Ujjain Mahakal : क्यों भस्म आरती के समय महिलाओं को करना पड़ता है घूंघट? जानें उज्जैन महाकाल मंदि की ये परंपरा

News India Live, Digital Desk: विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन अपनी प्राचीन परंपराओं और रहस्यों के लिए जानी जाती है। यहाँ होने वाली ‘भस्म आरती’ (Bhasma Aarti) को देखने के लिए देश-दुनिया से श्रद्धालु उमड़ते हैं। लेकिन इस आरती से जुड़ा एक ऐसा नियम है जो अक्सर चर्चा का विषय रहता है— आरती के एक खास समय पर महिलाओं को अपने मुख पर घूंघट करना पड़ता है या अपनी आंखें बंद करनी पड़ती हैं। आखिर इसके पीछे का धार्मिक और पौराणिक तर्क क्या है? आइए विस्तार से जानते हैं।आरती के दौरान घूंघट की अनिवार्य परंपरामहाकाल मंदिर के नियमों के अनुसार, भस्म आरती के दौरान जब भगवान महाकाल को भस्म चढ़ाई जाती है, उस समय महिलाओं को भगवान के दर्शन करने की अनुमति नहीं होती। इस विशेष प्रक्रिया के दौरान महिलाएं अपने चेहरे को साड़ी के पल्लू या दुपट्टे से ढंक लेती हैं। मान्यता है कि भस्म लेपन के समय बाबा महाकाल अपने निराकार स्वरूप में होते हैं, जिसे देखना महिलाओं के लिए वर्जित माना गया है।भगवान महाकाल का ‘दिगंबर’ स्वरूपपौराणिक मान्यताओं और मंदिर के पुजारियों के अनुसार, भस्म आरती के समय भगवान महाकाल ‘दिगंबर’ स्वरूप में होते हैं। दिगंबर का अर्थ है वह जो बिना वस्त्रों के हो और जिसकी दिशाएं ही वस्त्र हों। हिंदू शास्त्रों में महिलाओं के लिए किसी पुरुष (चाहे वे साक्षात शिव ही क्यों न हों) के दिगंबर स्वरूप को देखना वर्जित बताया गया है। इसी मर्यादा और सम्मान को बनाए रखने के लिए सदियों से यह परंपरा चली आ रही है।भस्म आरती और तांत्रिक महत्वउज्जैन का महाकाल मंदिर एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जहाँ श्मशान की भस्म से आरती की परंपरा रही है (वर्तमान में यह कपिला गाय के गोबर से बने उपलों की भस्म होती है)। भस्म आरती एक तांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा मानी जाती है। कहा जाता है कि आरती के दौरान ऊर्जा का स्तर बहुत अधिक होता है। भस्म लेपन के उस विशिष्ट क्षण में महादेव पूर्णतः वैराग्य की अवस्था में होते हैं, इसलिए मर्यादा के नाते महिलाएं उस समय घूंघट करती हैं।ड्रेस कोड का भी रखना होता है ध्यानकेवल घूंघट ही नहीं, भस्म आरती में शामिल होने के लिए पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए विशेष ड्रेस कोड निर्धारित है। पुरुषों को अनिवार्य रूप से ‘धोती’ और सोला पहनना पड़ता है, जबकि महिलाओं को ‘साड़ी’ पहनना आवश्यक है। बिना साड़ी पहने महिलाओं को नंदी हॉल या गर्भगृह के पास प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती। आरती पूर्ण होने और भगवान का श्रृंगार होने के बाद महिलाएं पुनः दर्शन कर सकती हैं।भक्ति और मर्यादा का संगममहाकाल की यह परंपरा किसी भेदभाव का प्रतीक नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और मर्यादा का हिस्सा है। मंदिर प्रशासन और श्रद्धालुओं का मानना है कि इन नियमों का पालन करने से ही पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। बाबा महाकाल के निराकार से साकार रूप में आने तक का यह सफर हर भक्त के लिए श्रद्धा और रोमांच से भरा होता है।