गोरखपुर में थ्री स्टार होटल का सपना दिखाकर सवा करोड़ की जालसाजी: जानिए क्या है पूरा मामला

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर में विकास और तेजी से बढ़ते पर्यटन उद्योग के बीच रियल एस्टेट और निर्माण क्षेत्र से जुड़ी एक बड़ी और सनसनीखेज धोखाधड़ी का पर्दाफाश हुआ है। रामगढ़ताल के कायाकल्प, एम्स, फर्टिलाइजर और कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की नजदीकी के चलते पिछले कुछ वर्षों में गोरखपुर पूर्वांचल का सबसे बड़ा हॉस्पिटैलिटी और कमर्शियल हब बनकर उभरा है। इसी सुनहरे कारोबारी माहौल में एक प्रतिष्ठित स्थानीय व्यवसायी को थ्री स्टार होटल का मालिक बनाने का सब्जबाग दिखाकर लखनऊ की एक कंस्ट्रक्शन फर्म से जुड़े शातिर ठेकेदारों ने 1 करोड़ 18 लाख रुपये की भारी-भरकम रकम हड़प ली। जालसाजी की पराकाष्ठा यह रही कि करोड़ों रुपये ऐंठने के बावजूद निर्माण स्थल पर नींव के नाम पर सिर्फ एक गड्ढा खोदा गया और उसके बाद काम पूरी तरह बंद कर दिया गया। इतना ही नहीं, जब पीड़ित व्यवसायी ने अपने पैसे का हिसाब मांगा, तो आरोपियों ने फर्जी इकरारनामा बनाकर 50 लाख रुपये की अतिरिक्त रंगदारी मांगी और रकम न देने पर पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी तक दे डाली। इस हाई-प्रोफाइल मामले में पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) गोरखनाथ के हस्तक्षेप के बाद शाहपुर थाने में आरोपियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।
लखनऊ की कंस्ट्रक्शन कंपनी और 2021 का वह अनुबंध: 85 लाख ऑनलाइन और 32 लाख कैश का खेल
यह पूरा मामला गोरखपुर महानगर के शाहपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत धर्मपुर स्थित प्रगति विहार कॉलोनी के निवासी और मेसर्स सिंघल वेंचर्स के पार्टनर राम अवतार सिंह से जुड़ा हुआ है। राम अवतार सिंह की बशारतपुर इलाके में बेशकीमती जमीन स्थित है, जिस पर वे एक आधुनिक सुविधाओं से लैस थ्री स्टार होटल का निर्माण कराना चाहते थे। होटल के निर्माण कार्य के लिए उन्होंने राजधानी लखनऊ के आदिल नगर, टेढ़ी पुलिया स्थित एक रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनी से संपर्क साधा था। कंपनी के प्रतिनिधि और ठेकेदार मोहम्मद फरीद किदवई, फैकुल्लाह खान और नसीम अहमद ने खुद को बड़े प्रोजेक्ट्स का अनुभवी बिल्डर बताते हुए राम अवतार सिंह का विश्वास जीत लिया। इसके बाद 23 अगस्त 2021 को दोनों पक्षों के बीच होटल निर्माण का एक औपचारिक अनुबंध (Contract Agreement) निष्पादित किया गया। अनुबंध के तहत निर्माण की अलग-अलग चरणों की समयसीमा तय की गई थी। इसके बाद तीनों ठेकेदारों ने काम शुरू करने और सामग्री जुटाने के नाम पर पीड़ित के बैंक खातों से विभिन्न तिथियों में कुल 85 लाख 27 हजार रुपये आरटीजीएस और ऑनलाइन माध्यम से ट्रांसफर करवा लिए। इसके अतिरिक्त, साइट पर लेबर खर्च और तात्कालिक खरीदारी का हवाला देकर 32 लाख 73 हजार रुपये नकद भी हासिल कर लिए। इस प्रकार ठेकेदारों ने कुल मिलाकर 1 करोड़ 18 लाख रुपये अपने कब्जे में ले लिए।
जमीन पर केवल खोदा गड्ढा और थमाते रहे फर्जी बिल: 10 लाख रुपये पाटने में अलग से गंवाए
करोड़ों रुपये का भुगतान हासिल करने के बाद ठेकेदारों की असल नीयत सामने आने लगी। बशारतपुर स्थित निर्माण स्थल पर भारी मशीनरी लाकर होटल का भव्य ढांचा खड़ा करने के बजाय ठेकेदारों ने केवल जमीन पर एक बड़ा गड्ढा खुदवाया। जब व्यवसायी ने काम की धीमी गति पर सवाल उठाए, तो आरोपी ठेकेदार सीमेंट, स्टील, सरिया और निर्माण सामग्री की खरीद के नाम पर फर्जी बिल और बोगस रसीदें दिखाकर उन्हें गुमराह करते रहे। लंबे समय तक निर्माण कार्य पूरी तरह ठप पड़ा रहा और ठेकेदार गोरखपुर आने से कतराने लगे। समय बीतने के साथ खोदे गए विशाल गड्ढे में बारिश का पानी भरने लगा, जिससे आसपास की बस्तियों और जमीन की सुरक्षा पर संकट खड़ा हो गया। अंततः पीड़ित व्यवसायी को उस गड्ढे को सुरक्षित रूप से मिट्टी से पटवाने के लिए अपनी ही जेब से करीब 10 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ी। व्यवसायी को तब जाकर अहसास हुआ कि उनके साथ निर्माण के नाम पर एक सुनियोजित वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम दिया गया है।
इकरारनामे में फर्जीवाड़ा और 50 लाख की रंगदारी: परिवार समेत जान से मारने की धमकी
मामला केवल गबन और धोखाधड़ी तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि जालसाजों ने पीड़ित को पूरी तरह कानूनी शिकंजे में फंसाने और ब्लैकमेल करने की एक खतरनाक साजिश रची। 9 अप्रैल को आरोपियों ने लखनऊ के एक अधिवक्ता के माध्यम से पीड़ित व्यवसायी को एक कानूनी नोटिस भिजवाया। इस नोटिस के साथ जो अनुबंध पत्र (इकरारनामा) संलग्न किया गया था, उसे देखकर पीड़ित के होश उड़ गए। मूल अनुबंध पत्र के पैरा संख्या 18 को दोनों पक्षों की सहमति से काटकर उस पर हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन नोटिस में भेजी गई कथित प्रति में उसी पैरा 18 में जालसाजी करते हुए एक फर्जी शर्त जोड़ दी गई थी। इस कूटरचित शर्त के आधार पर ठेकेदारों ने पीड़ित पर 50 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग थोप दी। जब व्यवसायी ने इस फर्जीवाड़े का कड़ा विरोध किया और कानूनी कार्रवाई की बात कही, तो आरोपियों ने फोन पर गाली-गलौज करते हुए साफ धमकी दी कि यदि 50 लाख रुपये का भुगतान नहीं किया गया, तो उन्हें और उनके पूरे परिवार को जान से खत्म कर दिया जाएगा।
सीओ गोरखनाथ के निर्देश पर शाहपुर थाने में FIR: तीनों ठेकेदारों के खिलाफ कानूनी शिकंजा
लगातार मिल रही जान से मारने की धमकियों और करोड़ों की ठगी से आहत व्यवसायी राम अवतार सिंह ने न्याय के लिए पुलिस के उच्चाधिकारियों की चौखट खटखटाई। उन्होंने सभी बैंक ट्रांजैक्शन की रसीदें, मूल अनुबंध पत्र, फर्जी बिलों के साक्ष्य और आरोपियों द्वारा भेजी गई नोटिस की प्रति के साथ पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) गोरखनाथ रवि सिंह को एक विस्तृत प्रार्थना पत्र सौंपा। मामले की गंभीरता और वित्तीय गबन के ठोस साक्ष्यों को देखते हुए सीओ गोरखनाथ ने तुरंत शाहपुर पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। शाहपुर थाना पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए लखनऊ के आदिल नगर, टेढ़ी पुलिया स्थित कंस्ट्रक्शन फर्म से जुड़े तीनों मुख्य आरोपियों—मोहम्मद फरीद किदवई, फैकुल्लाह खान और नसीम अहमद के खिलाफ धोखाधड़ी, अमानत में खयानत, कूटरचना (फर्जी दस्तावेज तैयार करना) और आपराधिक साजिश समेत संबंधित गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। विवेचना अधिकारी के अनुसार, पुलिस की एक टीम आरोपियों के बैंक खातों के लेन-देन और लखनऊ स्थित उनके ठिकानों की पड़ताल कर रही है और जल्द ही गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जाएगी।
रियल एस्टेट और होटल प्रोजेक्ट्स में ऐसे धोखाधड़ी से कैसे बचें? कानूनी व तकनीकी सबक
गोरखपुर का यह मामला उन सभी निवेशकों और भूस्वामियों के लिए एक बड़ा सबक है जो अपनी संपत्तियों पर होटल, रिजॉर्ट या बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट्स विकसित करने की योजना बना रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों और अनुभवी चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के अनुसार, किसी भी बड़े निर्माण अनुबंध में केवल कागजी वादों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। पहला और सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि भुगतान हमेशा 'माइलस्टोन-बेस्ड' (Milestone-based) होना चाहिए, अर्थात जब तक साइट पर वास्तविक काम जमीन पर न दिखे, तब तक बड़ा फंड रिलीज नहीं करना चाहिए। निर्माण के मूल्यांकन के लिए किसी स्वतंत्र चार्टर्ड इंजीनियर या आर्किटेक्ट से प्रमाणीकरण कराना अनिवार्य होना चाहिए। दूसरा, किसी भी अनुबंध पत्र के प्रत्येक पृष्ठ पर दोनों पक्षों के पूर्ण हस्ताक्षर होने चाहिए और किसी भी कटे हुए या संशोधित बिंदु पर नोटरी व गवाहों की पुष्टि दर्ज होनी चाहिए। इसके अलावा, ठेकेदार या कंस्ट्रक्शन कंपनी का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड, रेरा (RERA) पंजीकरण और कॉर्पोरेट पहचान संख्या (CIN) की गहन जांच जिला स्तर पर करा लेना भविष्य के बड़े वित्तीय हादसों से सुरक्षित रख सकता है।