टैक्स छूट का जमाना गया! अब पर्यावरण बचाने वाले अमीरों को ही मिलेगा विदेशों का ‘गोल्डन वीजा’, जानें क्या है नया ट्रेंड

दुनिया भर के अमीर और रईस परिवारों के बीच दूसरे देश की नागरिकता या परमानेंट रेजिडेंसी (PR) पाने के लिए 'गोल्डन वीजा' प्रोग्राम हमेशा से पहली पसंद रहा है। लेकिन अब इस वैश्विक निवेश बाजार में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव आ चुका है। जो गोल्डन वीजा कभी सिर्फ टैक्स प्लानिंग, रियल एस्टेट निवेश और कम टैक्स वाले देशों में पैसा छुपाने का जरिया माना जाता था, वह अब तेजी से 'ग्रीन' यानी पर्यावरण-अनुकूल हो रहा है। यूरोपीय संघ (EU) समेत दुनिया के कई दिग्गज देश अब केवल उन्हीं अमीरों को अपने यहां बसने का न्योता दे रहे हैं, जो पर्यावरण को सुधारने के लिए 'इम्पैक्ट इन्वेस्टिंग' यानी सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ वाले प्रोजेक्ट्स में निवेश करने को तैयार हैं।
रियल एस्टेट से हटा ध्यान, अब टिकाऊ विकास पर फोकस
पिछले एक दशक में गोल्डन वीजा का मतलब होता था किसी विदेशी आलीशान शहर में महंगी प्रॉपर्टी या विला खरीदना। लेकिन पुर्तगाल, स्पेन, और ग्रीस जैसे देशों में इस वजह से स्थानीय स्तर पर घरों की कीमतें आसमान छूने लगीं, जिसका वहां के नागरिकों ने भारी विरोध किया। इस समस्या से निपटने और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए सरकारों ने अपने नियमों को बदल दिया है। अब विदेशी निवेशकों के लिए पारंपरिक रियल एस्टेट निवेश के रास्ते बंद या बेहद सीमित किए जा रहे हैं, और उनका ध्यान रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा), ऑर्गेनिक फार्मिंग और कार्बन-क्रेडिट जनरेट करने वाले प्रोजेक्ट्स की तरफ मोड़ा जा रहा है।
क्या है 'इम्पैक्ट इन्वेस्टिंग' और गोल्डन वीजा का नया कनेक्शन?
इम्पैक्ट इन्वेस्टिंग का सीधा मतलब ऐसे निवेश से है जो आर्थिक मुनाफे के साथ-साथ समाज और पर्यावरण पर भी सकारात्मक बदलाव डाले। नए नियमों के तहत, यदि कोई भारतीय या वैश्विक निवेशक किसी यूरोपीय देश का गोल्डन वीजा चाहता है, तो उसे वहां के स्टार्टअप्स, ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर फंड्स या पर्यावरण अनुसंधान (Eco-Research) से जुड़े सरकारी बॉन्ड्स में एक निश्चित मोटी रकम लगानी होगी। इस कूटनीतिक और आर्थिक बदलाव के जरिए देश अपने क्लाइमेट चेंज के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए वैश्विक अमीरों की पूंजी का इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारतीय रईसों के बीच भी बढ़ा ग्रीन वीजा का क्रेज
भारत के हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) यानी करोड़पतियों के बीच भी विदेशी नागरिकता पाने की होड़ हमेशा बनी रहती है। कूटनीतिक विशेषज्ञों और इमिग्रेशन सलाहकारों के अनुसार, भारतीय निवेशक भी अब इस बदलाव को खुले दिल से स्वीकार कर रहे हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि नई पीढ़ी के अमीर उद्यमी न सिर्फ अपनी संपत्ति सुरक्षित रखना चाहते हैं, बल्कि वे अपनी वैश्विक छवि को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार निवेशक के रूप में भी पेश करना चाहते हैं। आने वाले समय में यह 'ग्रीन इनिशिएटिव' दुनिया भर के रेजिडेंसी-बाय-इन्वेस्टमेंट उद्योग की पूरी दिशा और दशा बदलने वाला साबित होगा।