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सऊदी अरब के खिलाफ जाकर पाकिस्तान ने चली थी यह बड़ी चाल, शहबाज शरीफ ने क्राउन प्रिंस MBS से क्यों मांगी माफी

मध्य पूर्व (Middle East) की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों और कूटनीतिक चालबाजियों के बीच पाकिस्तान और सऊदी अरब के संबंधों को लेकर एक बार फिर से बड़ी हलचल तेज हो गई है। हाल ही में ऐसी सामरिक रिपोर्ट्स सामने आई थीं कि पाकिस्तान ने यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ चल रहे सैन्य संघर्ष में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ गुप्त रूप से या कूटनीतिक स्तर पर रणनीतिक धोखा किया, जिससे रियाद के हुक्मरेानों में गहरी नाराजगी पैदा हो गई थी। खाड़ी देशों में अपनी साख और दशकों पुरानी आर्थिक मदद के खतरे को भांपते हुए अब इस्लामाबाद पूरी तरह से 'डैमेज कंट्रोल' मोड में आ चुका है। इसी कड़ी में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के ताकतवर वली अहद यानी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) को सीधे फोन मिलाकर रिश्तों में आई इस कड़वाहट को मिटाने और पुरानी रणनीतिक नजदीकियों को बहाल करने की गुहार लगाई है।

खाड़ी देशों की राजनीति में सऊदी अरब लंबे समय से यमन के रास्ते अपनी सुरक्षा सीमाओं की रक्षा करने में जुटा है, जहां ईरान समर्थित हूती विद्रोही लगातार रियाद के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले करते रहे हैं। इस संकट की घड़ी में जब सऊदी अरब को अपने पारंपरिक और रक्षात्मक सहयोगी देशों से पूरी एकजुटता की उम्मीद थी, तब पाकिस्तान की तरफ से अपनाई गई कथित दोहरी कूटनीति ने हालात को उलझा दिया। शुरुआती दौर में पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से तो सऊदी समर्थन का दावा किया, लेकिन पर्दे के पीछे उसकी सेना और कुछ नीतिगत फैसलों ने हूतियों के खिलाफ रियाद की सैन्य कार्रवाई को अप्रत्यक्ष रूप से कमजोर कर दिया। मध्य पूर्व के कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि पाकिस्तान अपने घरेलू राजनीतिक और आर्थिक संकटों से जूझते हुए अब ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को सीधे तौर पर नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता, जिसके चलते उसने सऊदी अरब के खिलाफ जाकर एक प्रकार का रणनीतिक विश्वासघात किया था।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था वर्तमान में जिस गहरे और भयानक वित्तीय संकट से गुजर रही है, उसमें सऊदी अरब की भूमिका किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार जब भी रसातल में जाने लगता है, तो सऊदी अरब ही वह देश है जो अरबों डॉलर के बेलआउट पैकेज, तेल की उधार आपूर्ति और सेंट्रल बैंक में कैश डिपॉजिट के जरिए पाकिस्तान की डूबती नैया को बचाता है। जब शहबाज शरीफ सरकार को यह अहसास हुआ कि हूतियों के मामले में चली गई उनकी कूटनीतिक चाल ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को नाराज कर दिया है, तो इस्लामाबाद के हुक्मरानों के हाथ-पांव फूल गए। पाकिस्तान अच्छी तरह जानता है कि यदि सऊदी अरब ने अपनी आर्थिक मदद के दरवाजे बंद कर दिए या पाकिस्तान से जुड़े अपने निवेश को समेट लिया, तो देश कुछ ही हफ्तों में पूरी तरह दिवालिया हो सकता है। इसी बड़े डर के चलते प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बिना किसी देरी के तुंरत कूटनीतिक फोन घनघनाए और रियाद के साथ गिले-शिकवे दूर करने की पहल शुरू कर दी।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच हुई इस उच्च-स्तरीय टेलीफोनिक वार्ता में क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा सहयोग और आर्थिक साझेदारी को लेकर गंभीर चर्चा हुई। पाकिस्तानी मीडिया और कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, शहबाज शरीफ ने MBS को यह विश्वास दिलाने की पूरी कोशिश की है कि पाकिस्तान हर परिस्थिति में सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के साथ चट्टान की तरह खड़ा है। प्रधानमंत्री ने यमन और लाल सागर क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों के बीच सऊदी हितों के प्रति पाकिस्तान की प्रतिबद्धता को दोहराया, ताकि रियाद के मन में बैठी उस शंका को दूर किया जा सके जो हालिया फैसलों की वजह से पैदा हुई थी। हालांकि, सऊदी नेतृत्व ने इस बातचीत के दौरान कड़े कूटनीतिक संदेश देते हुए साफ कर दिया है कि रणनीतिक मामलों में दोहरे मापदंड अब स्वीकार नहीं किए जाएंगे और दोस्ती को बनाए रखने के लिए जमीनी स्तर पर भरोसे का खरा उतरना जरूरी है।

एक तरफ जहां पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ अपने पुराने रिश्तों को बचाने के लिए हाथ-पैर मार रहा है, वहीं दूसरी तरफ मध्य पूर्व में भारत की बढ़ती कूटनीतिक और आर्थिक पकड़ ने इस्लामाबाद की नींद उड़ाई हुई है। आज के समय में भारत और सऊदी अरब के बीच रक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, ऊर्जा साझेदारी और तकनीकी आदान-प्रदान का ग्राफ बेहद ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की व्यक्तिगत केमेस्ट्री ने खाड़ी देशों में भारत के प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया है। ऐसे में जब पाकिस्तान खुद को यमन या हूती संघर्ष के चक्कर में सऊदी कूटनीति से अलग-थलग पाता है, तो उसे यह डर सताने लगता है कि कहीं सऊदी अरब रणनीतिक प्राथमिकताओं में भारत को तरजीह देकर उसे पूरी तरह किनारे न लगा दे। शहबाज शरीफ का यह ताजा डैमेज कंट्रोल प्रयास केवल एक फोन कॉल नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में अपनी प्रासंगिकता खोने के डर से उपजा एक मजबूरी भरा कदम है, जिसके दूरगामी परिणाम आने वाले दिनों में पाकिस्तान की विदेश नीति तय करेंगे।

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