भगवान राम की जल समाधि जब सरयू में विलीन हुए मर्यादा पुरुषोत्तम, भावुक कर देगी राम-लक्ष्मण के देह त्याग की यह कथा

News India Live, Digital Desk: भगवान श्री राम का जीवन न केवल आदर्शों की पराकाष्ठा है, बल्कि उनका पृथ्वी से प्रस्थान भी अत्यंत गरिमामयी और विस्मयकारी था। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब प्रभु राम के पृथ्वी पर अवतार का उद्देश्य पूर्ण हो गया, तब उन्होंने सरयू नदी में जल समाधि लेकर अपने मानवीय शरीर का त्याग किया था। यह कथा आज भी भक्तों के हृदय को करुणा और भक्ति से भर देती है। भगवान राम के साथ-साथ लक्ष्मण जी के देह त्याग की घटना भी उतनी ही मर्मस्पर्शी है, जो काल और धर्म के अटूट बंधन को दर्शाती है।काल का आगमन और लक्ष्मण का कठिन निर्णयकथा के अनुसार, जब भगवान राम का समय निकट आया, तो ‘काल’ स्वयं एक ऋषि के वेश में उनसे मिलने अयोध्या पहुंचे। काल ने प्रभु के सामने एक शर्त रखी कि उनकी चर्चा के दौरान कोई भी कक्ष में प्रवेश नहीं करेगा, और यदि कोई ऐसा करता है, तो उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। भगवान राम ने लक्ष्मण जी को द्वारपाल नियुक्त किया। तभी ऋषि दुर्वासा वहां पहुंचे और तुरंत राम जी से मिलने की जिद करने लगे। क्रोधित दुर्वासा के शाप से अयोध्या को बचाने के लिए लक्ष्मण जी ने स्वयं के प्राणों की आहुति देना स्वीकार किया और कक्ष में प्रवेश कर गए।सरयू तट पर लक्ष्मण जी का प्रस्थानवचन के अनुसार, लक्ष्मण जी को मृत्युदंड देना था, लेकिन राम जी अपने भाई को प्राणदंड नहीं दे सकते थे। तब गुरु वशिष्ठ के सुझाव पर लक्ष्मण जी ने त्याग का मार्ग चुना, जो मृत्यु के समान ही था। लक्ष्मण जी सरयू नदी के तट पर पहुंचे और वहां योग क्रिया के माध्यम से अपने शरीर का त्याग कर दिया। मान्यता है कि लक्ष्मण जी शेषनाग के अवतार थे, इसलिए देह त्यागते ही वे अपने वास्तविक स्वरूप में विलीन हो गए। भाई के विछोह ने प्रभु राम को भी व्याकुल कर दिया।श्री राम की जल समाधि और वैकुंठ गमनलक्ष्मण जी के जाने के बाद भगवान राम ने भी अपना अवतार काल समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपना राजपाट अपने पुत्रों, लव और कुश को सौंप दिया। इसके बाद, प्रभु राम ने अयोध्या की जनता और अपने प्रिय भक्तों के साथ सरयू नदी की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने शांत चित्त से सरयू की जलधारा में प्रवेश किया। जैसे ही वे जल में विलीन हुए, आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी और प्रभु अपने चतुर्भुज विष्णु स्वरूप में प्रकट होकर पुनः वैकुंठ धाम को प्रस्थान कर गए।अयोध्या और सरयू का पावन महत्वइस पौराणिक घटना के कारण ही अयोध्या और सरयू नदी का महत्व हिंदू धर्म में अत्यंत ऊंचा है। माना जाता है कि सरयू आज भी उस महान क्षण की साक्षी है जब साक्षात ईश्वर ने मानवीय लीला को विराम दिया था। इस कथा का श्रवण करने मात्र से मनुष्य को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। राम और लक्ष्मण का यह त्याग सिखाता है कि धर्म और वचन की रक्षा के लिए स्वयं का मोह त्यागना ही सबसे बड़ा पुण्य है।