पश्चिमी देशों की नीतियों से तबाह हुई अर्थव्यवस्था! ब्रिक्स समिट में ईरानी राष्ट्रपति का फूटा गुस्सा

रूस के कजान शहर में आयोजित हुए वैश्विक मंच ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के दौरान अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में उस समय भूचाल आ गया जब ईरान के राष्ट्रपति ने पश्चिमी देशों और अमेरिकी आधिपत्य के खिलाफ एक बेहद आक्रामक और दो टूक बयान दिया। पश्चिमी प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व ने दुनिया के सबसे बड़े उभरते हुए देशों के इस मंच से खुलकर यह बात कही कि दशकों से चली आ रही पश्चिमी देशों की आर्थिक दादागीरी ने विकासशील देशों की कमर तोड़कर रख दी है। ईरानी राष्ट्रपति ने दुनिया भर के देशों से यह पुरजोर आह्वान किया कि यदि ग्लोबल साउथ (Global South) को अपनी संप्रभुता और आर्थिक आजादी बचानी है, तो उन्हें अमेरिकी डॉलर की गुलामी से बाहर निकलना होगा और अपनी स्थानीय तथा राष्ट्रीय मुद्राओं (National Currencies) में आपसी व्यापार को तेजी से बढ़ावा देना होगा। उनके इस तीखे और बेबाक भाषण ने पश्चिमी महाशक्तियों की नींद उड़ा दी है और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की सुगबुगाहट को तेज कर दिया है।
ब्रिक्स मंच पर बोलते हुए ईरानी राष्ट्रपति ने इस बात पर से पर्दा उठाया कि कैसे पश्चिमी देशों ने अपनी राजनीतिक और सैन्य ताकत का इस्तेमाल करके वैश्विक वित्तीय संस्थानों और स्विफ्ट (SWIFT) जैसे भुगतान तंत्रों को एक हथियार बना लिया है। जो देश पश्चिमी नीतियों के आगे झुकने से इनकार कर देते हैं, उन्हें आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए भूखा मारने और उनकी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करने की साजिश रची जाती है। ईरान खुद पिछले कई दशकों से इन्हीं अन्यायपूर्ण और एकतरफा पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, जिसके कारण देश के आम नागरिकों को भारी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि डॉलर को वैश्विक ट्रेड की एकमात्र करेंसी बनाकर अमेरिका दुनिया के बाकी देशों की अर्थव्यवस्था को अपने इशारों पर नचाता है, और अब समय आ गया है कि इस शोषणकारी और भेदभावपूर्ण चक्रव्यूह को तोड़ा जाए ताकि स्वतंत्र देश अपनी शर्तों पर विकास कर सकें।
ईरान द्वारा ब्रिक्स सम्मेलन में रखी गई 'डी-डॉलराइजेशन' (De-dollarization) की मांग आज के समय में केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ की एक बड़ी आर्थिक जरूरत बन चुका है। ब्रिक्स समूह, जिसमें पहले से ही ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे दिग्गज देश शामिल हैं और अब ईरान सहित कई नए देश भी जुड़ चुके हैं, वैश्विक जीडीपी का एक बहुत बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता है। यदि ये देश अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को खत्म करके आपसी कारोबार के लिए अपनी खुद की स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल करना शुरू कर दें, तो पश्चिमी देशों की आर्थिक धौंस स्वतः समाप्त हो जाएगी। रूस और चीन पहले से ही अपनी मुद्राओं (रूबल और युआन) में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं, और अब ईरान के इस मुखर समर्थन के बाद ब्रिक्स देशों के बीच एक साझा वैकल्पिक भुगतान प्रणाली (Alternative Payment System) बनाने की दिशा में काम तेजी से आगे बढ़ने की उम्मीद है।
ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया दो स्पष्ट ध्रुवों में बंटती हुई नजर आ रही है—एक तरफ पश्चिमी देश और उनके सहयोगी हैं जो पुरानी वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, और दूसरी तरफ ब्रिक्स जैसे संगठनों के नेतृत्व में उठने वाले वे देश हैं जो एक बहुध्रुवीय (Multipolir) और न्यायसंगत दुनिया की मांग कर रहे हैं। ब्रिक्स सम्मेलन में ईरान की यह गूंज इस बात का प्रमाण है कि प्रतिबंधों के बावजूद तेहरान वैश्विक कूटनीति के केंद्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रहा है। विकासशील और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं अब यह भली-भांति समझ चुकी हैं कि पश्चिमी देशों के वादों पर भरोसा करने के बजाय उन्हें आपसी सहयोग और आत्मनिर्भरता का रास्ता चुनना होगा। क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा गलियारों के विकास और वित्तीय स्वतंत्रता के मुद्दों पर ब्रिक्स मंच पर बनी यह आम सहमति आने वाले समय में अमेरिकी आधिपत्य के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकती है।
ईरान के इस आक्रामक और स्पष्ट आह्वान के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और पश्चिमी देशों की वित्तीय राजधानियों में गंभीर चिंतन शुरू हो चुका है। विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि यदि ब्रिक्स देश सचमुच अपनी मुद्राओं में व्यापार करने के लिए एक मजबूत और व्यावहारिक तंत्र विकसित कर लेते हैं, तो अमेरिकी डॉलर की वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में बादशाहत खतरे में पड़ जाएगी। हालांकि इस रास्ते में कुछ तकनीकी और राजनीतिक चुनौतियां जरूर हैं, जैसे कि अलग-अलग देशों की मुद्राओं की स्थिरता और विनिमय दर (Exchange Rate) का निर्धारण, लेकिन जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय ब्रिक्स मंच पर दिया जा रहा है, वह इस बात का संकेत है कि बदलाव अब अपरिहार्य हो चुका है। ईरान जैसे देशों के मुखर होने से दुनिया के अन्य पीड़ित देश भी अब पश्चिमी दबाव के खिलाफ खुलकर बोलने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो आने वाले दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था का पूरा नक्शा बदलकर रख देगा।