राजनीति में अपने बेबाक बयानों और शानदार अंग्रेजी के लिए मशहूर कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर ने एक बार फिर से अपने एक बयान से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर बात करते हुए शशि थरूर ने देश के नए संसद भवन (New Parliament Building) को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने खुलकर यह बात कही है कि नए संसद भवन में उन्हें पुराने संसद भवन की तरह 'अपनेपन की कमी' महसूस होती है। उनके इस बयान के सामने आने के बाद से ही पक्ष और विपक्ष दोनों खेमे में इस पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं, और लोग यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा।
पुराने संसद भवन की यादें और उसके साथ जुड़ा खास लगाव
शशि थरूर ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि पुराना संसद भवन केवल पत्थरों और दीवारों की एक इमारत नहीं था, बल्कि उसके कण-कण में भारतीय लोकतंत्र का लंबा इतिहास और एक खास आत्मीयता बसी हुई थी। उन्होंने बताया कि पुराने भवन के गलियारे, सेंट्रल हॉल की बनावट और वहां के सांसद एक-दूसरे से जिस सहजता से मिलते थे, उसमें एक अलग ही अपनापन और अनौपचारिक गर्मजोशी हुआ करती थी। दशकों पुराने उस भवन में सांसदों के बीच जो संवाद और मेल-जोल का माहौल था, वह भारतीय लोकतंत्र की सांस्कृतिक धरोहर बन चुका था। यही कारण है कि पुराने संसद भवन से जुड़ी यादें कई अनुभवी सांसदों के दिलों के बहुत करीब हैं।
नए संसद भवन की बनावट और आधुनिक वास्तुकला पर चर्चा
नए संसद भवन का निर्माण सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत अत्याधुनिक सुविधाओं, डिजिटल तकनीक और बढ़ी हुई बैठने की क्षमता को ध्यान में रखकर किया गया है। लेकिन शशि थरूर का मानना है कि इस आधुनिकता और भव्यता के बीच वह पुरानी आत्मीयता थोड़ी पीछे छूट गई है। नए भवन में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, हाई-टेक गैजेट्स और विशाल हॉल तो हैं, लेकिन सांसदों के बीच आपस में मिलने-जुलने और अनौपचारिक बातचीत करने के जो प्राकृतिक अवसर पुराने भवन में आसानी से मिल जाते थे, वे अब कम हो गए हैं। आधुनिक वास्तुकला और भव्य डिजाइन अपनी जगह बेहतरीन हैं, लेकिन मानवीय जुड़ाव के मामले में यह नया माहौल थोड़ा अलग अनुभव कराता है।
राजनीतिक हलकों में शुरू हुई बयान पर चर्चा और प्रतिक्रियाएं
जैसे ही शशि थरूर का यह बयान मीडिया और सोशल मीडिया पर सामने आया, वैसे ही राजनीतिक विश्लेषकों और नेताओं के बीच इस पर बहस छिड़ गई। कुछ लोगों का मानना है कि किसी भी नई इमारत और कार्यस्थल के साथ खुद को ढालने में थोड़ा समय लगता है और धीरे-धीरे सांसद नए भवन से भी वैसा ही जुड़ाव महसूस करने लगेंगे। वहीं दूसरी तरफ, कुछ राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि पुराने ऐतिहासिक ढांचों की जो रूह और विरासत होती है, उसकी बराबरी करना किसी भी नए आधुनिक निर्माण के लिए तुरंत संभव नहीं होता है।
लोकतंत्र की असली ताकत इमारत नहीं बल्कि विचार हैं
इस पूरी चर्चा के दौरान शशि थरूर ने यह भी रेखांकित किया कि आखिरकार किसी भी देश के लिए लोकतंत्र की असली ताकत उसकी इमारतें या वास्तुकला नहीं होती, बल्कि वहां के सदन में होने वाली सार्थक बहसें, जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता और जनता के प्रति उनकी जवाबदेही होती है। चाहे संसद पुरानी हो या नई, असली महत्व इस बात का है कि देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदन के भीतर किस प्रकार की गरिमापूर्ण चर्चाएं होती हैं। उनका यह बयान एक तरफ जहां पुरानी यादों से जुड़ा था, वहीं दूसरी तरफ आधुनिक भारत की बदलती राजनीतिक व्यवस्था पर एक विचारोत्तेजक टिप्पणी भी साबित हुआ है।