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Samudra Manthan Scheme: समुद्र में एक कुआं खोदने पर ₹650 करोड़ क्यों खर्च कर रही है सरकार?

नई दिल्ली: भारत अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत कच्चा तेल (Crude Oil) विदेशों से आयात करता है, जिस पर हर साल करीब ₹13 लाख करोड़ से अधिक की भारी-भरकम विदेशी मुद्रा खर्च होती है। वैश्विक भू-राजनीतिक संकट (जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य या मध्य पूर्व तनाव) के दौरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर लगातार खतरा मंडराता रहता है।

इसी आयात निर्भरता को कम करने और देश के छिपे हुए समुद्री ऊर्जा खजाने को बाहर निकालने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹84,084 करोड़ की 'समुद्र मंथन' (National Offshore Exploration Scheme) योजना को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत अगले 5 वर्षों (2031 तक) में गहरे (Deep-sea) और अत्यधिक गहरे समुद्र (Ultra-deepwater) में 60 खोजपूर्ण कुओं (Exploration Wells) की ड्रिलिंग की जाएगी।

एक कुएं की ड्रिलिंग पर ₹650 करोड़ क्यों खर्च कर रही है सरकार?

गहरे समुद्र में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज करना दुनिया के सबसे जटिल, महंगे और जोखिम भरे कार्यों में से एक माना जाता है।

  1. अत्यधिक वित्तीय जोखिम (Financial Risk): 1,500 मीटर से अधिक गहरे पानी (Ultra-deepwater) में एक कुआं खोदने की लागत ₹950 करोड़ से ₹2,400 करोड़ तक आती है। सबसे बड़ा जोखिम यह होता है कि कुआं खोदने के बाद भी तेल या गैस मिलने की 100% गारंटी नहीं होती।

  2. निजी कंपनियों की हिचकिचाहट: भारी वित्तीय घाटे के डर से निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत के अनछुए समुद्री क्षेत्रों में नए कुएं खोदने से बचती रही हैं। वे केवल पहले से खोजे गए कुओं से ही उत्पादन निकालने पर ध्यान देती हैं।

  3. सरकार का 50% रिस्क फंड (Risk Sharing): कंपनियों को इस खोज के लिए आकर्षित करने के लिए सरकार ने तय किया है कि वह सीधे बजट से हर कुएं की कुल लागत का 50% या अधिकतम ₹650 करोड़ (जो भी कम हो) खुद वहन करेगी। बजट से जोखिम वाली खोजों के लिए पैसा देने वाला भारत दुनिया का संभवतः पहला देश बन गया है।

₹84,084 करोड़ का बजट कहां-कहां होगा खर्च?

योजना का कुल बजट तीन प्रमुख हिस्सों में विभाजित किया गया है:

  • ₹43,200 करोड़ (ड्रिलिंग फंड): अगले 5 सालों में 60 गहरे समुद्री कुओं की खोज और ड्रिलिंग का आधा खर्च उठाने के लिए।

  • ₹28,534 करोड़ (डेटा एक्यूजिशन): समुद्र के नीचे भूवैज्ञानिक अध्ययन (Offshore Seismic Data) जुटाने और संभावित तेल-गैस भंडारों की मैपिंग करने के लिए।

  • ₹10,000 करोड़ (कॉमन हब इंफ्रास्ट्रक्चर): समंदर के नीचे पाइपलाइन, प्रोसेसिंग यूनिट और गैस-तेल को किनारे तक लाने की साझा व्यवस्था विकसित करने के लिए।

'समुद्र मंथन' से भारत को क्या होगा फायदा?

  • विदेशी मुद्रा की भारी बचत: यदि यह योजना सफल रहती है, तो भारत के तेल और गैस भंडार में 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक तेल के बराबर भंडार जुड़ने की उम्मीद है।

  • ऊर्जा सुरक्षा मजबूत: घरेलू उत्पादन में 10-15 मिलियन टन वार्षिक वृद्धि से भारत की अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल के झटकों और मूल्य वृद्धि से सुरक्षा होगी।

  • अंतर्राष्ट्रीय निवेश: शेवरॉन, एक्सॉनमोबिल जैसी वैश्विक दिग्गज पेट्रोलियम कंपनियां भारत के समुद्री तटों (जैसे अरब सागर, केजी बेसिन, अंडमान-निकोबार क्षेत्र) में निवेश करेंगी।

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