युद्ध के बीच ईरानी महिलाओं का खुला विद्रोह: सड़कों पर बिना हिजाब घूम रहीं महिलाएं, जानिए सख्त कार्रवाई करने से क्यों कतरा रहा है प्रशासन

पश्चिम एशिया में जारी भारी सैन्य संघर्ष, अमेरिका-इजरायल से बढ़ते तनाव और गंभीर आर्थिक संकट के बीच ईरान के भीतर एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां एक ओर देश का शीर्ष नेतृत्व और सेना अंतरराष्ट्रीय युद्ध व रणनीतिक सुरक्षा में उलझी हुई है, वहीं दूसरी ओर राजधानी तेहरान समेत कई बड़े शहरों में ईरानी महिलाओं ने अनिवार्य हिजाब के नियमों को खुलेआम चुनौती देना शुरू कर दिया है। सड़कों, कैफे, बाजारों और यहां तक कि सार्वजनिक परिवहन में बिना हिजाब और खुले बालों के साथ घूमती महिलाओं की संख्या में भारी उछाल आया है। हालांकि, इस खुली नाफरमानी के बावजूद ईरानी प्रशासन और उसकी कुख्यात 'मोरालिटी पुलिस' (Gasht-e Ershad) पहले की तरह क्रूरता से कार्रवाई करने से बचती नजर आ रही है।
युद्ध के दौर में कैसे तेज हुआ हिजाब का खुला विरोध?
क्षेत्रीय युद्ध और हवाई हमलों के खतरे के बीच ईरान की आंतरिक सुरक्षा प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। सरकार का पूरा ध्यान फिलहाल बाहरी सुरक्षा, मिसाइल डिफेंस और खुफिया तंत्र की मजबूती पर केंद्रित है।
ईरानी महिलाओं ने इस ध्यान भटकाव (Strategic Distraction) को अपने व्यक्तिगत अधिकारों और आजादी की जमीन मजबूत करने के अवसर के रूप में लिया है। तेहरान, इस्फहान और शिराज जैसे प्रमुख शहरों की सड़कों पर महिलाएं न सिर्फ बिना स्कार्फ के आत्मविश्वास से टहल रही हैं, बल्कि स्कूटर चलाते और सार्वजनिक सभाओं में भाग लेते हुए भी सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर रही हैं।
कार्रवाई करने से क्यों घबरा रहा है प्रशासन? 4 बड़े कारण
ईरान के कट्टरपंथी धार्मिक और राजनीतिक गुट भले ही संसद में पारित सख्त 'हिजाब और लज्जा विधेयक' (Hijab and Chastity Bill) को लागू करने का दबाव बना रहे हों, लेकिन सरकार और सुरक्षा एजेंसियां सीधे एक्शन से हिचक रही हैं:
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1. महसा अमीनी जैसे नए जन-विद्रोह का डर: सितंबर 2022 में 22 वर्षीय कुर्द-ईरानी महिला महसा अमीनी की मोरालिटी पुलिस हिरासत में मौत के बाद पूरे देश में भड़का 'महिला, जीवन, आजादी' (Woman, Life, Freedom) आंदोलन ईरानी हुकूमत के लिए ऐतिहासिक चुनौती बन गया था। यदि इस समय किसी महिला के खिलाफ हिंसक कार्रवाई होती है और कोई अप्रिय घटना घटती है, तो युद्ध के बीच पूरे देश में दोबारा अनियंत्रित नागरिक विद्रोह भड़कने का खतरा है।
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2. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का सुधारवादी रुख: सुधारवादी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी नागरिक की आस्था या व्यवहार को लाठी-डंडों और जबरन कानून से नहीं बदला जा सकता। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से मोरालिटी पुलिस द्वारा महिलाओं को परेशान करने की नीति का विरोध किया है, जिससे सुरक्षा बलों के आक्रामक तेवर ठंडे पड़े हैं।
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3. दोहरे मोर्चे पर जंग से बचने की मजबूरी: एक तरफ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, मुद्रा रियाल का भारी अवमूल्यन और युद्ध का साया है। ऐसे में ईरानी शासन अपनी ही आधी आबादी यानी महिलाओं के साथ घरेलू 'सांस्कृतिक युद्ध' (Internal Front) खोलकर देश को पूरी तरह अस्थिर नहीं करना चाहता।
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4. विरोध का सामाजिक रूप से सामान्य (Normalize) होना: अब केवल कुछ एक्टिविस्ट ही नहीं, बल्कि हर उम्र, वर्ग और पृष्ठभूमि की आम महिलाएं सार्वजनिक रूप से हिजाब का त्याग कर रही हैं। जब अवज्ञा लाखों की संख्या में सामान्य हो जाती है, तो उसे पुलिस बल से दबाना प्रशासनिक रूप से लगभग असंभव हो जाता है।
कट्टरपंथियों का दबाव और परोक्ष प्रतिबंधों की नई रणनीति
सीधे सड़क पर महिलाओं को गिरफ्तार करने में आ रहे जोखिमों को देखते हुए कट्टरपंथी व्यवस्था अब परोक्ष हथकंडे अपना रही है। नियमों का उल्लंघन करने वाली महिलाओं को शरण देने के आरोप में दर्जनों कैफे, रेस्तरां और दुकानों को सील किया जा रहा है, और सर्विलांस कैमरों के जरिए कारों पर नोटिस भेजे जा रहे हैं।
इसके बावजूद, ईरानी समाज में डर का वह पर्दा टूट चुका है जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दशकों तक कायम था। ईरान की महिलाएं आज बिना किसी हथियार के, केवल अपने खुले बालों और अटूट साहस के साथ इतिहास की सबसे बड़ी शांत क्रांति का नेतृत्व कर रही हैं।