UN में शहबाज शरीफ के झूठ पर भारत का करारा प्रहार: 9/11 और ओसामा बिन लादेन की याद दिला पेटल गहलोत ने दिखाई औकात

वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े मंच संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें वार्षिक उच्चस्तरीय सत्र में पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी अंतरराष्ट्रीय फजीहत कराने की पुरानी रिवायत दोहरा दी। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों के समक्ष अपने संबोधन में घरेलू राजनीतिक मजबूरियों के तहत कश्मीर का पुराना और घिसा-पिटा राग अलापा। शहबाज शरीफ ने दावा किया कि उनका मुल्क कश्मीर के लोगों को तब तक राजनीतिक, राजनयिक और नैतिक समर्थन देता रहेगा जब तक उन्हें तथाकथित आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं मिल जाता। दुनिया जब जलवायु परिवर्तन, युद्ध संकट और आर्थिक स्थिरता जैसे गंभीर मसलों पर चर्चा कर रही थी, तब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का यह अप्रसांगिक भाषण वैश्विक मंच पर उपहास का पात्र बन गया।
भारत ने इस झूठे प्रोपेगेंडा का जवाब देने में रत्ती भर भी देर नहीं की। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव पेटल गहलोत ने 'राइट टू रिप्लाई' के तहत पाकिस्तान के एक-एक झूठ की धज्जियां उड़ा दीं। भारतीय राजनयिक ने बेहद सधे हुए और तीखे लहजे में कहा कि आज इस प्रतिष्ठित महासभा ने पाकिस्तानी प्रतिनिधि के विचित्र और बेबुनियाद दावे सुने हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब न्यूयॉर्क और पूरा विश्व मानवता के सबसे भीषण आतंकी हमले 9/11 की 25वीं बरसी मना रहा है। पेटल गहलोत ने पूरी दुनिया को याद दिलाया कि इस वीभत्स हमले का मास्टरमाइंड और दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी ओसामा बिन लादेन पाकिस्तानी सेना की प्रमुख काकुल मिलिट्री अकादमी के ठीक बगल में एबटाबाद में वर्षों तक महफूज पनाह पाए हुए था। उन्होंने दो टूक कहा कि जिस पाकिस्तानी सेना और उसकी संस्थाओं के सामने आज के हुक्मरान नतमस्तक हैं, वही असल में वैश्विक आतंकवाद की मुख्य नर्सरी रही है।
1948 से आज तक: कश्मीर पर भारत का अटूट रुख और पाकिस्तान की ऐतिहासिक हार
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर के मुद्दे का संयुक्त राष्ट्र के पन्नों में एक लंबा और ऐतिहासिक रिकॉर्ड रहा है। जनवरी 1948 में जब पहली बार इस मसले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में ले जाया गया था, तब से ही भारत ने हर बार यह सिद्ध किया है कि पूरा जम्मू, कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न, अविभाज्य और संप्रभु हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। पाकिस्तान ने 1947-48 में कबायलियों की आड़ में हमला करके जिस हिस्से पर गैर-कानूनी ढंग से कब्जा किया था, वह आज भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के रूप में उसकी अवैध घुसपैठ का प्रत्यक्ष गवाह है। भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को यह समझाया है कि शिमला समझौते और लाहौर घोषणापत्र के तहत यह विशुद्ध रूप से द्विपक्षीय मामला है और इसमें किसी तीसरे पक्ष या संस्था के दखल की कोई गुंजाइश नहीं है।
इसके विपरीत, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दशकों पुराने और अप्रासंगिक हो चुके प्रस्तावों की दुहाई देकर विश्व का ध्यान अपनी अंदरूनी नाकामियों से भटकाने का प्रयास करता आया है। लेकिन 5 अगस्त 2019 को संविधान के अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर में जिस तेजी से लोकतंत्र की बहाली, ऐतिहासिक मतदान और अभूतपूर्व बुनियादी ढांचागत विकास हुआ है, उसने पाकिस्तान के हर झूठे नैरेटिव की जड़ें हिला दी हैं। यूएन के गलियारों में अब जब भी पाकिस्तान कश्मीर का नाम लेता है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसे एक हताश और दिवालिया मुल्क के राजनीतिक स्टंट के तौर पर ही देखता है।
जुलाई 2025 में सुरक्षा परिषद का दुरुपयोग और राजदूत हरीश का कूटनीतिक जवाब
पाकिस्तान जब भी किसी मंच की अस्थाई व्यवस्था या अध्यक्षता संभालता है, वह अपने निहित स्वार्थों के लिए उसका दुरुपयोग करने से पीछे नहीं हटता। पिछले साल जुलाई 2025 में जब पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद की मासिक अध्यक्षता का अवसर मिला, तो उसने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करने के लिए सिंधु जल संधि और कश्मीर का बेजा इस्तेमाल करने की असफल कोशिश की। उस समय संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वथानेनी हरीश ने सुरक्षा परिषद के खुले सत्र में पाकिस्तान की इन हरकतों का जोरदार और आधिकारिक खंडन किया था।
राजदूत हरीश ने तथ्यों और कानूनी दस्तावेजों के आधार पर सुरक्षा परिषद को अवगत कराया कि भारत अपनी संप्रभुता के साथ कभी कोई समझौता नहीं करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि को लेकर भारत का रुख पूरी तरह विधिक और पारदर्शी है, जबकि पाकिस्तान तकनीकी बदलावों पर सहयोग करने के बजाय हर जल समझौते को राजनीतिक रंग देने का आदी रहा है। भारत के इस सख्त और तर्कसंगत प्रतिरोध ने पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद में पूरी तरह अलग-थलग कर दिया था और उसके समर्थक देशों को भी बैकफुट पर जाने के लिए मजबूर कर दिया था।
वैश्विक आतंकवाद का केंद्र और 20 से अधिक यूएन प्रतिबंधित आतंकियों की पनाहगाह
भारत ने दुनिया के सामने समय-समय पर यह अकाट्य तथ्य उजागर किया है कि पाकिस्तान किस तरह आतंकवाद को अपनी राजकीय नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। फरवरी 2025 की यूएनएससी की बैठक में भारत ने पाकिस्तान को दुनिया में 'आतंकवाद का वैश्विक उपरिकेंद्र' (Global Epicenter of Terrorism) करार दिया था। जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे दुर्दांत आतंकी संगठनों के सरगना आज भी रावलपिंडी और इस्लामाबाद के साए में सुरक्षित जीवन बिता रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित 20 से अधिक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी पाकिस्तान की धरती पर खुलेआम जलसे करते हैं और फंड इकट्ठा करते हैं।
भारत ने 2001 का संसद हमला, 26/11 मुंबई नरसंहार और पहलगाम में बेकसूर पर्यटकों पर हुए कायराना हमलों के डिजिटल और फॉरेंसिक सबूत यूएन काउंटर-टेररिज्म कमेटी को सौंपे हैं। मई 2025 में जब भारतीय सुरक्षा बलों ने सीमा पार से घुसपैठ करने वाले आतंकियों को 'ऑपरेशन सिंदूर' में ढेर किया था, तो पाकिस्तानी सेना के उच्च अधिकारियों द्वारा उन आतंकियों के शवों पर अपनी सेना का झंडा लपेटकर राजकीय सम्मान दिए जाने की तस्वीरें सामने आई थीं। भारत ने इन तस्वीरों को संयुक्त राष्ट्र में पेश कर पाकिस्तान के उस पाखंड का पर्दाफाश किया था जिसमें वह खुद को आतंकवाद का शिकार बताता फिरता है।
आईएमएफ के कर्ज पर जिंदा मुल्क और बाल अधिकारों पर ढोंग का पर्दाफाश
संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर पाकिस्तान का दोहरा चरित्र उस समय और अधिक उजागर हो जाता है जब वह आंतरिक मानवाधिकारों पर उपदेश देने लगता है। जून 2025 में जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बच्चों और सशस्त्र संघर्ष पर खुली परिचर्चा चल रही थी, तब पाकिस्तान ने कश्मीर में बच्चों के अधिकारों को लेकर मनगढ़ंत आरोप लगाए थे। भारत ने तत्काल पलटवार करते हुए बताया कि जो मुल्क अपने खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों में मासूम बच्चों को जबरन गायब करवाता है और मदरसों में कट्टरपंथ की भट्टी में झोंकता है, उसे मानवाधिकारों पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
जुलाई 2025 में संयुक्त राष्ट्र की 80वीं वर्षगांठ के ऐतिहासिक अवसर पर भारत ने वैश्विक समुदाय को यह आईना दिखाया कि एक तरफ भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक व लोकतांत्रिक महाशक्ति के रूप में अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक मानवता का नेतृत्व कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर खड़ा है। पाकिस्तान अपनी दैनिक अर्थव्यवस्था को ऑक्सीजन देने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कर्ज और मित्र देशों की आर्थिक खैरात पर निर्भर है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया कि कर्ज की बैसाखियों पर चलने वाला और कट्टरता में आकंठ डूबा देश भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता पर सवाल उठाने की स्थिति में नहीं है।
भारत की आक्रामक 'राइट टू रिप्लाई' नीति: झूठ के खिलाफ कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के हर प्रोपेगेंडा को ध्वस्त करने के लिए भारत ने पिछले कुछ वर्षों में एक बेहद आक्रामक, तथ्य-आधारित और अचूक कूटनीतिक रणनीति विकसित की है। इस रणनीति की रीढ़ भारत के युवा राजनयिक हैं, जो बिना किसी लाग-लपेट के दुनिया के सामने पाकिस्तान के नकाब को उतार देते हैं। जब भी पाकिस्तान का कोई नेता या प्रतिनिधि भारत के खिलाफ झूठे आरोप लगाता है, भारत तुरंत 'राइट टू रिप्लाई' का उपयोग करता है और कुछ ही मिनटों में आंकड़ों, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और ऐतिहासिक संदर्भों के जरिए उनके दावों को ध्वस्त कर देता है।
भारत कोरे बयानों पर भरोसा नहीं करता बल्कि सीमा पार घुसपैठ, बरामद चीनी और तुर्किये हथियारों के सीरियल नंबर, जीपीएस ट्रैकर्स और पकड़े गए आतंकियों के कबूलनामे संयुक्त राष्ट्र की आतंकवाद निरोधक समितियों के टेबल पर रखता है। इसके साथ ही भारत पाकिस्तान की आंतरिक बदहाली—सिंध और बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का हनन, हिंदू, सिख और ईसाई अल्पसंख्यकों की बेटियों का जबरन धर्मांतरण और राजनीतिक विरोधियों के दमन—को रिकॉर्ड पर लाता है। नतीजतन, आज आलम यह है कि संयुक्त राष्ट्र में जब भी पाकिस्तान भारत के खिलाफ बोलने के लिए माइक ऑन करता है, दुनिया पहले से ही समझ जाती है कि यह एक असफल देश का नया ड्रामा भर है।