यमन के रण में यूएई की नाटकीय वापसी, सऊदी अरब के साथ रचा गया नया सामरिक चक्रव्यूह

पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर से बहुत बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ आ गया है। कभी यमन संघर्ष के मैदान से अपने कदम पीछे खींचने वाले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने इस युद्ध क्षेत्र में एक बार फिर से नाटकीय और जोरदार वापसी कर ली है। लाल सागर और अदन की खाड़ी जैसे दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के लगातार बढ़ते खौफनाक हमलों और मिसाइल स्ट्राइक के बाद यूएई ने अपनी कूटनीतिक और सैन्य रणनीतियों में बड़ा बदलाव किया है। हूती विद्रोहियों के बढ़ते आतंक और वैश्विक व्यापार के सामने खड़े हुए गंभीर आर्थिक संकट को नेस्तनाबूद करने के लिए अब यूएई और सऊदी अरब ने अपने सारे पुराने मतभेदों को ताक पर रखकर एक बार फिर से आपस में हाथ मिला लिया है। दोनों खाड़ी देशों के इस नए और मजबूत सैन्य गठबंधन से यमन की उथल-पुथल भरी राजनीति और युद्ध के मैदान में एक नया समीकरण बनता हुआ साफ नजर आ रहा है।
हूती विद्रोहियों के खिलाफ दोनों देशों ने क्यों बदला अपना पुराना रुख?
कुछ साल पहले तक यूएई ने अपनी सैन्य प्राथमिकताओं को बदलते हुए यमन के मुख्य युद्ध मैदान से अपनी जमीनी सेनाओं को काफी हद तक हटा लिया था और दक्षिणी यमन के स्थानीय अलगाववादी समूहों के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखी थी। हालांकि, पिछले कुछ महीनों में हूती विद्रोहियों ने जिस आक्रामक तरीके से अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों, वाणिज्यिक जहाजों और सऊदी-यूएई के सामरिक ठिकानों को निशाना बनाना शुरू किया, उससे खाड़ी देशों की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी बज गई। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की सप्लाई चेन और सुरक्षित नौवहन को बनाए रखने के लिए अब रियाद और अबू धाबी दोनों इस बात पर पूरी तरह सहमत हो चुके हैं कि यदि हूती विद्रोहियों के खतरे को जड़ से खत्म नहीं किया गया, तो यह पूरे मध्य पूर्व की आर्थिक स्थिरता को तबाह कर देगा। इसी साझा और गंभीर खतरे ने दोनों ताकतों को एक बार फिर से युद्ध के मोर्चे पर कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने के लिए मजबूर कर दिया है।
सऊदी-यूएई के इस नए साझा रक्षा मोर्चे से बदलेंगे जमीन और समुद्र के समीकरण
सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन और यूएई के इस नए पुनर्गठन का सीधा असर यमन के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे होदेइदाह, मरिब और त्समी बंदरगाहों पर देखने को मिलने लगा है। रक्षा जानकारों का मानना है कि इस साझेदारी के तहत यूएई अपनी उन्नत नौसैनिक क्षमताओं, आधुनिक खुफिया तंत्र और सटीक ड्रोन तकनीकी का भरपूर इस्तेमाल करेगा, जबकि सऊदी अरब जमीनी मोर्चे और हवाई हमलों की कमान संभालेगा। हूती विद्रोहियों के खिलाफ इस समन्वित अभियान से न केवल यमन के अंदरूनी हिस्सों में हूती कमांड स्ट्रक्चर को बड़ा झटका लगेगा, बल्कि लाल सागर में जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित बनाने के लिए एक सुरक्षा कवच भी तैयार किया जा रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भी खाड़ी देशों के इस कदम का परोक्ष रूप से समर्थन किया है क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए लाल सागर का सुरक्षित रहना जीवन रेखा के समान है।
कूटनीतिक और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कितना अहम है यह नया गठबंधन?
यमन की यह जंग पिछले एक दशक से दुनिया के सबसे बड़े मानवीय और सामरिक संकटों में से एक रही है। ऐसे समय में जब ईरान समर्थित मिलिशिया समूह लगातार मध्य पूर्व में तनाव को और अधिक भड़का रहे हैं, सऊदी अरब और यूएई का एक मंच पर आना क्षेत्रीय शांति के लिहाज से एक गेम-चाँजर साबित हो सकता है। यदि यह नया गठबंधन हूती विद्रोहियों के सैन्य और वित्तीय नेटवर्क को कमजोर करने में कामयाब रहता है, तो इससे यमन में लंबे समय से अटकी राजनीतिक शांति प्रक्रिया को भी दोबारा पटरी पर लौटने का एक मजबूत मौका मिल जाएगा। दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों और कूटनीतिक जानकारों की निगाहें अब यमन के इन युद्ध के मैदानों पर टिकी हुई हैं, जहां खाड़ी के दो सबसे ताकतवर देशों की यह वापसी आने वाले दिनों में मध्य पूर्व के पूरे सुरक्षा ढांचे की नई इबारत लिखने जा रही है।