विदेश

मुस्लिम संत, मक्का यात्रा और दाढ़ी में छिपाए 7 बीज: आखिर भारत की धरती पर कैसे आई थी पहली कॉफी

जब भी सुबह की शुरुआत करने की बात आती है, तो दुनिया भर के करोड़ों लोगों के जेहन में सबसे पहला नाम गर्म और तरोताजा कर देने वाली कॉफी का ही आता है। आज के समय में कैफे कल्चर से लेकर घरों की रसोई तक कॉफी हर उम्र के लोगों की पहली पसंद बन चुकी है, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि जिस बेहतरीन खुशबू और स्वाद वाली कॉफी के हम आज इतने दीवाने हैं, वह आखिर पहली बार भारत की इस पवित्र धरती पर कैसे और किसके द्वारा लाई गई थी। इसकी कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं है, जिसमें एक मुस्लिम संत, मक्का की पवित्र यात्रा, दाढ़ी में छिपाए गए सात जादुई बीज और दक्षिण भारत की हरी-भरी पहाड़ियों का अनोखा संगम देखने को मिलता है। इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो भारत में कॉफी के आगमन की यह दास्तान जितनी हैरान करने वाली है, उतनी ही ज्यादा दिलचस्प भी है, जो आज भी कर्नाटक की खूबसूरत वादियों में जिंदा है।

बाबा बुदान और मक्का की वह ऐतिहासिक यात्रा

भारत में कॉफी के इतिहास की शुरुआत सत्रहवीं शताब्दी के आसपास होती है, जिसके केंद्र में बाबा बुदान नाम के एक महान और आध्यात्मिक सूफी संत हुआ करते थे। उन दिनों अरेबियन प्रायद्वीप यानी यमन के रास्ते कॉफी पूरी दुनिया में अपनी खास पहचान बना चुकी थी, लेकिन यमन के लोग इस बात को लेकर बेहद सख्त थे कि कॉफी के कच्चे बीजों या पौधों को उनके देश की सीमाओं से बाहर बिल्कुल भी नहीं जाने दिया जाएगा ताकि दुनिया का कोई अन्य देश कॉफी का उत्पादन न कर सके। ऐसे समय में जब बाबा बुदान अपनी धार्मिक आस्था के चलते मक्का की पवित्र तीर्थयात्रा पर गए हुए थे, तो उन्होंने वहां पहली बार इस अद्भुत और ऊर्जावान पेय पदार्थ का स्वाद चखा और वे इसकी मनमोहक महक तथा ताजगी से पूरी तरह मंत्रमुग्ध हो गए। उनके मन में यह तीव्र इच्छा जागी कि क्यों न इस बेहतरीन पौधे को अपने देश भारत लाया जाए ताकि यहां के लोग भी इसका लाभ उठा सकें, लेकिन यमन के कड़े नियमों के कारण ऐसा करना असंभव सा प्रतीत हो रहा था।

दाढ़ी में छिपाए गए सात बीज और भारत का सफर

यमन के शासकों के कड़े पहरे और नियमों को चकमा देना कोई आसान काम नहीं था क्योंकि हर तीर्थयात्री की कड़ी तलाशी ली जाती थी ताकि कोई भी बीज देश से बाहर न जा सके। अपनी अकलमंदी और दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए सूफी संत बाबा बुदान ने एक ऐसा नायाब तरीका निकाला जिसके बारे में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था। उन्होंने कॉफी के सात कच्चे और उपजाऊ बीजों को चुपचाप अपनी घनी लंबी दाढ़ी के बालों के अंदर छिपा लिया, जिसे चेकिंग के दौरान सुरक्षाकर्मी भांप नहीं पाए और इस तरह वे बिना किसी रोक-टोक के उन बीजों को अपने साथ भारत लाने में पूरी तरह कामयाब हो गए। यमन के हूती नियंत्रित क्षेत्र या उस भूभाग से जुड़े इलाकों से जुड़ी इस किंवदंती के अनुसार, जब संत मक्का की यात्रा पूरी करके अपने वतन लौटे, तो उन्होंने इन सातों बीजों को कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले की शांत और उपजाऊ पहाड़ियों की गोद में सहर्ष बो दिया।

चिकमंगलूर की पहाड़ियों में रोपे गए पहले पौधे

कर्नाटक की खूबसूरत और नम हवाओं वाली बाबा बुदान गिरी की पहाड़ियों में जब उन सात बीजों को रोपा गया, तो प्रकृति ने भी उनका पूरा साथ दिया और कुछ ही समय में वे बीज अंकुरित होकर छोटे-छोटे पौधों के रूप में बाहर निकल आए। इन पहाड़ियों की जलवायु, मिट्टी का प्रकार और बारिश का मौसम कॉफी के पौधों के विकास के लिए एकदम अनुकूल साबित हुआ, जिससे धीरे-धीरे इन पौधों ने एक बड़े बाग का रूप ले लिया। स्थानीय लोगों ने जब इन पौधों पर उगने वाले लाल रंग के चेरी जैसे फलों और उनके अंदर मौजूद बीजों को भूनकर पेय बनाना सीखा, तो उन्हें वही स्वाद मिला जो कभी मध्य पूर्व के देशों में प्रसिद्ध हुआ करता था। इस प्रकार भारत में व्यावसायिक रूप से कॉफी की खेती का श्रीगणेश हुआ और बाबा बुदान की इस अनूठी कोशिश ने भारत को विश्व मानचित्र पर एक उभरते हुए कॉफी उत्पादक देश के रूप में पहचान दिलाने की मजबूत नींव रख दी।

आज वैश्विक पटल पर भारत की कॉफी की धाक

बाबा बुदान द्वारा लाई गई उस सात बीजों की छोटी सी कहानी आज देश के भीतर एक विशाल और समृद्ध उद्योग का रूप ले चुकी है, जिसमें कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के दक्षिणी राज्य सबसे आगे हैं। आज भारत में पैदा होने वाली अरेबिका और रोबस्टा किस्म की कॉफी अपनी बेहतरीन गुणवत्ता, सोंधी खुशबू और अनोखे स्वाद के कारण दुनिया भर के देशों में भारी मात्रा में निर्यात की जाती है। आज जब भी कोई कॉफी प्रेमी अपने दिन की शुरुआत एक कप गरमागरम कॉफी की चुस्की के साथ करता है, तो शायद ही उसे इस बात का अहसास होता होगा कि इस सौगात को भारत तक पहुंचाने के लिए सदियों पहले एक संत ने अपनी दाढ़ी में इन बीजों को छिपाकर कितनी बड़ी साहसिक यात्रा तय की थी। यह अनूठी ऐतिहासिक दास्तान हमें यह सिखाती है कि यदि किसी चीज को पाने की इच्छा सच्ची हो, तो इतिहास की धारा को भी अपनी पसंद के अनुसार मोड़ा जा सकता है।

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