आधार ओटीपी की मदद से 7 महीने से लापता युवती का ऐसे चला पता, जानकर रह जाएंगे हैरान

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से एक बेहद चौंकाने वाला और हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने आधुनिक डिजिटल तकनीक और पुलिस की सूझबूझ की एक अनूठी मिसाल पेश की है। आज के इस तकनीकी युग में जहां डिजिटल पहचान हर नागरिक की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुकी है, वहीं इसी तकनीक ने एक लंबे समय से पहेली बनी गुमशुदगी के मामले को सुलझाने में अहम भूमिका निभाई है। पिछले सात महीने से अधिक समय से लापता चल रही 18 वर्षीय एक युवती को बेंगलुरु पुलिस ने आधुनिक तकनीक और आधार ओटीपी के जरिए आखिरकार सुरक्षित ढूंढ निकाला है। इस पूरी घटना ने यह साबित कर दिया है कि किस प्रकार डिजिटल फुटप्रिंट्स और सरकारी दस्तावेजों के तकनीकी इस्तेमाल से कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए जटिल से जटिल मामलों को सुलझाना आसान हो जाता है। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति के मिलने भर का नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी गवाह है कि कैसे पुलिस और जांच एजेंसियों ने हाई कोर्ट के आदेश के बाद अपनी तकनीकी ताकत का लोहा मनवाया है।
इस पूरी घटना की शुरुआत इसी साल 31 जनवरी को हुई थी, जब बेंगलुरु के विद्यारण्यपुरा इलाके से एक 18 वर्षीय युवती अचानक रहस्यमय परिस्थितियों में अपने घर से लापता हो गई थी। परिजनों के मुताबिक, वह उस दिन कॉलेज जाने की बात कहकर घर से निकली थी, लेकिन जब वह वापस नहीं लौटी तो परिवार वालों की नींद उड़ गई। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई थी कि वह अपने साथ केवल अपनी पहचान से जुड़ा मुख्य दस्तावेज और एक साधारण सा कॉलेज बैग लेकर निकली थी। उस वक्त उनके पास कोई मोबाइल फोन या अन्य कीमती सामान नहीं था, जिससे उनकी लोकेशन का तुरंत पता लगाया जा सके। घर से निकलने के बाद दोनों ने कुछ समय के लिए अपनी दिशा बदली और माले महादेश्वरा हिल्स की ओर रुख किया, जिसके बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए। परिवार ने अपनी बेटी की तलाश के लिए हर संभव कोशिश की, लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला, तो उन्होंने न्याय की आस में कर्नाटक हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और एक बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की, जिसके बाद इस मामले ने एक नया मोड़ ले लिया।
कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश और सीआईडी की एंट्री
परिजनों द्वारा दायर की गई हेबियस कॉर्पस याचिका को गंभीरता से लेते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस मामले की जांच के आदेश दिए, जिसके बाद इसी साल अप्रैल के महीने में राज्य की अपराध जांच विभाग यानी सीआईडी ने इस पेचीदा मामले की कमान अपने हाथों में ले ली। सीआईडी के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस मामले की तह तक जाने के लिए पारंपरिक जांच के साथ-साथ डिजिटल सर्विलांस और आधुनिक तकनीकी साधनों का सहारा लेना शुरू किया। हालांकि, शुरुआती महीनों में जांचकर्ताओं के हाथ कोई ठोस सुराग नहीं लग पा रहा था क्योंकि लापता युवती के पास कोई चालू मोबाइल फोन नहीं था और न ही उसके संवाद का कोई सीधा जरिया बचा था। इसके बावजूद जांच टीम ने हार नहीं मानी और हर एक डिजिटल लिंक को टटोलना जारी रखा। इसी कड़ी में इस सप्ताह के शुरुआती दिनों में जांचकर्ताओं को एक ऐसा तकनीकी ब्रेकथ्रू मिला जिसने पूरे मामले की तस्वीर ही बदल दी और सात महीने से धुंध के पर्दे के पीछे छिपे राज से पर्दा उठने लगा।
जांच के दौरान सीआईडी की तकनीकी विंग को यह पुख्ता जानकारी मिली कि लापता युवती ने हाल ही में अपनी डिजिटल पहचान या उससे जुड़े किसी दस्तावेज का इस्तेमाल किया है। इस प्रक्रिया के दौरान जो वन-टाइम पासवर्ड यानी ओटीपी जनरेट हुआ था, उसमें किसी अन्य मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किया गया था। जांच एजेंसियों ने जब इस तकनीकी सुराग की बारीकी से पड़ताल की, तो पता चला कि उस ओटीपी के लिए जो फोन नंबर इस्तेमाल किया गया है, वह किसी और का नहीं बल्कि उसी युवती के पति का नंबर है। हालांकि पुलिस अधिकारियों ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह डिजिटल या बायोमेट्रिक जानकारी किस विशिष्ट सरकारी या निजी सेवा के लिए उपयोग में लाई गई थी, लेकिन यह सुराग पुलिस को सीधे उस स्थान तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त साबित हुआ जहां युवती लंबे समय से छिपी हुई थी। इस डिजिटल सुराग की बिना पर पुलिस ने तुरंत एक्शन लेते हुए उस मोबाइल नंबर के जरिए उसके पति की लोकेशन का पता लगा लिया और कनकपुरा तालुक के एक दूरदराज गांव तक जा पहुंची।
कनकपुरा तालुक के गांव में मिली लापता युवती और आगे की जांच
पुलिस की टीम जब कनकपुरा तालुक के उस ग्रामीण इलाके में पहुंची, तो वहां का नजारा देखकर वे भी एक बार के लिए हैरान रह गए। सात महीने पहले जो लड़की अपने घर से सिर्फ कॉलेज बैग लेकर निकली थी, वह उस गांव में अपने पति के साथ रह रही थी। सीआईडी के वरिष्ठ अधिकारियों ने मीडिया को यह जानकारी दी कि जब पुलिस ने युवती को खोज निकाला, तो वह गर्भवती थी। पुलिस ने फौरन कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उसे अपनी सुरक्षा में लिया और उच्च न्यायालय के समक्ष पेश किया। कोर्ट में पेश किए जाने के बाद वैधानिक औपचारिकताएं पूरी करते हुए युवती को उसके माता-पिता को सुरक्षित सौंप दिया गया। इस प्रकार सात महीने से अनिश्चितता के साए में जी रहे परिवार को आखिरकार राहत की सांस मिली, और उनकी बेटी उनके आंचल में वापस लौट आई।
हालांकि इस मामले का एक और पहलू अभी भी पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ है। शुरुआत में जब यह युवती घर से निकली थी, तो उसके साथ एक अन्य नाबालिग दोस्त भी थी, जो उस समय से ही लापता चल रही है। पुलिस और जांच अधिकारियों का कहना है कि जब तक उस दूसरी नाबालिग लड़की का सही-सलामट और पुख्ता सुराग हाथ नहीं लग जाता, तब तक इस पूरे मामले की जांच और तलाशी अभियान जारी रहेगा। पुलिस ने यह भी संकेत दिए हैं कि जैसे ही उस दूसरी लड़की के बारे में कोई ठोस जानकारी मिलेगी, उसे भी कानूनी प्रक्रिया के तहत उसके परिजनों तक पहुंचाया जाएगा। इस पूरी घटना ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि तकनीक का सही इस्तेमाल किस तरह अपराधियों और गुमशुदा लोगों तक पहुंचने का सबसे बड़ा जरिया बन सकता है, और आधार जैसी डिजिटल व्यवस्थाएं देश की कानून व्यवस्था को मजबूत करने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।