व्यापार

भारत-अमेरिका ट्रेड डील अंतिम दौर में: अमेरिकी फल, सोयाबीन तेल और वाइन को मिल सकती है एंट्री, डेयरी पर अड़ा पेंच

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) को लेकर कूटनीतिक और आर्थिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के पहले चरण (First Tranche) को अंतिम रूप देने की कवायद अब अपने आखिरी पड़ाव में पहुंच चुकी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा और उच्चस्तरीय वार्ताओं के बीच यह संकेत मिल रहे हैं कि दोनों वैश्विक साझेदार टैरिफ में कटौती और बाजार पहुंच को लेकर आपसी सहमति बनाने के बेहद करीब हैं। इस समझौते के तहत जहां भारत अपने कपड़ा, जेनेरिक दवाओं, ऑटो कंपोनेंट्स, मसालों और आईटी उत्पादों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर के विशाल अमेरिकी बाजार में तरजीही व शुल्क-मुक्त पहुंच चाहता है, वहीं वाशिंगटन की नजर भारतीय कृषि और उपभोक्ता बाजार पर टिकी है। हालांकि, फल, नट्स, सोयाबीन तेल और वाइन जैसी वस्तुओं पर रियायत मिलने की संभावनाओं के बावजूद भारतीय डेयरी क्षेत्र और पशुपालकों के हित अब भी इस पूरी बातचीत का सबसे संवेदनशील और पेचीदा मुद्दा बने हुए हैं।

अमेरिकी फल, नट्स और सोयाबीन तेल: भारतीय बाजार में क्या सस्ता हो सकता है?

व्यापार समझौते के मसौदे के तहत भारत चुनिंदा अमेरिकी कृषि और प्रसंस्कृत उत्पादों पर सीमा शुल्क यानी बेसिक कस्टम्स ड्यूटी में चरणबद्ध कटौती या उसे पूरी तरह समाप्त करने पर विचार कर रहा है। इसमें अमेरिका के वाशिंगटन राज्य के सेब, प्रीमियम चेरी, बादाम, अखरोट (Tree Nuts) और क्रैनबेरी जैसे फल प्रमुख हैं। इसके अलावा, अमेरिकी सोयाबीन तेल और पशु आहार के लिए प्रयुक्त होने वाले डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेंस (DDGS) के आयात नियमों को सुगम बनाने पर बातचीत चल रही है। यदि इन पर टैरिफ कम होता है, तो भारत के महानगरों और खुदरा बाजारों में प्रीमियम अमेरिकी फल और पैकेज्ड ड्राई फ्रूट्स अधिक प्रतिस्पर्धी दामों पर उपलब्ध हो सकेंगे। साथ ही, पोल्ट्री और पशु आहार उद्योग को उच्च प्रोटीन वाला चारा रियायती दरों पर मिलने की उम्मीद है, जिससे लागत नियंत्रण में मदद मिल सकती है।

प्रीमियम वाइन और स्पिरिट्स: घरेलू उद्योग की सुरक्षा के साथ न्यूनतम आयात मूल्य की शर्त

अमेरिकी कैलिफोर्निया वाइन और बोर्बोन व्हिस्की के भारतीय बाजार में प्रवेश को लेकर भी लंबे समय से बहस चल रही है। वर्तमान में भारत विदेशी शराब पर 150 प्रतिशत तक का भारी आयात शुल्क वसूलता है। प्रस्तावित व्यापार ढांचे में अमेरिकी वाइन और स्पिरिट्स पर टैरिफ को घटाने का प्रस्ताव तो शामिल है, लेकिन भारत सरकार ने इसके लिए सख्त 'न्यूनतम आयात मूल्य' (Minimum Import Price – MIP) का सुरक्षा कवच तैयार किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि टैरिफ रियायत केवल उच्च मूल्य वाली प्रीमियम वाइन और स्पिरिट्स पर ही लागू होगी। इस संतुलनकारी फॉर्मूले से भारत का उद्देश्य महाराष्ट्र के नासिक और कर्नाटक के घरेलू वाइन उत्पादकों को सस्ते विदेशी आयात की डंपिंग से बचाना है, ताकि स्थानीय शराब और स्पिरिट्स उद्योग का कारोबारी ढांचा सुरक्षित बना रहे।

डेयरी सेक्टर पर भारत का कड़ा रुख: आखिर कहां फंसा है पेंच?

भारत और अमेरिका के बीच इस ऐतिहासिक ट्रेड डील में सबसे बड़ी दीवार डेयरी उत्पाद ही बने हुए हैं। अमेरिका अपने चीज, मक्खन, स्किम्ड मिल्क पाउडर और मट्ठा (Whey) उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को पूरी तरह खोलने का दबाव बनाता रहा है। दूसरी ओर, भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि वह अपने करोड़ों छोटे और सीमांत दूध उत्पादक किसानों की आजीविका पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी।

इस गतिरोध के पीछे दो बड़े और गैर-परक्राम्य (Non-negotiable) कारण हैं:

  • सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनशीलता: भारत का सख्त नियम है कि देश में केवल उसी डेयरी उत्पाद के आयात की अनुमति दी जा सकती है, जो ऐसे दुधारू पशुओं से प्राप्त हुआ हो जिन्हें कभी रक्त का भोजन, आंतरिक अंग या जुगाली करने वाले पशुओं के मांस का आहार (Ruminant Feed / Blood Meal) न दिया गया हो। चूंकि अमेरिकी डेयरी फार्मिंग में पशुओं के चारे में ऐसे तत्वों का उपयोग आम है, इसलिए भारत इसके प्रमाणन पर पूरी तरह अड़ा हुआ है।

  • लाखों ग्रामीण परिवारों की आजीविका: भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और यह क्षेत्र अमूल, पराग, नंदिनी जैसी सहकारी समितियों और ग्रामीण महिलाओं की रीढ़ पर टिका है। सब्सिडी-आधारित विशाल अमेरिकी डेयरी कंपनियों को बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश देने से घरेलू दूध की कीमतें क्रैश हो सकती हैं, जिसका सीधा नुकसान भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ेगा। इसी कारण भारत ने डेयरी, मुख्य अनाज (गेहूं-चावल) और जीएम (GM) फसलों को अपनी सख्त 'नेगेटिव लिस्ट' में बनाए रखा है।

घरेलू किसानों और सोयाबीन उत्पादकों की चिंताएं

व्यापार समझौते की खबरों के बीच मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक के सोयाबीन किसानों और किसान संगठनों ने भी चिंताएं जाहिर की हैं। अमेरिका में सोयाबीन की खेती बड़े पैमाने पर आधुनिक मशीनों और भारी सरकारी सब्सिडी के दम पर की जाती है, जिसके चलते वहां की उत्पादन लागत काफी कम है। भारतीय किसान संगठनों का तर्क है कि यदि अमेरिकी सोयाबीन तेल या प्रसंस्कृत सोयाबीन उत्पादों को बिना पर्याप्त सुरक्षा शुल्क के बड़े पैमाने पर भारत आने दिया गया, तो स्थानीय मंडियों में तिलहन की फसल औंधे मुंह गिर सकती है। वाणिज्य मंत्रालय ने हालांकि स्पष्ट किया है कि जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) सोयाबीन के सीधे दाने के आयात की अनुमति नहीं होगी और घरेलू कीमतों की सुरक्षा के लिए रेगुलेटरी मैकेनिज्म हमेशा सक्रिय रहेगा।

वैश्विक भू-राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा समीकरण

यह व्यापार वार्ता केवल कृषि उत्पादों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक भू-राजनीति से भी जुड़े हैं। वैश्विक टैरिफ दबावों और तेल आपूर्ति के बदलते समीकरणों के बीच भारत अमेरिका से तेल, प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और उच्च तकनीक वाले डेटा सेंटर कंपोनेंट्स की खरीद बढ़ाकर व्यापार घाटे को संतुलित करने की दिशा में बढ़ रहा है। विदेश मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय के वार्ताकारों का प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत को अमेरिकी बाजार में वियतनाम, चीन या बांग्लादेश जैसे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बेहतर या समान प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिले।

आने वाले हफ्तों में मुंबई और नई दिल्ली में होने वाली द्विपक्षीय बैठकों के बाद यह तय होगा कि क्या दोनों महाशक्तियां डेयरी के पेंच को सुलझाकर या उसे अलग रखकर पहले चरण के अंतरिम समझौते (Interim Deal) पर औपचारिक मुहर लगाती हैं। भारत का संदेश पूरी तरह स्पष्ट है—व्यापारिक सहयोग का स्वागत है, लेकिन देश के अन्नदाता और पशुपालकों के हितों की बलि देकर कोई भी डील स्वीकार्य नहीं होगी।

Back to top button