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क्या ट्रंप के दबाव में लगा UPI पर चार्ज? राहुल गांधी के ‘सरेंडर’ वाले वार पर केंद्र का पलटवार, कहा- ‘फैसला स्वतंत्र, ग्राहकों पर कोई बोझ नहीं’

डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी सफलता माने जाने वाले यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के नए फ्रेमवर्क को लेकर देश में तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी प्रशासन और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आकर भारतीय डिजिटल भुगतान प्रणाली पर शुल्क लगाने का रास्ता खोला है।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर वीडियो और पोस्ट साझा करते हुए कहा कि लंबे समय से अमेरिकी भुगतान कंपनियां भारत की 'जीरो-एमडीआर' नीति का विरोध कर रही थीं। उन्होंने दावा किया कि ₹2,000 से ऊपर के व्यावसायिक लेन-देन पर शुल्क की अनुमति देकर सरकार ने विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए भारतीय व्यापारियों और परोक्ष रूप से ग्राहकों की जेब पर 'यूपीआई टैक्स' का बोझ डाला है। राहुल ने मांग की कि सरकार इस फैसले को तुरंत वापस ले।

केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय का दो टूक जवाब: 'विदेशी दबाव का आरोप मनगढ़ंत'

विपक्ष के तीखे हमलों के बीच वित्त मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर विदेशी दबाव और अमेरिकी प्रभाव के सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया।

सरकार ने बिंदुवार स्पष्टीकरण देते हुए कहा:

  • नीतिगत फैसला पूरी तरह स्वतंत्र: वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यूपीआई से जुड़े सभी निर्णय भारत की घरेलू आर्थिक प्राथमिकताओं और डिजिटल ढांचे को दीर्घकालिक रूप से मजबूत बनाने के लिए स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं। इसे किसी बाहरी शक्ति या राष्ट्रपति ट्रंप से जोड़ना पूरी तरह भ्रामक और निराधार है।

  • ग्राहकों पर कोई शुल्क नहीं: सरकार ने दोहराया कि आम उपभोक्ताओं के लिए यूपीआई पहले की तरह 100% मुफ्त रहेगा। व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांसफर पूरी तरह शुल्क-मुक्त हैं।

  • दुकानदार ग्राहकों पर नहीं डाल सकते बोझ: बैंकों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि मर्चेंट किसी भी स्थिति में इस शुल्क को एमडीआर के नाम पर ग्राहकों से नहीं वसूल सकते। इसके साथ ही यूपीआई ऐप प्रदाताओं को किसी भी प्रकार का छिपा हुआ प्लेटफॉर्म चार्ज लगाने की अनुमति नहीं होगी।

नया MDR फ्रेमवर्क क्या है: किसे देना होगा और किसे मिलेगी छूट?

नए नियमों के अनुसार व्यवस्था को संतुलित रखने के लिए स्पष्ट सीमाएं तय की गई हैं:

  • ₹2,000 तक पूरी तरह मुफ्त: आम जनता और छोटे कारोबारियों द्वारा किए जाने वाले ₹2,000 तक के सभी लेन-देन पूरी तरह चार्ज-मुक्त रहेंगे। देश के 95% से अधिक दैनिक मर्चेंट ट्रांजैक्शन इसी दायरे में आते हैं।

  • ₹2,000 से ऊपर के बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन: केवल बड़े व्यावसायिक लेन-देन पर 0.4% की दर से एमडीआर का प्रावधान किया गया है।

  • अधिकतम सीमा (Capping): बड़े भुगतानों पर भी शुल्क को सीमित करने के लिए ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन पर अधिकतम चार्ज ₹300 पर कैप कर दिया गया है।

  • छोटे दुकानदारों को सुरक्षा: क्यूआर कोड के जरिए प्रति माह ₹1 लाख तक का भुगतान प्राप्त करने वाले छोटे दुकानदारों पर जीरो-एमडीआर का संरक्षण जारी रहेगा।

सरकार का तर्क: क्यों जरूरी है वित्तीय स्थिरता और साइबर सुरक्षा?

सरकारी सूत्रों और संसदीय वित्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में यूपीआई का सालाना परिचालन और बुनियादी ढांचा खर्च लगभग ₹20,700 करोड़ तक पहुंच चुका है। सरकार अपनी सब्सिडी के जरिए लगभग ₹2,000 करोड़ का वहन करती आ रही थी।

बढ़ते लेन-देन के साथ सर्वर क्षमता, उन्नत एन्क्रिप्शन, साइबर सुरक्षा और फ्रॉड प्रिवेंशन सिस्टम को बनाए रखने के लिए बैंकों और पेमेंट एग्रीगेटर्स को भारी पूंजीगत निवेश की आवश्यकता होती है। यह एमडीआर सरकार का कोई टैक्स नहीं है, बल्कि बैंकों, नेटवर्क और तकनीकी प्रदाताओं के बीच बंटेगा ताकि डिजिटल भुगतान प्रणाली आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से अभेद्य बनी रहे।

शीर्ष अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि इस फैसले को वापस लेने का कोई विचार नहीं है और यह ढांचा 15 अक्टूबर से विधिवत प्रभावी होगा।

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