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महिला कर्मचारी को ‘F* Off’ कहना अपराध नहीं, हाई कोर्ट ने कंपनी बॉस के खिलाफ FIR की रद्द

News India Live, Digital Desk: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कार्यस्थल पर भाषा के इस्तेमाल और कानूनी सीमाओं को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गुरुग्राम की एक कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) के खिलाफ दर्ज उस FIR को रद्द कर दिया है, जो एक महिला कर्मचारी द्वारा ‘अभद्र भाषा’ के आरोप में दर्ज कराई गई थी। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गुस्से में कहे गए कुछ अपशब्द हर बार किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने या आपराधिक दायरे में नहीं आते।क्या था पूरा मामला?यह विवाद गुरुग्राम स्थित एक निजी कंपनी का है। महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि एक बैठक के दौरान उसके बॉस (MD) ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया और उसे ‘F* Off’ कहा। महिला का दावा था कि यह शब्द उसकी लज्जा भंग करने और उसे अपमानित करने के इरादे से कहा गया था। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी बॉस के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A (यौन उत्पीड़न) और 509 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना) के तहत मामला दर्ज किया था।हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘अपशब्द’ और ‘अपराध’ में अंतरजस्टिस सुमीत गोयल की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हालांकि ‘F*** Off’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करना असभ्य और अवांछनीय व्यवहार हो सकता है, लेकिन कानूनी रूप से इसे तब तक अपराध नहीं माना जा सकता जब तक कि इसमें कोई यौन मंशा (Sexual Intent) न हो। कोर्ट ने कहा कि रोजमर्रा की गहमागहमी या दफ्तर के तनाव में अगर कोई इस तरह की भाषा का प्रयोग करता है, तो उसे महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य नहीं माना जा सकता।यौन उत्पीड़न की धारा लगाने पर कोर्ट की सख्तीअदालत ने यह भी साफ किया कि धारा 354A और 509 का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए। केवल एक मुहावरेदार अपशब्द का इस्तेमाल करना, जो आजकल की बोलचाल में आम हो गया है, किसी को अपराधी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में शारीरिक संपर्क या किसी भी तरह के यौन संकेत का कोई सबूत नहीं था। इसी आधार पर अदालत ने कंपनी के एमडी के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही को पूरी तरह से रद्द करने का आदेश दिया।कॉर्पोरेट कल्चर और वर्कप्लेस एथिक्स पर चर्चाहाई कोर्ट के इस फैसले के बाद कॉर्पोरेट जगत में वर्कप्लेस एथिक्स और कानूनी सुरक्षा को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बनेगा जहां मामूली कहासुनी को गंभीर आपराधिक रूप दे दिया जाता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि दफ्तरों में भाषा की मर्यादा बनी रहनी चाहिए, भले ही वह आपराधिक श्रेणी में न आती हो।

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