महंगे घरों की रफ्तार हुई धीमी, बिल्डरों ने मानी मिडिल क्लास की बात; 40 लाख से सस्ते मकानों की सप्लाई दोगुनी

भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर में पिछले दो वर्षों से चल रही बेतहाशा लग्जरी घरों की होड़ अब ठहरती नजर आ रही है। कोरोना महामारी के बाद बड़े बिल्डरों ने मध्यमवर्गीय खरीदारों को नजरअंदाज करते हुए केवल 1.5 करोड़ रुपये से लेकर 5 करोड़ रुपये से अधिक कीमत वाले सुपर लग्जरी और प्रीमियम अपार्टमेंट्स बनाने पर पूरा जोर लगा दिया था। लेकिन अब प्रीमियम हाउसिंग सेगमेंट में इन्वेंट्री का दबाव बढ़ने और बिक्री की रफ्तार धीमी पड़ने के बाद रियल एस्टेट डेवलपर्स को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। देश के प्रमुख प्रॉपर्टी सलाहकारों और उद्योग निकायों की ताजा बाजार रिपोर्ट के अनुसार, बिल्डरों ने एक बार फिर भारत के सबसे बड़े उपभोक्ता वर्ग यानी मिडिल क्लास की मांग को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। चालू कैलेंडर वर्ष 2026 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश के शीर्ष 7 से 8 प्रमुख महानगरों में 40 लाख रुपये से कम कीमत वाले किफायती और मिड-सेगमेंट मकानों (Affordable Housing) के नए लॉन्च और सप्लाई में सालाना आधार पर लगभग 100 फीसदी यानी दोगुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
लग्जरी हाउसिंग की चमक पड़ी फीकी और क्यों थमी बिक्री की रफ्तार
पिछले दो सालों में शेयर बाजार की तेजी और कॉरपोरेट मुनाफे के दम पर अल्ट्रा-लग्जरी सेगमेंट में जबरदस्त उछाल देखा गया था। लेकिन अब बाजार विश्लेषकों का मानना है कि प्रीमियम सेगमेंट एक 'सैचुरेशन प्वाइंट' (संतृप्ति स्तर) पर पहुंच चुका है। अत्यधिक ऊंची कीमतों, बढ़ती होम लोन ईएमआई (EMI) और निवेशकों द्वारा मुनाफावसूली के चलते 1.5 करोड़ से ऊपर के फ्लैट्स की बिक्री वृद्धि दर 25-30% से फिसलकर सिंगल डिजिट में आ गई है। बड़े शहरों में तैयार और निर्माणाधीन लग्जरी प्रोजेक्ट्स की अनसोल्ड इन्वेंट्री (बिना बिके फ्लैट्स) का ढेर लगने लगा है, जिससे डेवलपर्स की वर्किंग कैपिटल फंसने लगी थी। बिल्डरों को यह समझ आ गया है कि देश की 70 फीसदी से अधिक वास्तविक घरेलू मांग (End-User Demand) उस मध्यमवर्गीय और नौकरीपेशा तबके से आती है, जिसका कुल बजट 30 लाख से 45 लाख रुपये के बीच सिमटा हुआ है। यही वजह है कि शीर्ष डेवलपर्स ने अपने प्रोजेक्ट्स का रुख बदलते हुए अब कॉम्पैक्ट 2BHK और किफायती 1BHK यूनिट्स के बड़े पैमाने पर नए फेज लॉन्च करने शुरू कर दिए हैं।
40 लाख से सस्ते मकानों की सप्लाई में 100% का उछाल: क्या है वजह
रियल एस्टेट अनुसंधान फर्मों के आंकड़ों के मुताबिक, पिछली तिमाहियों में जहां नए कुल आवासीय लॉन्च में अफोर्डेबल हाउसिंग का हिस्सा घटकर महज 15 से 18 फीसदी रह गया था, वहीं अब यह हिस्सेदारी बढ़कर 32 से 35 फीसदी के पार पहुंच चुकी है। 40 लाख रुपये तक के घरों की सप्लाई दोगुनी होने के पीछे तीन प्रमुख कारक काम कर रहे हैं:
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सरकारी नीतियां और सब्सिडी की वापसी: केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY Urban 2.0) के तहत ब्याज सब्सिडी योजना को नए सिरे से गति देने और राज्य सरकारों द्वारा किफायती आवासों पर स्टैंप ड्यूटी व लैंड अप्रूवल नियमों को लचीला बनाने से बिल्डरों के लिए इन परियोजनाओं की लागत व्यवहार्य हो गई है।
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कॉम्पैक्ट और स्मार्ट लेआउट: डेवलपर्स ने बड़े और भारी-भरकम फ्लैट्स के बजाय 550 से 750 वर्ग फीट के सुपर-ऑप्टिमाइज्ड और स्मार्ट 2BHK डिजाइन तैयार किए हैं। इससे जमीन की कम लागत में अधिक यूनिट्स तैयार हो रही हैं, जिससे अंतिम बिक्री मूल्य सीधे 35 से 40 लाख रुपये के दायरे में फिट बैठ रहा है।
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पेरीफेरल एक्सप्रेसवे और कनेक्टिविटी का विस्तार: मेट्रो विस्तार और आउटर रिंग रोड व एक्सप्रेसवे के चालू होने से शहरों के बाहरी उपनगरों (Suburbs) में सस्ती जमीन उपलब्ध हुई है, जिससे बिल्डर्स कम लागत में पूरी आधुनिक एमिनिटीज वाले गेटेड टाउनशिप प्रोजेक्ट्स ला रहे हैं।
दिल्ली-एनसीआर से लेकर लखनऊ और मुंबई तक: किन इलाकों में नए प्रोजेक्ट्स की बाढ़
अगर क्षेत्रीय और भौगोलिक रूप से देखें, तो उत्तर भारत से लेकर पश्चिमी भारत के प्रमुख शहरों में इस बदलाव का असर साफ दिखाई दे रहा है:
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दिल्ली-एनसीआर: ग्रेटर नोएडा वेस्ट (नोएडा एक्सटेंशन), यमुना एक्सप्रेसवे के शुरुआती सेक्टर्स, गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन और सोहना रोड (गुरुग्राम एक्सटेंशन) में 30 से 40 लाख रुपये के बजट वाले नए टाउनशिप प्रोजेक्ट्स तेजी से लॉन्च किए गए हैं।
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उत्तर प्रदेश और लखनऊ: लखनऊ के किसान पथ (आउटर रिंग रोड), सुल्तानपुर रोड, मोहान रोड योजना और कानपुर रोड कॉरिडोर पर एलडीए (LDA) और निजी प्रमोटरों द्वारा मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए 30 से 45 लाख की रेंज में 2BHK अपार्टमेंट्स और रो-हाउसिंग की भारी आपूर्ति शुरू की गई है।
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मुंबई एमएमआर और पुणे: मुंबई के मीरा-भायंदर, कल्याण-डोंबिवली, नवी मुंबई के तलोजा और पनवेल में कॉम्पैक्ट होम्स की बिक्री में भारी उछाल आया है, जबकि पुणे के वाघोली, हिंजेवाड़ी फेज-3 और चाकन बेल्ट में आईटी व ऑटो कर्मचारियों के लिए बजट हाउसिंग की नई सप्लाई उतारी गई है।
पहली बार घर खरीदने वाले परिवारों के लिए ईएमआई और बजट का गणित
मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह बदलाव सबसे बड़ा वरदान साबित हो रहा है। यदि कोई परिवार 40 लाख रुपये का मकान खरीदता है और 20% यानी 8 लाख रुपये का डाउनपेमेंट खुद लगाता है, तो उसे 32 लाख रुपये का होम लोन लेना पड़ता है। 8.5% की औसत बैंक ब्याज दर पर 20 साल के लिए इसकी मासिक ईएमआई लगभग ₹27,700 बनती है। मेट्रो और सेमी-मेट्रो शहरों में जहां 2BHK का सामान्य मासिक किराया ही 18,000 से 22,000 रुपये तक पहुंच चुका है, वहां किराये में महज 5 से 8 हजार रुपये अतिरिक्त जोड़कर परिवार अपने खुद के घर का मालिक बन रहा है। प्रॉपर्टी विशेषज्ञों का कहना है कि आगामी त्योहारी सीजन और नए साल में अफोर्डेबल हाउसिंग की मांग चरम पर रहने वाली है, जिससे लंबे समय से किराए के मकानों में रह रहे लाखों मिडिल क्लास परिवारों का 'अपना घर' का सपना साकार हो सकेगा।