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‘कॉकरोच’ से दूरी, फिर छात्र आंदोलन के केंद्र में कैसे आ गई कांग्रेस? बैकफुट पर आई सरकार, पीएम आवास के बाहर हंगामा

राजनीति में समय और रणनीति का खेल सबसे बड़ा माना जाता है। किस वक्त कौन सा दांव चलना है, पूरी सियासत इसी पर टिकी होती है। नीट (NEET) पेपर लीक और छात्र आक्रोश के मुद्दे को जिस समय और आक्रामक अंदाज में कांग्रेस ने अपने हाथों में लिया है, उसने केंद्र की बीजेपी सरकार को रक्षात्मक (Backfoot) मुद्रा में ला खड़ा किया है। शुरुआत में भले ही कांग्रेस कुछ मंचों से दूरी बनाती नजर आई हो, लेकिन अब पार्टी इस देशव्यापी छात्र आंदोलन के मुख्य केंद्र के रूप में उभर चुकी है।

शुरुआत में आंदोलन से बनाई थी दूरी, अब संभाली कमान नीट पेपर लीक का मामला सामने आने के बाद कांग्रेस ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन की रूपरेखा तैयार की और 'छात्रों की गूंज' जैसे कार्यक्रम शुरू किए। हालांकि, शुरुआती दौर में पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के जंतर-मंतर वाले आंदोलन से दूरी बनाए हुए थी। पार्टी के भीतर एक बड़े तबके का मानना था कि वह विरोध प्रदर्शन प्रायोजित हो सकता है। यही वजह थी कि CJP की अपील के बाद जब राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा जंतर-मंतर पहुंचे थे, तो वे सिर्फ भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक तक ही सीमित रहे और पार्टी ने खुलकर समर्थन नहीं दिया। इसके अलावा, संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले विपक्षी दलों की बैठक में भी कांग्रेस ने इस पर संयम बरता था।

संसद मार्च और युवाओं के उमड़े सैलाब ने बदला कांग्रेस का रुख सोमवार को संसद मार्च के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से जिस बड़ी संख्या में छात्र और युवा सड़कों पर उतरे और पूरे दिन विरोध प्रदर्शन जारी रहा, उसने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए। इससे कांग्रेस को साफ संदेश मिल गया कि देश के युवाओं में सरकार के खिलाफ भारी गुस्सा और नाराजगी है। इस नब्ज को पहचानते हुए कांग्रेस ने अपना रुख बदला और आंदोलन को एक नई धार देने का फैसला किया। इसके बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने पूरी ताकत के साथ इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर उठाना शुरू कर दिया।

कानूनी मदद और पीएम आवास के पास जोरदार प्रदर्शन सरकार पर संसद के भीतर तत्काल चर्चा कराने का दबाव बनाने के लिए राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से भी मुलाकात की। इसके साथ ही कांग्रेस ने अपनी लीगल टीम को निर्देश दिया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई में हिरासत में लिए गए या घायल हुए युवाओं को हरसंभव कानूनी और चिकित्सीय मदद मुहैया कराई जाए। इसी रणनीति के तहत मंगलवार को राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई बड़े नेता प्रधानमंत्री आवास के पास निषेधाज्ञा (Section 144) का उल्लंघन कर धरने पर बैठ गए, जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें कुछ घंटों के लिए हिरासत में ले लिया और बाद में रात में रिहा कर दिया। इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे के बाद अब यह साफ हो गया है कि कांग्रेस इस युवा आक्रोश को लोकसभा चुनाव के बाद एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में भुनाने की पूरी तैयारी में है।

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