तेहरान में सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की संग बैठक ईरान के लिए बड़ी जीत कैसे

मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक पटल पर एक ऐसा नाटकीय और अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिला है, जिसने वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और इजराइल के खेमे में गहरी चिंता पैदा कर दी है। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और रियाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर लगातार किए जा रहे हमलों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगातार मिल रही सैन्य धमकियों के बीच, तेहरान की धरती पर एक ऐतिहासिक कूटनीतिक हलचल हुई। ईरान की राजधानी तेहरान में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के शीर्ष प्रतिनिधियों का एक साथ पहुंचना और ईरानी नेतृत्व के साथ उच्चस्तरीय मंथन करना केवल क्षेत्रीय तनाव घटाने की कोशिश नहीं, बल्कि ईरान के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक और कूटनीतिक विजय के रूप में देखा जा रहा है। पश्चिमी देशों के भारी दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने जिस तरह से अपने ही क्षेत्र के धुर विरोधियों को अपने पाले में लाकर बातचीत की टेबल पर बैठाया, उसने वाशिंगटन की दशकों पुरानी मध्य पूर्व नीति को तगड़ा झटका दिया है।
मक्का समझौते के देशों का तेहरान पहुंचना और अमेरिका के प्रभाव को चुनौती
इस पूरी कूटनीति के केंद्र में 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' है, जिसके तहत सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की आपस में जुड़े हुए हैं और इनमें से किसी एक पर हमला सभी पर हमला माना जाता है। कुछ समय पहले तक जिन देशों के बीच वैचारिक और सामरिक मोर्चे पर गहरी खाइयां थीं और जो अमेरिका के सुरक्षा छाते के नीचे मध्य पूर्व में अपनी रणनीतियां तय करते थे, आज उन्हीं देशों के शीर्ष अधिकारियों का तेहरान की यात्रा करना यह साबित करता है कि पश्चिम एशिया अब बाहरी ताकतों की बजाय खुद क्षेत्रीय स्तर पर अपने समीकरण साध रहा है। इस उच्चस्तरीय बैठक में सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और तुर्की के खुफिया प्रमुख इब्राहिम कलिन ने ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रेजाई और राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ लंबी चर्चा की। जानकारों का मानना है कि यह दृश्य अमेरिकी कूटनीति की एक स्पष्ट हार है, क्योंकि अमेरिका वर्षों से ईरान को वैश्विक स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग करने और खाड़ी देशों को उसके खिलाफ एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रहा था। इसके विपरीत, तेहरान ने इन तीनों देशों के साथ मिलकर यह संदेश दे दिया है कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा का ठेका अब पश्चिमी देशों के पास नहीं रहेगा।
हूती हमलों और अमेरिकी धमकियों के बीच ईरान का रणनीतिक दबदबा
हाल ही में अमेरिकी प्रशासन और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन के मुद्दों को लेकर खुलकर सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी थी। अमेरिकी मांग थी कि ईरान अपना संवर्धित यूरेनियम देश से बाहर करे, जिसे तेहरान ने दो टूक शब्दों में खारिज कर दिया और यहां तक चेतावनी दी कि यदि अमेरिका या उसके सहयोगियों ने कोई दुसाहस किया, तो खाड़ी के समुद्री रास्तों और इंटरनेट केबल्स को भारी नुकसान पहुंचाया जा सकता है। इन तीखे तनावों के बीच सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों ने रियाद की नींद उड़ा दी थी। सऊदी अरब और उसके साथी देश समझ चुके थे कि अमेरिका की युद्धक नीतियां और धमकियां उन्हें स्थाई सुरक्षा नहीं दे सकतीं, बल्कि इसके लिए ईरान के साथ सीधा संवाद करना ही एकमात्र विकल्प है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रेजाई ने इस बैठक के बाद स्पष्ट किया कि ईरानी सशस्त्र बलों की ताकत और देश के दृढ़ प्रतिरोध के कारण ही आज क्षेत्र के तमाम बड़े देश तेहरान के साथ मिलकर काम करने को विवश हुए हैं। यह स्थिति अमेरिका के उस दावे की हवा निकाल देती है जिसमें वह खुद को मध्य पूर्व का एकमात्र सुरक्षा प्रदाता मानता था।
वाशिंगटन की कूटनीतिक हार और बहुध्रुवीय पश्चिम एशिया का उदय
अमेरिकी विदेश नीति निर्माताओं के लिए तेहरान की यह बैठक किसी बड़े झटके से कम नहीं है। अमेरिका और इजराइल लंबे समय से यहन चाहते थे कि सुन्नी बहुल देश जैसे सऊदी अरब और तुर्की हमेशा ईरान के खिलाफ एक स्थायी मोर्चा बनाए रखें। लेकिन जब पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के प्रतिनिधि तेहरान पहुंचकर क्षेत्रीय सुरक्षा वास्तुकला को मजबूत करने और बाहरी हस्तक्षेप को रोकने की बात करते हैं, तो यह सीधे तौर पर व्हाइट हाउस और पेंटागन की नीतियों की विफलता को दर्शाता है। ईरान की यह जीत केवल सैन्य मोर्चे पर नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संवाद की उस शैली की है जहाँ उसने अमेरिका की मध्यस्थता या उसकी धमकियों को दरकिनार कर अपने पड़ोसियों के साथ सीधे तौर पर टेबल शेयर की है। फिलिस्तीन, लेबनान और यमन के संकटों के बीच क्षेत्रीय शक्तियों का यह गठजोड़ आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति की दशा और दिशा दोनों तय करेगा। स्पष्ट है कि अमेरिका अब पश्चिम एशिया में अपने घटते प्रभाव और सहयोगियों के स्वतंत्र होते रुख को रोकने में पूरी तरह बेबस नजर आ रहा है, जो अमेरिकी आधिपत्य के पतन की एक और बड़ी दास्तान लिख रहा है।