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कपिल सिब्बल का तंज: क्या चुनाव आयोग पीएम से पूछ रहा ‘SIR हम वही करेंगे जो आप चाहेंगे

देश में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण अभियान यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सिब्बल ने कड़े लहजे में कहा कि इस पूरी प्रक्रिया के जरिए बड़े पैमाने पर देश के वैध नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत पर बहुत बड़ा आघात है। उन्होंने आयोग के कामकाज पर व्यंग्य करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे संवैधानिक संस्थाएं पूरी तरह से एक राजनीतिक इशारे पर काम कर रही हैं।

'SIR' शब्द का फुल फॉर्म और प्रधानमंत्री पर निशाना

केरल के कोच्चि में आयोजित एक विधिक कार्यक्रम के दौरान सवालों का जवाब देते हुए कपिल सिब्बल ने 'SIR' शब्द की एक नई राजनीतिक परिभाषा गढ़ी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज के दौर में 'SIR' का वास्तविक मतलब है – "सर (SIR), आप जैसा कहेंगे हम बिल्कुल वही करेंगे"। यहां उनका सीधा इशारा भारत के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी दल की तरफ था। सिब्बल का आरोप है कि चुनाव आयोग अब एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय की तरह काम करने के बजाय केवल सत्ता पक्ष के निर्देशों का पालन कर रहा है और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की आड़ में आम मतदाताओं के अधिकारों का हनन किया जा रहा है।

खुद की बहन, जजों और सैनिकों के नाम घटने का सनसनीखेज दावा

कपिल सिब्बल ने इस मामले में बेहद चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि उनकी अपनी सगी बहन का नाम भी बिना किसी ठोस वजह के वोटर लिस्ट से काट दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह कोई अकेला या इक्का-दुक्का मामला नहीं है, बल्कि विदेश सेवा में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनयिकों, सेवारत सेना के जवानों और यहां तक कि पूर्व जजों के नाम भी मतदाता सूची से नदारद पाए गए हैं। सिब्बल ने बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) के अधिकारों पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक स्कूल टीचर को यह अधिकार दे दिया गया है कि वह किसी भी नागरिक के नाम के आगे बिना किसी आधार के 'D' यानी डाउटफुल (संदिग्ध) लिख दे और उसका वोट देने का अधिकार छीन ले।

बीएलओ (BLO) की प्रक्रिया और संदिग्ध मतदाताओं का जमीनी सच

वरिष्ठ वकील ने प्रक्रियात्मक खामियों को उजागर करते हुए कहा कि 1950 के बाद से कभी भी भारतीय नागरिकों को अपनी नागरिकता और मताधिकार साबित करने के लिए इस तरह की जटिल प्रक्रियाओं से नहीं गुजरना पड़ा था। किसी भी मतदाता को 'संदिग्ध' घोषित करने से पहले न तो कोई नोटिस दिया जाता है और न ही उन्हें इसका कारण बताया जाता है। जब लोगों के नाम कट जाते हैं, तो उन्हें दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म भरना पड़ता है। भारत की सामाजिक स्थिति ऐसी है कि गरीब, वंचित और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोग प्रशासनिक झंझटों और उत्पीड़न के डर से दोबारा फॉर्म भरने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते।

विशेष समुदायों को निशाना बनाने के आरोप और न्यायपालिका की भूमिका

कपिल सिब्बल ने यह आरोप भी लगाया कि मतदाता सूची पुनरीक्षण की इस प्रक्रिया के जरिए समाज के विशेष वर्गों और समुदायों को निशाना बनाकर उनके नाम बड़े पैमाने पर हटाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हर आम नागरिक सुप्रीम कोर्ट जाकर अपने मताधिकार की रक्षा की गुहार नहीं लगा सकता क्योंकि उनके पास इसके लिए कानूनी साधन और संसाधन उपलब्ध नहीं होते। उन्होंने पूरी प्रक्रिया को "दूषित" करार देते हुए कहा कि जब तक इस तरह की अनियमितताओं पर तुरंत रोक नहीं लगाई जाएगी, तब तक देश में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पारदर्शी बना रहना बेहद मुश्किल होगा।

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