पति भी ले सकता है पत्नी से तलाक! कानून में दिए गए हैं ये 8 मजबूत कानूनी आधार; जानिए अपने अधिकार और सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले

वैवाहिक विवादों और पारिवारिक मामलों को लेकर समाज में अक्सर यह आम धारणा देखने को मिलती है कि वैवाहिक कानून पूरी तरह एकतरफा हैं और तलाक की अर्जी केवल पत्नी ही मजबूती से दाखिल कर सकती है। हालांकि, भारतीय कानून व्यवस्था में ऐसा बिल्कुल नहीं है। देश का पारिवारिक कानून लैंगिक समानता (Gender Equality) के सिद्धांतों पर आधारित है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act) की धारा 13(1) के तहत पति और पत्नी दोनों को ही समान रूप से तलाक (Divorce) की मांग करने का विधिक अधिकार प्राप्त है। यदि वैवाहिक जीवन असहनीय हो जाए और सुलह की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाएं, तो पति भी कानून में वर्णित ठोस आधारों का उपयोग कर फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर सकते हैं।
1. मानसिक और शारीरिक क्रूरता (Cruelty)
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत 'क्रूरता' तलाक का सबसे मजबूत और सामान्य आधार है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट किया है कि क्रूरता केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक प्रताड़ना भी इसका बड़ा हिस्सा है:
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माता-पिता से अलग रहने का अनुचित दबाव: बिना किसी ठोस वजह के पति पर उसके बुजुर्ग माता-पिता को छोड़ने का लगातार दबाव बनाना।
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झूठे आपराधिक मामलों की धमकी: दहेज प्रताड़ना (BNS की धारा 85/86 या पूर्ववर्ती IPC 498A) या घरेलू हिंसा के झूठे केस में फंसाने की धमकी देना मानसिक क्रूरता माना जाता है।
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अपमानजनक व्यवहार: पति, उसके परिजनों या कार्यस्थल पर जाकर सार्वजनिक रूप से चरित्र हनन करना या अपमानित करना।
2. परित्याग या छोड़ देना (Desertion)
यदि पत्नी बिना किसी उचित और वाजिब कारण के पति को छोड़कर मायके या कहीं और चली गई हो और कम से कम लगातार 2 वर्षों से अलग रह रही हो, तो पति धारा 13(1)(ib) के तहत तलाक की अर्जी दाखिल कर सकता है। इसके लिए दो शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं: पहला, पत्नी द्वारा वैवाहिक दायित्वों को पूरी तरह त्यागने का इरादा (Animus Deserendi) हो, और दूसरा, पति की तरफ से उसे छोड़ने की कोई जायज वजह न दी गई हो।
3. व्यभिचार या अवैध संबंध (Adultery)
विवाह के बाद यदि पत्नी अपनी मर्जी से पति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के साथ शारीरिक या विवाहेतर संबंध बनाती है, तो यह तलाक का पूर्ण आधार है। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने व्यभिचार को आपराधिक कृत्य (Criminal Offence) की श्रेणी से बाहर कर दिया है, लेकिन पारिवारिक कानूनों में इसे अब भी विवाह विच्छेद (Divorce Ground) का बेहद ठोस सिविल आधार माना जाता है। इसके लिए पति को डिजिटल साक्ष्य, कॉल डिटेल्स, संदेश या प्रत्यक्ष प्रमाण अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने होते हैं।
4. धर्म परिवर्तन (Conversion)
यदि विवाह के पश्चात पत्नी ने हिंदू, सिख, जैन या बौद्ध धर्म (जो हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में आते हैं) को त्यागकर कोई अन्य धर्म (जैसे इस्लाम या ईसाई धर्म) अपना लिया हो, तो पति धारा 13(1)(ii) के तहत तलाक की मांग कर सकता है। धर्म परिवर्तन के साथ ही वैवाहिक अनुबंध पर इसका सीधा असर पड़ता है।
5. असाध्य मानसिक विकार या पागलपन (Mental Disorder)
यदि पत्नी किसी ऐसे गंभीर मानसिक रोग, असाध्य सिजोफ्रेनिया या लगातार रहने वाले मनोरोग से पीड़ित हो, जिसके कारण पति के लिए उसके साथ सामान्य रूप से वैवाहिक जीवन बिताना या सहवास करना असंभव हो गया हो, तो पति धारा 13(1)(iii) के तहत तलाक का दावा कर सकता है। इसके लिए अधिकृत मेडिकल बोर्ड और मनोचिकित्सक की मेडिकल रिपोर्ट अनिवार्य होती है।
6. संक्रामक यौन रोग (Venereal Disease)
यदि पत्नी किसी गंभीर और संक्रामक यौन रोग (Venereal Disease) से पीड़ित है, जिसकी जानकारी विवाह के समय छिपाई गई हो या जिससे पति के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा उत्पन्न होता हो, तो यह भी कानूनन तलाक का एक वैध आधार बनता है।
7. संसार का त्याग या संन्यास (Renunciation of the World)
यदि पत्नी ने सांसारिक जीवन, वैवाहिक जिम्मेदारियों और भौतिक सुखों को पूरी तरह त्यागकर किसी धार्मिक या संन्यासी संप्रदाय की दीक्षा ले ली हो और संन्यास धारण कर लिया हो, तो पति धारा 13(1)(vi) के तहत विवाह समाप्त करने की मांग कर सकता है।
8. 7 वर्षों तक जीवित होने की जानकारी न होना (Presumption of Death)
यदि पत्नी अचानक लापता हो जाए और लगातार 7 वर्षों तक उसके जीवित होने की कोई सूचना उन लोगों को न मिली हो, जो सामान्य परिस्थितियों में उसके बारे में स्वाभाविक रूप से सुनते (जैसे माता-पिता, रिश्तेदार आदि), तो कानून उसे मृत मान लेता है। ऐसी स्थिति में पति फैमिली कोर्ट से तलाक की डिक्री प्राप्त कर सकता है।
'इर्रिट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज' (विवाह का पूरी तरह टूट जाना)
इन वैधानिक आधारों के अलावा, भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत सर्वोच्च न्यायालय को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि यदि कोई वैवाहिक रिश्ता इस हद तक टूट चुका है जहां सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है (Irretrievable Breakdown of Marriage), तो कोर्ट दोनों पक्षों को लंबी मुकदमेबाजी से राहत देते हुए तत्काल तलाक को मंजूरी दे सकता है।
पति अदालत में केस मजबूत करने के लिए क्या सावधानियां बरतें?
फैमिली कोर्ट में केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं होता, हर बात का दस्तावेजी प्रमाण होना आवश्यक है:
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डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखें: धमकी भरे व्हाट्सएप चैट्स, ईमेल, कॉल रिकॉर्डिंग्स और ऑडियो-वीडियो क्लिप्स को सुरक्षित रखें और उनका सर्टिफिकेट (धारा 63 BSA / 65B Evidence Act) तैयार करवाएं।
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पुलिस शिकायतों की प्रतियां: यदि पत्नी या उसके मायके वालों द्वारा कोई विवाद या धमकी दी गई हो, तो उसकी स्थानीय थाने में की गई जीडी एंट्री या लिखित शिकायत की कॉपी संभाल कर रखें।
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वित्तीय लेन-देन का रिकॉर्ड: अपने बैंक स्टेटमेंट्स और खर्चों का पूरा विवरण पारदर्शी रखें ताकि भरण-पोषण (Maintenance) तय होते समय वास्तविक स्थिति स्पष्ट रहे।