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पुराने आम-लीची के बागों में लौटेगी बहार, जीर्णोद्धार पर 40% सब्सिडी

देश के पारंपरिक फल उत्पादक राज्यों में दशकों पुराने आम और लीची के बागान कभी किसानों की समृद्धि का मुख्य आधार हुआ करते थे। लेकिन 30 से 40 वर्ष या उससे अधिक पुराने हो चुके इन पेड़ों में अब उम्र का असर साफ दिखने लगा है। तनों का खोखला होना, शाखाओं का आपस में उलझना, सूरज की धूप जमीन तक न पहुंचना और कीट-व्याधियों के बढ़ते प्रकोप के कारण इन पेड़ों की फल उत्पादन क्षमता 50 से 70 प्रतिशत तक घट चुकी है। घटते उत्पादन और गिरती गुणवत्ता से परेशान होकर कई किसान अपने पुरखों के इन ऐतिहासिक बागों को काटने या कंक्रीट के प्लाटों में बदलने को मजबूर हो रहे थे। बागवानों की इसी गंभीर समस्या को हल करने और फल उत्पादन को फिर से रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचाने के लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) और राज्य बागवानी विभागों के सहयोग से 'जीर्णोद्धार एवं वितान प्रबंधन योजना' (Orchard Rejuvenation Scheme) के तहत 40 से 50 प्रतिशत तक की सीधी वित्तीय सहायता (सब्सिडी) देने का फैसला किया है।

क्या है रीजुविनेशन और कैनोपी मैनेजमेंट तकनीक?

अक्सर किसान यह सोचते हैं कि अनुत्पादक हो चुके पुराने पेड़ को काटकर उसकी जगह नया पौधा लगाना ही एकमात्र उपाय है। लेकिन नए पौधे को फल देने लायक पेड़ बनने में कम से कम 8 से 10 साल का लंबा इंतजार करना पड़ता है। इसके विपरीत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (CISH, लखनऊ) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई 'कैनोपी रीजुविनेशन' (छत्रक प्रबंधन) तकनीक से पुराने पेड़ को बिना उखाड़े महज 2 साल में फिर से भरपूर फल देने लायक बना दिया जाता है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया में पुराने पेड़ के मुख्य तने से 2.5 से 3 मीटर की ऊंचाई पर मुख्य शाखाओं की सुनियोजित प्रूनिंग (छंटाई या पोलार्डिंग) की जाती है। कटे हुए हिस्सों पर तुरंत बोर्डो पेस्ट या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप लगाकर फंगस से सुरक्षा दी जाती है। कुछ ही महीनों में तने से मजबूत और नई शाखाएं फूटती हैं, जिनकी ट्रेनिंग कर एक संतुलित छत्रक (छतरीनुमा आकार) तैयार किया जाता है। इससे पेड़ के भीतरी हिस्से तक भरपूर धूप और ताजी हवा पहुंचती है, जिससे फलों का आकार, मिठास और रंग पहले से कहीं बेहतर हो जाता है।

40% से 50% तक सब्सिडी का वित्तीय ढांचा: प्रति हेक्टेयर कितनी मिलेगी मदद?

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार, फलदार वृक्षों के जीर्णोद्धार के लिए प्रति हेक्टेयर लागत का एक मानक पैमाना तय किया गया है। पुराने बाग के पुनरुद्धार पर आने वाले कुल खर्च (कटाई-छंटाई, जैविक खाद, दवाइयां, माइक्रो-इरिगेशन और ड्रिप लाइन) पर सामान्य वर्ग के किसानों को 40% और लघु, सीमांत, महिला व अनुसूचित जाति/जनजाति के किसानों को 50% तक का बैक-एंडेड प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) अनुदान दिया जाता है।

  • यूनिट कॉस्ट: सरकार द्वारा प्रति हेक्टेयर जीर्णोद्धार की मानक लागत लगभग ₹40,000 से ₹50,000 निर्धारित की गई है।

  • सब्सिडी राशि: इसके तहत पात्र बागवानों को ₹16,000 से लेकर ₹20,000 प्रति हेक्टेयर की सीधी वित्तीय सहायता सीधे उनके आधार से जुड़े बैंक खाते में दी जाती है।

  • अतिरिक्त इनपुट सहायता: सब्सिडी के साथ-साथ बागवानी विभाग चयनित किसानों को सघन पौधरोपण (Gap Filling) के लिए उन्नत कलमी पौधे, ट्राइकोडर्मा, वर्मीकम्पोस्ट और कीटनाशक छिड़काव यंत्र भी रियायती दरों पर उपलब्ध कराता है।

मध्यवर्ती खेती (इंटरक्रॉपिंग) से शुरुआती 2 साल में भी होगी लाखों की कमाई

पुराने पेड़ों की गहरी छंटाई के बाद शुरुआती डेढ़ से दो साल तक जब नई शाखाएं विकसित हो रही होती हैं, तब बाग के भीतर जमीन पर खुली धूप उपलब्ध रहती है। इस खाली पड़ी जमीन का सदुपयोग करने के लिए कृषि वैज्ञानिक किसानों को अंतःवर्ती फसलें (Intercropping) लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। पेड़ की छंटाई के तुरंत बाद किसान बाग की पंक्तियों के बीच हल्दी, अदरक, अरबी, मटर, फ्रेंच बीन्स, कद्दू वर्गीय सब्जियां या औषधीय पौधे उगा सकते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, आम और लीची के जीर्णोद्धार किए गए बागों में हल्दी या अदरक की अंतःवर्ती खेती करने से किसानों को पहले ही साल प्रति हेक्टेयर 80,000 से 1.20 लाख रुपये की अतिरिक्त शुद्ध आय प्राप्त हो जाती है। जब तक पेड़ों में दोबारा बंपर बौर (मंजर) और फल आने शुरू होते हैं, तब तक किसान का नियमित घरेलू खर्च और बाग की देखरेख की लागत इंटरक्रॉपिंग से आसानी से निकल आती है।

प्रमुख आम और लीची बेल्ट्स को सीधा फायदा

इस पुनरुद्धार अभियान का सबसे बड़ा लाभ देश के प्रमुख फल उत्पादक क्षेत्रों को मिलेगा।

  • आम उत्पादक बेल्ट: उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध मलिहाबाद (दशहरी), सहारनपुर, बुलंदशहर, बाराबंकी बेल्ट; बिहार का भागलपुर (जर्दालु), दरभंगा; पश्चिम बंगाल का मालदा (हिमसागर, लंगड़ा); और आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के बंगनपल्ली व तोतापरी बागानों के लाखों किसानों को इस योजना से सीधा संबल मिलेगा।

  • लीची उत्पादक क्षेत्र: बिहार के मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, वैशाली (शाही लीची) और उत्तराखंड के देहरादून व रामनगर की विश्वप्रसिद्ध लीची के पुराने बगीचों में इस तकनीक से फलों के फटने (Fruit Cracking) और कीटों की समस्या में 60% तक की कमी दर्ज की गई है।

आवेदन कैसे करें: जरूरी दस्तावेज और प्रक्रिया

बागवानी जीर्णोद्धार सब्सिडी का लाभ उठाने के लिए किसानों को अपने राज्य के बागवानी विभाग के आधिकारिक पोर्टल (जैसे यूपी में dbt.uphorticulture.in या बिहार में horticulture.bihar.gov.in) पर ऑनलाइन पंजीकरण करना होता है। इसके अलावा किसान अपने ब्लॉक या जनपद स्तर पर स्थित उप निदेशक / जिला उद्यान अधिकारी (DHO) कार्यालय में जाकर भी ऑफलाइन आवेदन जमा कर सकते हैं। आवेदन के लिए किसान की खतौनी/जमाबंदी (भूमि अभिलेख), आधार कार्ड, बैंक पासबुक की प्रति, पासपोर्ट साइज फोटो और बाग में पुराने पेड़ों की मौजूदा स्थिति का स्थलीय विवरण जरूरी होता है। उद्यान विभाग के तकनीकी अधिकारी बाग का भौतिक सत्यापन (Geotagging Survey) करते हैं, जिसके बाद स्वीकृति पत्र जारी होता है। कार्य पूरा होने के बाद सत्यापन उपरांत सब्सिडी की राशि सीधे किसान के बैंक खाते में भेज दी जाती है। पुरखों की धरोहर रहे इन बागों को आधुनिक विज्ञान और सरकारी सहायता से संवारकर किसान अपनी वार्षिक आय में 2 से 3 गुना तक टिकाऊ इजाफा कर सकते हैं।

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