विदेश

बांग्लादेश की ‘बत्ती गुल’ होने का मंडराया बड़ा खतरा, अडानी के पावर प्लांट में आई बड़ी तकनीकी खराबी से सहमा पड़ोसी देश

पड़ोसी देश बांग्लादेश में इन दिनों राजनीतिक उठापटक के साथ-साथ एक और भयंकर आर्थिक और ऊर्जा संकट सिर उठाने लगा है, जिसने वहां की अंतरिम सरकार और बिजली वितरण कंपनियों की नींद उड़ाकर रख दी है। भारत के जाने-माने उद्योगपति गौतम अडानी की कंपनी अडानी पावर द्वारा झारखंड के गोड्डा में स्थापित किए गए अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट से पड़ोसी देश बांग्लादेश को भारी मात्रा में बिजली की आपूर्ति की जाती है, जो वहां के कुल पावर ग्रिड का एक बहुत बड़ा हिस्सा संभालती है। हाल ही में इसी विशालकाय पावर प्लांट के एक प्रमुख तकनीकी यूनिट में अचानक बड़ी तकनीकी खराबी आ जाने के कारण बिजली उत्पादन ठप या बाधित होने की खबर सामने आई है, जिससे पूरे बांग्लादेश में बिजली संकट गहराने का भारी खतरा पैदा हो गया है। इस अप्रत्याशित तकनीकी फॉल्ट के सामने आने के बाद से बांग्लादेश के ऊर्जा विशेषज्ञ, आर्थिक विश्लेषक और विपक्षी दल बेहद गुस्से में नजर आ रहे हैं और वे अपनी सरकार की लचर नीतियों के साथ-साथ विदेशी ऊर्जा पर इस तरह की अत्यधिक निर्भरता को लेकर तीखी आलोचना कर रहे हैं।

झारखंड के गोड्डा प्लांट से बांग्लादेश को मिलती है मुख्य बिजली

झारखंड के गोड्डा जिले में स्थित यह अत्याधुनिक पावर प्लांट विशेष तौर पर पड़ोसी देशों को बिजली निर्यात करने के उद्देश्य से ही डिजाइन और स्थापित किया गया था, जिसके जरिए बांग्लादेश के राष्ट्रीय पावर ग्रिड को रोजाना हजारों मेगावाट बिजली निर्बाध रूप से भेजी जाती है। पिछले कुछ वर्षों से बांग्लादेश की घरेलू बिजली की मांग को पूरा करने में इस प्लांट की भूमिका सबसे अहम मानी जाती रही है क्योंकि वहां की स्थानीय उत्पादक इकाइयां देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं। जब भी इस ट्रांसमिशन लाइन या पावर प्लांट में किसी भी प्रकार की तकनीकी रुकावट आती है, तो उसका सीधा और गंभीर असर ढाका समेत बांग्लादेश के बड़े औद्योगिक और रिहायशी इलाकों की बिजली व्यवस्था पर तुरंत पड़ना शुरू हो जाता है। वर्तमान में जिस बड़ी तकनीकी खराबी की वजह से उत्पादन प्रभावित हुआ है, उसके बाद से बांग्लादेश के कई शहरों में लोडशेडिंग और बिजली कटौती की आशंका ने आम नागरिकों और कारोबारियों की चिंता को कई गुना बढ़ा दिया है।

बांग्लादेशी एक्सपर्ट्स का फूटा गुस्सा और सरकार पर गंभीर सवाल

इस पूरी घटना के सामने आने के बाद बांग्लादेश के जाने-माने ऊर्जा विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और तकनीकी विश्लेषकों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है और उन्होंने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर करना शुरू कर दिया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को इस हद तक किसी एक विदेशी निजी कंपनी के भरोसे छोड़ देना बहुत बड़ी रणनीतिक और कूटनीतिक भूल है, जिसका खामियाजा अंततः देश की आम जनता और उद्योगों को भुगतना पड़ता है। उनका यह भी तर्क है कि इस प्रकार के समझौतों में पारदर्शिता की भारी कमी रही है और पूर्व की सरकारों ने स्थानीय ऊर्जा स्रोतों को विकसित करने के बजाय बाहरी बिजली आपूर्ति पर आँख मूंदकर अत्यधिक निर्भरता बढ़ा दी। बांग्लादेशी मीडिया और थिंक टैंक लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि भविष्य में इस तरह की तकनीकी खराबी लंबे समय तक बनी रहती है, तो देश के बड़े कारखाने, अस्पताल और आम जनजीवन किस तरह से इस भयानक ऊर्जा संकट का सामना कर पाएगा।

अडानी पावर प्रबंधन द्वारा तकनीकी खराबी को दूर करने के युद्ध स्तर पर प्रयास

दूसरी तरफ, भारत में अडानी पावर के तकनीकी इंजीनियरों और विशेषज्ञों की टीम इस अप्रत्याशित तकनीकी खराबी को तुरंत दूर करने के लिए युद्ध स्तर पर दिन-रात जुटी हुई है ताकि बिजली आपूर्ति को जल्द से जल्द पूरी क्षमता के साथ बहाल किया जा सके। कंपनी के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस तरह की विशाल औद्योगिक परियोजनाओं में कई बार आंतरिक तकनीकी दिक्कतें आ जाना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होता है, जिन्हें उच्च प्रशिक्षित इंजीनियरों की देखरेख में समय रहते ठीक कर लिया जाता है। अडानी समूह ने बांग्लादेशी अधिकारियों को यह भरोसा दिलाया है कि उनकी प्राथमिकता इस बात को सुनिश्चित करना है कि पड़ोसी देश को बिजली आपूर्ति में किसी भी प्रकार की लंबी बाधा का सामना न करना पड़े और सिस्टम को सुरक्षित तरीके से ट्रैक पर लाया जा सके। इसके बावजूद, जिस तरह से इस तकनीकी फॉल्ट को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बयानबाजी तेज हो गई है, उससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा कूटनीति के मोर्चे पर एक नया भूचाल जरूर आ गया है।

बांग्लादेश के लिए सबक और भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियां

इस पूरे घटनाक्रम ने बांग्लादेश के हुक्मरानों और नीति निर्माताओं के सामने यह साफ आईना रख दिया है कि देश की ऊर्जा स्वतंत्रता और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए आत्मनिर्भर बनना कितना ज्यादा जरूरी है। केवल आयातित बिजली पर पूरी तरह निर्भर रहकर देश के औद्योगिक विकास और आर्थिक पहिए को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है, विशेषकर तब जब किसी तकनीकी फॉल्ट के कारण रातोंरात बत्ती गुल होने का खतरा मंडराने लगे। आने वाले दिनों में इस संकट से निपटने के बाद बांग्लादेश की सरकार को अपनी घरेलू उत्पादन क्षमताओं, रिन्यूएबल एनर्जी और स्थानीय पावर प्लांटों के आधुनिकीकरण पर नए सिरे से भारी निवेश करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। तब तक के लिए गोड्डा प्लांट की इस तकनीकी खराबी से उपजा यह विवाद दक्षिण एशिया के राजनीतिक और ऊर्जा गलियारों में एक गर्माता हुआ मुख्य विषय बना रहेगा, जिस पर हर अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय विशेषज्ञ की पैनी नजर टिकी हुई है।

Back to top button