सोनिया और प्रियंका गांधी ने ताजा कीं राजीव गांधी संग दीवाली की यादें: चांदनी चौक के पटाखे

देश के सबसे प्रमुख राजनीतिक परिवारों में शुमार गांधी परिवार ने दीपावली के पावन पर्व के अवसर पर अपनी निजी और पारिवारिक स्मृतियों के पन्ने खोले हैं। कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक बेहद आत्मीय और अनौपचारिक बातचीत के जरिए पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के साथ बिताए गए दीवाली के सुनहरे पलों को साझा किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर जारी किए गए इस विशेष संवाद में सोनिया और प्रियंका ने पुरानी दिल्ली की गलियों से लेकर अपने घर के आंगन तक में मनाए जाने वाले पारंपरिक उत्सव के रंगों को याद किया। यह बातचीत केवल एक त्योहार के उत्सव की औपचारिकता नहीं है, बल्कि उस दौर के सहज, सादगीपूर्ण और प्रेम से भरे पारिवारिक जीवन की एक दुर्लभ झलक प्रस्तुत करती है, जिसे राजनीति की चकाचौंध से दूर एक परिवार ने अपने आशियाने में संजोया था।
दीवाली के पावन वातावरण में मां-बेटी के बीच हुई इस दिलकश बातचीत में उन दिनों की यादें जीवंत हो उठीं जब रोशनी का यह महापर्व बिना किसी आधुनिक दिखावे के मनाया जाता था। सोनिया गांधी ने बड़े भावुक अंदाज में बताया कि उन्हें दीवाली का त्योहार हमेशा से बेहद प्रिय रहा है। भारत आने के बाद जब उन्होंने पहली बार इस रोशनी के पर्व को करीब से देखा और महसूस किया, तो वे इसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वरूप से मंत्रमुग्ध हो गई थीं। उन्होंने बताया कि उस जमाने में त्योहारों का मतलब केवल आतिशबाजी या शोरगुल नहीं होता था, बल्कि परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ बैठना, पारंपरिक नियमों का पालन करना और घर के हर कोने को अपनी आस्था व मेहनत से रोशन करना था।
मुख्य द्वार पर प्रथम पूज्य गणेश जी की स्थापना और मिट्टी के दीयों से जगमगाता घर-आंगन
पारंपरिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों का जिक्र करते हुए सोनिया गांधी ने बताया कि उनके घर में दीवाली पूजन का नियम बहुत स्पष्ट और अटूट था। त्योहार की शाम को सबसे पहले घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर भगवान श्री गणेश की एक विशेष और मांगलिक मूर्ति श्रद्धापूर्वक स्थापित की जाती थी। पूरे उत्सव और पूजन का सबसे पहला मिट्टी का दीपक भगवान गणेश के चरणों में ही प्रज्वलित किया जाता था। सोनिया गांधी ने बेहद आत्मीयता से खुलासा किया कि वह ऐतिहासिक और पूजनीय मूर्ति केवल एक बार उपयोग के लिए नहीं थी, बल्कि उसे हर वर्ष संजोकर रखा जाता था और वह पावन विग्रह आज भी उनके पास पूरी तरह सुरक्षित है, जिसे वे हर दीवाली पर उसी आस्था के साथ स्थापित करती हैं।
उस दौर की सादगी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि आज की तरह तब घरों पर लटकने वाली रंग-बिरंगी बिजली की छोटी-छोटी लड़ियों या चाइनीज झालरों का चलन नहीं था। पूरा घर केवल और केवल पारंपरिक मिट्टी के दीयों की शुद्ध रोशनी से जगमगाता था। घर के सामने बने पानी के तालाब के चारों ओर, लंबी छतों पर, खुले बरामदों में और बगीचे के हर छोटे-बड़े रास्ते पर कतारबद्ध होकर सैकड़ों दीये रखे जाते थे। हवा के मंद झोंकों के बीच टिमटिमाती उन दीयों की प्राकृतिक लौ पूरी रात एक अद्भुत, शांत और अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करती थी, जिसकी तुलना आज के किसी भी आधुनिक प्रकाश उपकरण से नहीं की जा सकती।
चांदनी चौक की गलियों से पटाखे लाते थे राजीव गांधी, बगीचे में जुटता था पूरा परिवार
प्रियंका गांधी ने बातचीत के दौरान अपने बचपन के उन खूबसूरत दिनों को याद किया जब उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी खुद बच्चों के साथ त्योहार की खुशियों में पूरी तरह रम जाते थे। प्रियंका ने बताया कि दीवाली से कुछ दिन पहले उनके पिता उन्हें और राहुल गांधी को पटाखे और आतिशबाजी की खरीदारी कराने के लिए पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक और भीड़भाड़ वाले इलाके चांदनी चौक ले जाया करते थे। चांदनी चौक की तंग गलियों में सजी दीवाली की दुकानों की रौनक, वहां मिलने वाले तरह-तरह के पटाखे और उस माहौल में पिता की उंगली पकड़कर चलने का रोमांच आज भी उनके जेहन में एकदम ताजा है।
प्रियंका गांधी ने यह भी साझा किया कि त्योहार के दिन केवल उनका अपना परिवार ही नहीं होता था, बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों से आए लोग, परिचित और सुरक्षाकर्मी उनके परिवार के बड़े बगीचे में एकत्र होते थे। पूरा माहौल एक विशाल उत्सव जैसा बन जाता था जहां हर कोई एक-दूसरे को गले मिलकर बधाई देता था। इस पर सोनिया गांधी ने मुस्कुराते हुए जोड़ा कि उन्हें कभी भी कान फोड़ देने वाले या तेज आवाज वाले बम-पटाखों में दिलचस्पी नहीं रही। उनकी सबसे पसंदीदा चीज हमेशा से सुंदर रोशनी बिखेरने वाली फुलझड़ियां थीं, जिन्हें वे बच्चों के साथ बड़े चाव से जलाया करती थीं। उन्होंने उस जमाने के साफ-सुथरे वातावरण, प्रदूषण रहित हवा और दीवाली के समय दिल्ली के आसमान के उस गहरे नीले रंग को भी याद किया जो अब आधुनिक महानगरों में दुर्लभ हो चुका है।
कश्मीरी पकवानों और पारंपरिक मीठे चावल की महक, आज भी कायम है खान-पान की ऐतिहासिक रवायत
त्योहारों में भोजन और पारंपरिक व्यंजनों का अपना एक विशेष महत्व होता है। गांधी परिवार की पाक-कला और खान-पान की रवायतों पर प्रकाश डालते हुए सोनिया गांधी ने बताया कि दीवाली की दावत उनके घर में हमेशा खास होती थी। चूंकि नेहरू-गांधी परिवार की जड़ें कश्मीर से जुड़ी रही हैं, इसलिए दीवाली के खास मौके पर घर के रसोईघर में विशुद्ध पारंपरिक कश्मीरी व्यंजन तैयार किए जाते थे। विशेष मसालों, केसर और सूखे मेवों से युक्त इन व्यंजनों की खुशबू पूरे घर में महकती थी।
इसके अलावा दीवाली पूजन के उपरांत पारंपरिक रूप से मीठे चावल (केसरिया भात) बनाए जाते थे, जिसका भोग सबसे पहले भगवान को लगाया जाता था और फिर परिवार व आए हुए अतिथियों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता था। सोनिया गांधी ने गर्व के साथ बताया कि आधुनिकता के इस दौर में भी उनके परिवार ने अपनी उस पुरानी विरासत और खान-पान की रवायत को नहीं बदला है। आज भी हर दीवाली पर वही पारंपरिक कश्मीरी पकवान और सुगंधित मीठे चावल उसी विधि और प्यार से बनाए जाते हैं, जो परिवार की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती से जोड़े रखने का काम करते हैं।
10 नवंबर को रिलीज हो रही सोनिया गांधी की आत्मकथा 'बिलोंगिंग: अ जर्नी ऑफ लव'
सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी के बीच यह आत्मीय और भावुक बातचीत एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर सामने आई है। सोनिया गांधी का बहुप्रतीक्षित संस्मरण और आत्मकथा 'बिलोंगिंग: अ जर्नी ऑफ लव' (Belonging: A Journey of Love) 10 नवंबर को औपचारिक रूप से प्रकाशित होने जा रही है। प्रतिष्ठित पब्लिशिंग हाउस हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा लाई जा रही इस किताब को लेकर देश और दुनिया के राजनीतिक गलियारों में पहले से ही जबर्दस्त उत्सुकता बनी हुई है।
इस किताब में सोनिया गांधी ने अपने निजी जीवन के उन अनछुए और संवेदनशील पलों को कलमबद्ध किया है, जो अब तक आम जनता और मीडिया की नजरों से ओझल रहे हैं। इटली के छोटे से कस्बे से निकलकर भारत की बहू बनने तक का सफर, इंदिरा गांधी का मातृत्व भरा सानिध्य, राजीव गांधी के साथ बिताए सुख-दुख के वर्ष, राष्ट्रीय त्रासदियों के बाद भारतीय राजनीति के केंद्र में उनका उभार और देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर उनके दृष्टिकोण का इसमें विस्तृत उल्लेख है। किताब के विमोचन से ठीक पहले साझा किए गए इस दीवाली संस्मरण ने पाठकों और प्रशंसकों को सोनिया गांधी के उस भावनात्मक और घरेलू पक्ष से रूबरू कराया है जो आमतौर पर राजनीतिक बयानों के पीछे छिपा रहता है।