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Justice Ujjal Bhuyan: ‘वोटिंग से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी’; SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट जज का बड़ा बयान

देश भर में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम कथित तौर पर कटने को लेकर मचे राजनीतिक घमासान के बीच देश की शीर्ष अदालत से एक बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने एक विधिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए दो-टूक शब्दों में कहा है कि ऐसी कोई भी व्यवस्था या प्रशासनिक प्रक्रिया, जिसके जरिए लाखों भारतीय नागरिकों को उनके बुनियादी मताधिकार से बेदखल कर दिया जाए, वह स्वाभाविक रूप से मनमानी (Intrinsically Arbitrary) है। जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया कि किसी भी तरह की दलीलों या बहानेबाजी (Whataboutery) से सामूहिक मताधिकार छीने जाने को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनका यह बयान ऐसे नाजुक समय में आया है जब दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के विभिन्न राज्यों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और वोटर लिस्ट संशोधन को लेकर विपक्ष, नागरिक संगठन और छात्र सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

नागरिकता और मताधिकार एक-दूसरे से अविभाज्य: दोयम दर्जे का नागरिक बनाना नामुमकिन

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने संविधान के दर्शन को रेखांकित करते हुए कहा कि एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य में नागरिकता और वोट देने का अधिकार एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़े हुए हैं और उन्हें किसी भी स्थिति में अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान कभी भी देश में दो तरह के नागरिकों की परिकल्पना नहीं करता—एक वे नागरिक जिनके पास वोट डालने का अधिकार हो और दूसरे वे अभागे नागरिक जिन्हें इस लोकतांत्रिक शक्ति से महरूम कर दिया गया हो। किसी भी जीवित भारतीय नागरिक को वोटिंग के अधिकार से बाहर करना उसे व्यवहार में 'दोयम दर्जे का नागरिक' बना देने जैसा है, जिसे हमारी संवैधानिक व्यवस्था कतई स्वीकार नहीं कर सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि लिंग, नस्ल, धर्म, जाति, संपत्ति, शिक्षा या सामाजिक हैसियत के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ वोटिंग के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता, सिवाय उन बेहद सीमित और कानूनी अपवादों के जो संविधान में पूर्व-निर्धारित हैं।

अनुच्छेद 14 और 326 का सीधा उल्लंघन: संविधान से ऊपर कोई सत्ता नहीं

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने अपने संबोधन में संवैधानिक प्रावधानों की मर्यादा का हवाला देते हुए कहा कि बड़ी संख्या में नागरिकों को वोटिंग सूची से बेदखल करने वाली कोई भी मनमानी कार्रवाई सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार) का घोर उल्लंघन है। उन्होंने सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा, 'अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी स्तर पर कोई खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। देश की कोई भी अथॉरिटी या प्रशासनिक संस्था ऐसा नहीं कर सकती और न ही देश की कोई अदालत इसे कभी सही ठहरा सकती है। भारत के संविधान से ऊपर कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार नहीं है।' उन्होंने रेखांकित किया कि भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार विदेशी हुकूमत के खिलाफ भारत के दशकों लंबे आजादी के आंदोलन, अनगिनत संघर्षों और अमर बलिदानों की पावन अभिव्यक्ति है। ऐसे में किसी भी बाबूशाही या तकनीकी प्रक्रिया के नाम पर इस ऐतिहासिक अधिकार को छीना जाना लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा प्रहार है।

बिना नोटिस और सुनवाई के नाम काटना गैर-कानूनी: प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत

जस्टिस भुइयां ने चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची अद्यतन के प्रशासनिक पहलुओं पर बात करते हुए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) को सर्वोपरि बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी मौजूदा मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि उसे बाकायदा लिखित नोटिस न दिया जाए और अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर (Opportunity to be Heard) न मिले। एकमात्र अपवाद केवल वही स्थिति हो सकती है जहां मतदाता की आधिकारिक मृत्यु दर्ज हो चुकी हो। इसके अलावा किसी भी नागरिक का नाम बिना पूर्व सूचना, भौतिक सत्यापन और वैध सुनवाई के एकतरफा कलम चलाकर काटना पूरी तरह असंवैधानिक और कानून के खिलाफ है। उन्होंने संविधान सभा में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा दिए गए ऐतिहासिक भाषणों और प्रख्यात न्यायविदों के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि निष्पक्ष चुनाव ही भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की आधारशिला हैं।

देशव्यापी जन-आंदोलन और चुनाव आयोग के सामने साख की चुनौती

जस्टिस भुइयां की इस खुली और बेबाक टिप्पणी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और संपूर्ण चुनावी मशीनरी को एक बहुत बड़े नैतिक और कानूनी घेरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष के नेता और नागरिक अधिकार संगठन लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के नाम पर फर्जी तरीके से वास्तविक वोटरों के नाम काट दिए गए, जिससे करोड़ों नागरिकों का वोटिंग अधिकार दांव पर लग गया है। कई राज्यों में पूर्व न्यायाधीशों, वरिष्ठ वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के इस कदम के खिलाफ समीक्षा समितियां बनाई हैं और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। शीर्ष अदालत के एक सिटिंग जज द्वारा सार्वभौमिक मताधिकार की पवित्रता पर इतना स्पष्ट रुख जाहिर किए जाने के बाद अब चुनावी तंत्र पर अपनी प्रक्रियाओं को शत-प्रतिशत पारदर्शी बनाने, विलोपित किए गए नामों की गहन पुनर्समीक्षा करने और जवाबदेही तय करने का भारी दबाव बन गया है।

 

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